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India Speak Daily > समाचार > न्यायपालिका > राम मन्दिर को लेकर रामभद्राचार्य के बोले गए झूठ का पोस्टमार्टम।
न्यायपालिका

राम मन्दिर को लेकर रामभद्राचार्य के बोले गए झूठ का पोस्टमार्टम।

ISD News Network
By ISD News Network 13 Min Read
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13 Min Read
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Ajay Chauhan रामभद्राचार्य को कौन सा झूठ बोलने के कारण इलाहाबाद हाइकोर्ट ने फटकार लगा कर भगा दिया था। राम मन्दिर को लेकर रामभद्राचार्य के बोले गए झूठ का पोस्टमार्टम।

बात है 1989 की जब राम मंदिर का विवाद फैज़ाबाद न्यायालय से इलाहाबाद हाईकोर्ट में गया। तब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सूचना जारी करके कहा कि जिसको जिसको भी पक्षकार बनना है वो पक्षकार बन सकता है।

निर्मोही अखाड़ा और मुस्लिम पक्ष के बाद लगभग 20 पक्षकारों ने इलाहाबद हाईकोर्ट में राममन्दिर के पक्षकार बनने के लिए अर्जी दाखिल की थी परन्तु रामभद्राचार्य अथवा आरएसएस, बीजेपी, विश्व हिंदू परिषद आदि कोई भी भाषणवीर पक्षकार के रूप में न्यायालय के समक्ष कभी प्रस्तुत नहीं हुआ। 1986 में बीजेपी की शिमला राष्ट्रीय बैठक में इनका तय हो गया था कि ये लोग कभी कोर्ट में नहीं जायेंगे बस आंदोलन करेंगे और यह कभी सीधे कोर्ट में गए भी नहीं।

भारत के समस्त आचार्यों में एकमात्र ज्योतिष् एवं द्वारकाशारदा पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी न्यायालय में पक्षकार बनने के लिए आगे आएं और अखिल भारतीय श्रीरामजन्मभूमि पुनरुद्धार समिति बनाकर इलाहाबाद हाईकोर्ट में राम मंदिर विवाद के मुख्य 5 पक्षकारों में शामिल हुए।

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यदि हाइकोर्ट के लगभग 4000 पन्नों एवं सुप्रीम कोर्ट के 1045 पन्ने के निर्णय को आप पढेंगे तो आपको स्पष्ट पता चल जाएगा कि आज जो रामजन्मभूमि का फैसला हिन्दुओं के पक्ष में आया है तो उसका एक मात्र श्रेय स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज एवं उनके शिष्य वर्तमान ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य स्वामी श्री अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी एवं उनके अधिवक्ता पी एन मिश्र जी को जाता है। यह बात जानने के लिए आप न्यायालय का जजमेंट पढ़ सकते हैं यह प्रमाण है। मूर्ख जनता कुछ पढ़ती नहीं है इसलिए जानती नहीं है।

अब बात यह है कि रामभद्राचार्य का इस अयोध्या राम मंदिर विवाद में क्या भूमिका रही है?

क्या राममन्दिर रामभद्राचार्य के कारण बन रहा है?

दरअसल बात है 2010 की जब इलाहाबाद हाईकोर्ट में निर्णायक बहस चल रही थी। उस बहस में रामभद्राचार्य ने हाइकोर्ट से धार्मिक विशेषज्ञ के तौर पर कुछ प्रमाण रखने की अनुमति मांगी।

न्यायालय ने रामभद्राचार्य को अनुमति दे दी।

इलाहाबाद हाइकोर्ट में विवादित भूमि को रामजन्मभूमि सिद्ध करने की बात थी।

रामभद्राचार्य ने बताया कि अयोध्या ही श्रीरामचन्द्र जी की जन्मभूमि है ऐसा स्कन्द पुराण आदि में लिखा है।

कोर्ट ने कहा कि यह तो सभी बता रहे हैं कि अयोध्या ही श्रीराम जी की जन्मभूमि है और आपसे पहले भी अन्य विशेषज्ञों ने सिद्ध किया है कि पुराण में लिखा है। पर यह विवाद अयोध्या में रामजन्मभूमि होने का नहीं है बल्कि विवाद यह है कि अयोध्या की जिस भूमि के टुकड़े पर मालिकाना हक का विवाद चल रहा है वो भूमि श्रीराम जी का जन्मस्थान है कि नहीं यह किस शास्त्र में लिखा है और दूसरा प्रश्न कि बाबर ने अपने शासन में स्वयं अथवा अपने सिपहसालार मीरबाकी आदि के द्वारा राममंदिर तोड़ कर मस्जिद बनवाया था कि नहीं? इसका क्या प्रमाण है?

रामभद्राचार्य के पास पहले प्रश्न का कोई उत्तर नहीं था क्योंकि कही भी किसी भी शास्त्र में यह नहीं बताया गया कि अयोध्या में किस स्थान पर रामजी का जन्म हुआ था। उसकी ठीक ठीक जियोग्राफिकल लोकेशन क्या है?

दूसरे प्रश्न को प्रमाणित करने के लिए रामभद्राचार्य ने कुछ समय लिया और कुछ दिन बाद कोर्ट में प्रमाण के तौर पर अवधि भाषा की एक पुस्तिका प्रस्तुत की जिसका नाम था तुलसी शतक। राम भद्राचार्य ने कोर्ट को बताया कि यह तुलसीदास जी की रचना है इसमें बताया गया है कि बाबर ने मंदिर तोड़वा कर मस्जिद बनवा दिया है। दरअसल यह तुलसी शतक रामभद्राचार्य ने ही लिखवाया था जो कि पूर्णतः फर्जी था। इस फर्जी किताब को प्रमाण के रूप में रामभद्राचार्य ने कोर्ट में रखा और सोचा की शाबाशी मिलेगी पर हुआ इसका उल्टा।

न्यायालय ने रामभद्राचार्य से पूछा कि यह तुलसी शतक नामक पुस्तक के रचयिता कौन हैं? तो रामभद्राचार्य ने बताया कि इसके रचयिता स्वयं तुलसीदास जी हैं जिन्होंने रामचरितमानस की रचना की है।

फिर कोर्ट ने पूछा कि यह पुस्तक कहाँ छपी है तो रामभद्राचार्य ने कहा कि हुजूर यह पुस्तक हमने छपवाई है।

फिर कोर्ट ने पूछा कि तुलसीदास जी द्वारा रचित इसकी मूल प्रति कहाँ है? जिससे आपने यह पुस्तक छपवाया।

तब रामभद्राचार्य ने कहा कि हुजूर इसकी मूलप्रति नहीं है तब कोर्ट ने कहा कि बिना मूल प्रति के फिर आपने यह पुस्तक कैसे छपवा दी?

तब रामभद्राचार्य ने अपने चेलों के जैसे न्यायाधीशों को भी मूर्ख समझते हुए बोला कि तुलसीदास जी ने सपने में आकर हमें इस पुस्तक के दोहे बताए और हमने उसे याद करके जागने पर लिखवा डाला।

कोर्ट ने इतना सुनने के बाद जो फटकार लगाकर रामभद्राचार्य को कोर्ट से भगाया कि उसके बाद रामभद्राचार्य कभी भी राम मंदिर के मामले में कोर्ट में गवाही देने नहीं आया। कोर्ट ने कहा भाग जाओ यहाँ से संत भेष देखकर छोड़ रहे हैं पर दुबारा इस प्रकार के फर्जी प्रमाण लेकर आये और कोर्ट को गुमराह करने की कोशिश की तो आपके खिलाफ न्यायालय को गुमराह करने का केस लगाकर जेल में डलवा देंगे।

साथियों ये तो है योगदान रामभद्राचार्य का है जो फर्जी प्रमाण तैयार करके कोर्ट को गुमराह करने के कारण कोर्ट का फटकार खा चुका है पर आम जनता को बड़ी बेशर्मी से बताता फिरता है कि राम मंदिर का फैसला इसके कारण हुआ।

जैसा कि हम सब जानते हैं कि वाल्मीकीय रामायण, स्कन्द पुराण आदि सहित अनेक हिन्दू शास्त्रों में ये बात स्पष्ट लिखी है कि अयोध्या में भगवान् श्रीराम का जन्म हुआ था अतः सबलोग कोर्ट को यही बता रहे थें कि अयोध्या में राम जी का जन्म हुआ है यह रहा शास्त्रप्रमाण। यही बात रामभद्राचार्य ने भी कही थी पर कोर्ट ने कहा यह कौन सी बड़ी बात है यह तो सबको पता है यह कोई विवाद नहीं है।

मुख्य विवाद है कि विवादित ढांचे के मालिकाना हक का, जिसपर रामभद्राचार्य सहित किसी भी व्यक्ति ने प्रमाण नहीं दिया कि अयोध्या के जिस विवादित भूमि को हिन्दू रामजन्मभूमि कह रहा है और मुस्लिम बाबरी मस्जिद कह रहा है वो ही वास्तव में श्री राम जी का जन्मस्थान पर बनी राम मंदिर की भूमि है।

जब कोई उत्तर नहीं दे सका और केस मुसलमानों के पक्ष में जाने लगा तब शंकराचार्य पूज्य स्वामी श्री स्वरूपानंद सरस्वती जी के शिष्य न्यायालय में राम जी के पक्षकार और आज के ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य स्वामी श्री अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी गवाही देने के लिए न्यायालय में विशेषज्ञ के रूप में प्रस्तुत हुए। इन्होंने शास्त्र के सहित अनेक आधुनिक इतिहासकारों के प्रमाण मिलाकर लगभह 250 से अधिक प्रमाण न्यायालय में रखें जिसमें रामजन्मभूमि की विजय दिलाने वाला सबसे मुख्य प्रमाण था एक अंग्रेज हेन्स बेकर की पुस्तक। इस पुस्तक में राममंदिर का ठीक ठीक जियोग्राफिकल लोकेशन बताया गया है। अंग्रेज अधिकारी एडवर्ड के द्वारा 1902 में अयोध्या के सभी तीर्थस्थलों पर एक पत्थर गाड़ा था जिसके बारे में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी एवं इनके अधिवक्ता पी एन मिश्रा जी को पता थी। हेन्स बेकर की लिखी पुस्तक जिसमें एडवर्ड के द्वारा गाड़े गए पत्थरो की खोज करके अयोध्या और राम मंदिर का सारा वृतान्त लिखा हुआ था इस पुस्तक में यह स्पष्ट जानकारी थी कि रामजन्मस्थान कहाँ पर है और वो किस नम्बर के एडवर्ड के पत्थर के पास है?

जब न्यायालय को अधिवक्ता पी एन मिश्र ने एडवर्ड के पत्थरो का और हेन्स बेकर के पुस्तक का जिक्र किया तो न्यायालय ने इस पुस्तक को मंगवाया।

आश्चर्य यह था कि अगले दिन देशभर के सैकड़ो बड़े बड़े पुस्तकालयों में पता किया गया पर हर जगह से यह पुस्तक गायब थी पर सौभाग्य यह था कि इसकी एक प्रति शंकराचार्य स्वामी श्री अविमुक्तेश्वरानंद जी के पास थी जिसे न्यायालय में रखा गया। इस पुस्तक से प्रमाणित हो गया कि विवादित भूमि ही प्रामाणिक रामजन्मभूमि है।

शंकराचार्य जी के अधिवक्ता पी एन मिश्र जी ने पौराणिक प्रमाण के साथ साथ बाबर के समय का प्रमाण, ईस्ट इंडिया कंपनी के समय का प्रमाण और अंग्रेजी हुकूमत के समय का प्रमाण देकर यह सिद्ध किया कि विवादित भूमि ही राम जन्मभूमि है। और उस भूमि पर कभी कोई मस्जिद नहीं थी अतः मुसलमानों का कोई दावा नहीं सिद्ध होता।

वही दूसरी ओर रामभद्राचार्य ने फर्जी प्रमाण देकर के यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि बाबर ने मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाया था। संघ के समर्थक पक्ष के इस मान्यता की, कि वहाँ बाबर ने मस्जिद बनाई थी, के कारण न्यायालय ने अयोध्या में मुसलमानों को 5 एकड़ भूमि दी अन्यथा यदि कोई हिन्दू पक्ष मस्जिद को स्वीकार नहीं करता तो न्यायालय कभी मस्जिद के लिए जमीन नहीं देता। एक संघी समर्थक हिन्दूपक्ष के मानने के कारण सुप्रीम कोर्ट ने अन्य हिन्दू पक्षकारों की बात नहीं सुनी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब आपका एक हिन्दू पक्ष मान ही रहा है कि वहाँ मस्जिद थी भले बाबर जो कि शासक था ने बनवाया था अतः मुसलमानों को भी मस्जिद मिलना चाहिए। जिसका परिणाम यह हुआ कि अयोध्या में मस्जिद भी बन रहा है जो भविष्य बहुत बड़े विवाद का केंद्र बनेगा। अयोध्या में मस्जिद बनाने का सारा श्रेय संघ को जाता है।

इस मंदिर मामले में बहुत बड़ा षड़यंत्र हुआ है अन्यथा आज से 30 साल पहले ही समझौते के माध्यम से चुपचाप मंदिर मिल जाता और कोई विवाद भी नहीं होता पर संघ ने अपनी राजनैतिक तलाशने के लिए राम मंदिर का मुद्दा उठाया और आज हजारों लोगों की बली देकर इसे कब्जा लिया है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के समय भी हिन्दू मुसलमान में समझौता हो गया था पर संघ भाजपा ने इसे स्वीकार न करके कोर्ट चले गए जबकि समझौते में मुसलमानों ने अपना पूरा दावा बिना किसी शर्त के छोड़ दिया था यह बात ऑन रिकॉर्ड है।

न्यायालय के जजमेंट में न्यायाधीशों ने इस फैसले में अहम भूमिका निभाने के कारण शंकराचार्य स्वामी श्री स्वरूपानंद सरस्वती जी एवं स्वामी श्री अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी का नाम लेकर धन्यवाद ज्ञापित किया है जिसे आप पढ़ सकते हैं। जबकि इन धूर्त संगठनों के किसी भी योगदान का कोई जिक्र नहीं है।

भाईयों अभी राम मंदिर स्वतंत्र नहीं हुआ है। मुसलमानों के कब्जे से होते हुए यह धर्म विरोधी संगठन आरएसएस के कब्जे में चला गया जिसे मुक्त करवाना हम सब हिन्दुओं का धर्म है।

मन्दिर से विधर्मी संघियों को हटाना और अयोध्या से बाबरी मस्जिद को हटाना हम सब हिन्दुओं का लक्ष्य है। अभी लड़ाई खत्म नहीं हुई है अभी लड़ाई बहुत लंबी है।

हर हर महादेव

साभार

ISD News Network December 5, 2025
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