श्वेता पुरोहित :-
प्रिय मित्रों और पाठकों, आज से हम शुभारंभ कर रहे हैं गोविंद भक्त नरसी मेहता कि सम्पूर्ण भक्ति मय कथा सभी श्रवन करें।
मोहे आन मिलो श्याम,
बहुत दिन बीत गए राह तकत के हारी अँखिआ, फिर भी आस लगाए अँखियाँ जीवन कि हो गयी शाम
पुण्यभूमि आर्यावर्त के सौराष्ट्र प्रांत में जीर्णोदुर्ग नामक एक अत्यंत प्राचीन ऐतिहासिक नगर है जिसे आजकल जूनागढ कहते है। भक्त प्रवर श्री नरसिंह मेहता का जन्म लगभग संमवत चौदह सौ सतर में इसी जूनागढ में एक प्रतिष्ठित नागर ब्रह्ममण परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम था कृष्ण दामोदर दास तथा माता का नाम लक्ष्मीगौरी था, उनके एक और बड़े भाई थे, जिनका नाम था वणसीधर या वंशीधर। अभी वंशीधर की उम्र बाईस वर्ष और नरसिंह राम की पाँच वर्ष लगभग थी कि उनके माता पिता का देहांत हो गया और उसके बाद नरसिंह राम का लालन-पालन बड़े भाई तथा दादी ने किया। दादी का नाम था जयकुँवरी।
नरसिंह राम बचपन से गूँगे थे; प्रायः आठ वर्ष की उम्र तक उनका कण्ठ नहीं खुला। इस कारण लोग उन्हें “गूँगा” कहकर पुकारने लगे। इस बात से उनकी दादी जयकुवँरी को बड़ा कलेश ( दुःख ) होता था। वह बराबर इस चिन्ता में रहती थी कि मेरे पौत्र की जबान कैसे खुले। परंतु मूक को वाचाल कौन बनावे, पंगु को गिरिवर लाँघने की शक्ति कौन दे? जयकुँवरी को पूरा विश्वास था, ऐसी शक्ति केवल एक परम पिता परमेश्वर ही हैं; उनकी दया होने पर मेरा पौत्र भी तत्काल वाणी प्राप्त कर सकता है और साथ ही यह भी उसे विश्वास था कि उन दयामय जगन्नाथ की कृपा साधारण मनुष्यों को उनके प्रिय भक्तों के द्वारा ही प्राप्त हुआ करती है। अतएव स्वाभावतः ही उसमें साधु-महात्माओं के प्रति श्रद्धा और आदर का भाव था। जब और जहाँ उसे कोई साधु-महात्मा मिलते, वह उनके दर्शन करती और यथाशक्ति श्रद्धा पूर्वक सेवा भी करती।
कहते है श्रद्धा उत्कट होने पर एक न एक दिन फलवती होती ही है। आखिर जयकुँवरी की श्रद्धा भी पूरी होने का सुअवसर आया। फाल्गुन शुक्ल पंचमी का दिन था। ऋतुराज का सुखद साम्राज्य जगत भर में छा रहा था। मन्द-मन्द वसन्त वायु सारे जगत के प्राणियों में नव जीवन का संचार कर रहा था। नगर के नर-नारी प्रायः नित्य ही सायंकाल हाटकेशवर महादेव के दर्शन के लिए एकत्र हुआ करते; स्त्रियाँ मंदिर में एकत्र होकर मनोहर भजन तथा रास के गीत गाया करती। नित्य की तरह उस दिन भी अत्याधिक भीड़ थी। जयकुँवरी भी पौत्र को साथ लेकर हाटकेशवर महादेव के दर्शन को गयी। दर्शन करके लौटते समय उसकी दृष्टि एक महात्मा पर पड़ी, जो मंदिर के एक कोने में व्याघ्राम्बर पर पद्मासन लगाये बैठे थे। उनके मुख से निरन्तर ‘नारायण-नारायण शब्द का प्रवाह चल रहा था। उनका चेहरा एक अपूर्व ज्योति से जगमगा रहा था। देखने से ही ऐसा मालूम होता था जैसे कोई परम सिद्ध योगी हों। उनकी दिव्य तपोप्लब्ध प्रतिभा से आकृष्ट होकर जयकुँवरी भी अपने साथ की महिलाओं के संग उनके दर्शन करने के लिए गयी। उसने दूर से बड़े आदर और भक्ति के साथ महात्मा जी को प्रणाम किया और हाथ जोड़कर विनती की –
महात्मन! यह बालक मेरा पौत्र है; इसके माता-पिता का देहांत हो चूका है। प्रायः आठ वर्ष का यह होने चला, पर कुछ भी बोल नहीं सकता। इसका नाम नरसिंह राम है; परंतु सब लोग इसे गूँगा कहकर ही पुकारते है। इससे मुझे बड़ा कलेश होता है। महाराज ! ऐसी कृपा किजिए कि इस बालक की वाणी खुल जाय।
क्रमशः भाग – २
