संदीप देव। संघियों के प्रिय शंकराचार्य निचली अदालत और इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा फर्जी घोषित वासुदेवानंद सरस्वती जी हैं। यही नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने भी 2005 के अपने एक आदेश में वासुदेवानंद जी पर हाईकोर्ट द्वारा जारी निषेधाज्ञा को लागू रखा है। असल में शंकराचार्य मठों के विरुद्ध संघी हर साजिश वासुदेवानंद जी की आड़ में ही करते आए हैं। प्रयागराज के माघ मेले में उप्र सरकार के मेला प्रशासन ने पुनः वही साजिश किया है, जो संघी 1980 के दशक से शंकराचार्य परंपरा के विरुद्ध आज तक करते आ रहे हैं!
आइए ज्योतिष पीठ का पूरा केस अदालत के आदेशानुसार समझते हैं:-
१) वासुदेवानंद सरस्वती जी संघियों के प्रिय परंतु अदालत द्वारा फर्जी घोषित शंकराचार्य हैं। उन्हें दो-दो अदालत अपने आदेश में न केवल फर्जी ठहरा चुकी है, बल्कि साफ-साफ अपने आदेश में लिखा है कि वासुदेवानंद जी शंकराचार्य पद व नाम का प्रयोग नहीं कर सकते।
२) अदालत के इन आदेशों से परिचित हैं संघी, इसीलिए रामजन्म भूमि प्राण प्रतिष्ठा समारोह में छपे कार्ड पर संघी कब्जे वाले ट्रस्ट ने वासुदेवानंद जी के साथ स्वामी लिखा था, शंकराचार्य उनके लिए नहीं लिखा था! हालांकि हिंदुओं को मूर्ख बनाने के लिए रामजन्म भूमि ट्रस्ट में वासुदेवानंद जी को भी शामिल कर रखा है और मीडिया के जरिए उनके नाम में शंकराचार्य जोड़ कर झूठ भी फैलाते रहते हैं!
३) इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वर्ष 2017 के अपने आदेश में साफ लिखा है कि वासुदेवानंद जी ने फ्रॉड तरीके से वसीयत बनवाई और खुद को शंकराचार्य घोषित कर दिया। अदालत ने तो यह तक लिखा है कि वासुदेवानंद जी का संन्यास दीक्षा ही मान्य नहीं है, क्योंकि जब उन्होंने खुद को संन्यासी घोषित किया उस समय भी वह वेतनभोगी सरकारी कर्मचारी थे! अतः न तो वह अपने नाम के साथ शंकराचार्य लिख सकते हैं और न ही छत्र, सिंहासन आदि धारण कर सकते हैं।
४) अब संघियों को हिंदुत्व के नाम पर पाप करने और शंकराचार्यों को बदनाम करने के लिए एक वेतनभोगी शंकराचार्य चाहिए था, इसलिए हाईकोर्ट के आदेश की अवहेलना करते हुए वासुदेवानंद जी को नकली शंकराचार्य बनाए ये आज तक घूम रहे हैं! माघ मेले में ज्योतिष पीठाधीश्वर अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी के विरुद्ध मेला प्रशासन ने जो नोटिस जारी किया है, वह उसी फर्जीवाड़ा को पुनः स्थापित करने का प्रयास मात्र है!
५) हाईकोर्ट से पहले निचली अदालत ने वर्ष 1999 में वासुदेवानंद जी को फर्जी ठहराया था। फिर वासुदेवानंद हाईकोर्ट गये और वहां भी वर्ष 2017 में जब हाईकोर्ट ने उन्हें फर्जी ठहरा दिया तो इसके विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट गये, जहां वर्ष 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मेरे अगले आदेश तक ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती (ब्रह्मलीन) ही रहेंगे, न कि वासुदेवानंद।
६) इससे पूर्व वर्ष 2005 में वासुदेवानंद जी निचली अदालत द्वारा जारी निषेधाज्ञा को हटवाने सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे, उस समय भी सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि वासुदेवानंद जी पर निषेधाज्ञा जारी रहेगी अर्थात् वह न अपने आप को शंकराचार्य कह सकते हैं और न ही लिख सकते हैं!
७) फिर यह वासुदेवानंद शंकराचार्य कैसे हुए? कोई पूछे इन संघियों से? झूठ का परिणाम देखिए कि वासुदेवानंद को कुष्ठ रोग हो गया, फिर भी कर्म गति को समझने की जगह वह और उनके संघी चेले लगातार झूठ बोलते रहे हैं।


८) जब स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज वर्ष 2022 में ब्रह्मलीन हुए तो उनकी वसीयत के अनुसार ज्योतिष पीठ पर अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी को श्रृंगेरी पीठाधीश्वर ने बैठाया और उनका अभिषेक किया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने 2018 के आदेश में पहले ही कह दिया था कि विवाद के निस्तारण तक स्वरूपानंद सरस्वती जी ही ज्योतिष पीठाधीश्वर होंगे तो फिर उनकी मृत्यु के बाद उनकी वसीयत के अनुसार अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ही शंकराचार्य नियुक्त हुए, जिन्हें चारों पीठों में से बहुमत दो पीठ- श्रृंगेरी और द्वारक शारदा पीठ ने भी मान्यता प्रदान कर दिया। ज्योतिष पीठ पर विवाद स्वरूपानंद सरस्वती बनाम वासुदेवानंद सरस्वती था। इसमें अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी तो कहीं थे भी नहीं!
९) शंकराचार्यों की नियुक्ति के जो आधार आदि शंकराचार्य ने अपने ग्रंथ ‘मठाम्नाय महानुशासनम्’ में तय किया है और अभी तक सभी पीठों पर जो परंपरागत रूप से होता आया है, उसी के अनुसार अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य बने हैं!
१०) 11 सितंबर 2022 को स्वरूपानंद सरस्वती जी के ब्रह्मलीन होने के उपरांत वासुदेवानंद जी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी की नियुक्ति रुकवाने सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे। 14 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश किया कि 17 अक्टूबर 2022 या उसके बाद किसी का पट्टाभिषेक ज्योतिष पीठ पर नहीं होगा, जबकि अविमुक्तेश्वरानंद जी का पट्टाभिषेक चारों पीठों में सबसे वरिष्ठ शंकराचार्य श्रृंगेरी पीठाधीश्वर भारती तीर्थ जी महाराज 12 सितंबर 2022 को ही कर चुके थे। अतः बाद में आया सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी पर लागू ही नहीं होता।
११) उल्टा सुप्रीम कोर्ट के आदेश से वासुदेवानंद और उनके पीछे खड़े संघ की मंशा तो ध्वस्त हुई ही, इस आदेश ने नकली शंकराचार्य बनने वालों की पूरी दौड़ ही समाप्त कर दी। वासुदेवानंद जी सहित कम से कम चार संघी ज्योतिष पीठ पर शंकराचार्य के रूप में अपना पट्टाभिषेक कराने की तैयारी में थे, जो सुप्रीम कोर्ट के आदेश के कारण पट्टाभिषेक नहीं करा सके! वासुदेवानंद जी को चारों पीठों द्वारा मान्यता नहीं मिलने और पहले ही दो-दो अदालत द्वारा फर्जी घोषित होने के कारण उन्हें विलंब हुआ और तब तक सुप्रीम कोर्ट की निषेधाज्ञा लागू हो गई।
वासुदेवानंद जी के विकल्प के रूप में संघ ने जिन तीन-चार अन्य को शंकराचार्य बनाने के लिए खड़ा कर रखा था, वह भी सुप्रीम कोर्ट के 14 Oct 2022 के फैसले के कारण आज तक लाईन में ही खड़े हैं!
१२) संघी वासुदेवानंद जी ने सुप्रीम कोर्ट से भी एक छल किया। उन्होंने अविमुक्तेश्वरानंद जी का पट्टाभिषेक रुकवाने के लिए पुरी पीठाधीश्वर निश्चलानंद सरस्वती जी महाराज के नाम का फर्जी शपथ पत्र बनवाकर अदालत में दाखिल कर दिया। उस फर्जी शपथ पत्र में लिखा था कि ‘मैं अविमुक्तेश्वरानंद को मान्यता नहीं देता!’ बाद में पुरी पीठाधीश्वर का असली शपथ पत्र उनके अधिवक्ता के माध्यम से जब अदालत में पहुंचा तो वासुदेवानंद जी की पोल-पट्टी खुल गई!
१३) पुरी पीठाधीश्वर ने अपने वास्तविक शपथ पत्र में लिखा, ‘अविमुक्तेश्वरानंद जी ने न तो मुझसे समर्थन मांगा,न मैंने दिया!’ वैसे भी चार पीठों में से बहुमत अर्थात् दो पीठ अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी का समर्थन कर चुका था, ऐसे में पुरी पीठाधीश्वर के समर्थन की वैसे भी आवश्यकता नहीं थी।
१४) दूसरी ओर ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज की वसीयत को गुजरात के रजिस्ट्रार कार्यालय ने सही पाते हुए मान्यता दे दी। एक ही वसीयत के माध्यम से स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज ने ज्योतिषपीठ पर अविमुक्तेश्वरानंद जी को और शारदा द्वारका पीठ पर सदानंद सरस्वती जी को अपना उत्तराधिकारी बनाया है। गुजरात में ट्रस्ट और बैंक खाते आदि में गुरु के बाद शिष्य का नाम दर्ज कराने के लिए मठ की वसीयत को रजिस्ट्रार कार्यालय में दर्ज कराना होता है और उनकी मान्यता के बाद ही नामांतर होता है। अतः स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज की वह वसीयत सरकारी रजिस्ट्रार द्वारा भी मान्यता प्राप्त हो गई है, जिसके आधार पर अविमुक्तेश्वरानंद जी एवं सदानंद जी शंकराचार्य बने हैं।
१५) वासुदेवानंद जी की हार देखकर संघ ने एक गोविंदानंद नामक संन्यासी को अविमुक्तेश्वरानंद जी के विरुद्ध खड़ा किया। अभी हाल में ही दिल्ली हाईकोर्ट और गुजरात हाईकोर्ट ने अविमुक्तेश्वरानंद जी को ज्योतिष पीठ का असली शंकराचार्य मानते हुए गोविंदानंद की पीटीशन को रद्द कर दिया। दिल्ली हाईकोर्ट में तो गोविंदानंद ने कोर्ट की फटकार के बाद अपना पीटिशन खुद ही वापस ले लिया।
१६) दिल्ली और गुजरात हाईकोर्ट ने भी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी को असली शंकराचार्य माना है। वहीं सुप्रीम कोर्ट में अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी के विरुद्ध कोई मामला ही नहीं है, फिर भी संघी-सरकारी हिंदू जब-तब यह झूठ फैलाते रहते हैं कि अविमुक्तेश्वरानंद जी के पट्टाभिषेक पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा रखी है, जो पूरी तरह से निराधार है।
यह सब मैंने अपने वीडियो में कोर्ट के आदेश को साक्ष्य रूप में रखते हुए लगातार उद्घाटित किया है। शंकराचार्य जी के अधिवक्ता श्री पी.एन.मिश्र जी का साक्षात्कार कर लोगों तक सच पहुंचाने का भी प्रयास किया है, लेकिन संघी ठहरे हिटलर के प्रचार मंत्री गोयबल्स के चेले! अतः वह एक ही झूठ लगातार दोहराते रहते हैं! पढ़ाई-लिखाई और सच से अनजान हिन्दू बार-बार संघियों की झूठ का शिकार बनते और भ्रमित होते रहते हैं! मनुष्य हैं तो चेतन बनिए, भेड़ नहीं कि जो चाहे आपको हांकता रहे!
