संदीप देव। देश का मीडिया जब सत्ता के गलियारों में चारण-भाट बनकर मंजीरा बजा रहा था, जब कथित राष्ट्रीय पत्रकार कॉपियों के ‘डिजिटल मूल्यांकन’ को ‘डिजिटल इंडिया’ की एक और ऐतिहासिक छलांग बताकर कसीदे पढ़ रहे थे, ठीक उसी वक्त देश की राजधानी से दूर झारखंड के 12वीं कक्षा के एक 17 साल के छात्र सार्थक सिद्धांत ने वह काम कर दिखाया जिसने सत्ता के शीर्ष पर बैठे नीति-निर्माताओं की नींद उड़ा दी है।
सार्थक ने किसी अफवाह या राजनीतिक भाषण के भरोसे नहीं, बल्कि सीबीएसई (CBSE) के अपने ही आधिकारिक टेंडर दस्तावेजों और सूचना के अधिकार (RTI) से निकले कागजों को ढाल बनाकर शिक्षा मंत्रालय और सीबीएसई के भ्रष्टाचार की उस ‘क्रॉनी सेटिंग’ को चौराहे पर नंगा कर दिया है, जिसके नीचे देश के 17.5 लाख बच्चों का भविष्य कुचला जा रहा है।
जब देश में साख और तकनीक के मामले में टीसीएस (TCS) जैसी दिग्गज और भरोसेमंद सरकारी व वैश्विक कंपनियां मौजूद थीं, तो देश के सबसे बड़े स्कूल बोर्ड की कॉपियां जांचने का संवेदनशील ठेका एक ऐसी विवादित निजी कंपनी को क्यों और किसके इशारे पर थमाया गया, जिसका इतिहास खुद दागदार रहा है?
क्रॉनी कैपिटलिज्म की क्रोनोलॉजी: खेल को 4 पॉइंट्स में समझें!
सार्थक सिद्धांत के खुलासे और कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय (MCA) के सार्वजनिक दस्तावेज इस पूरे घपले की परत-दर-परत गवाही दे रहे हैं:-
दागी कंपनी का ‘नाम बदल’ मेकओवर।
जिस ‘कोएम्प्ट एडुटेक प्राइवेट लिमिटेड’ (COEMPT Edu Teck) को सीबीएसई ने ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) का ठेका दिया, वह कोई नई नवेली कंपनी नहीं है। इसका पुराना नाम ‘ग्लोबारेना टेक्नोलॉजीज’ है। यह वही कंपनी है जो 2019 में तेलंगाना के इंटरमीडिएट परीक्षा परिणामों में आई भीषण तकनीकी गड़बड़ी और भारी विसंगतियों के चलते विवादों के घेरे में आई थी, जिसके कारण कई निर्दोष छात्रों को मानसिक अवसाद में अपनी जान तक गंवानी पड़ी थी।
मनिपाल ग्रुप का पैसा और ‘अखंड भक्तों’ का रसूख।
बिजनेस रजिस्ट्री के दस्तावेज गवाही देते हैं कि कोएम्प्ट एडुटेक में मनिपाल ग्रुप (Manipal Group) का सीधा पैसा लगा है और इसके पास ही ज्यादातर शेयर्स हैं। इस मनिपाल ग्लोबल एजुकेशन सर्विसेज के चेयरमैन पद पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कट्टर समर्थक टीवी मोहनदास पई जैसा रसूखदार कॉरपोरेट व्यक्ति बैठता है, तो सवाल उठना लाजिमी है? इतना ही नहीं, भाजपा के पूर्व आईटी राज्य मंत्री राजीव चंद्रशेखर खुद मनिपाल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के पूर्व छात्र रहे हैं।
TCS को बाहर करने के लिए नियमों का चीरहरण
सीबीएसई ने अगस्त 2025 में जब रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (RFP) जारी किया, तो शुरुआत में ‘पूर्व में दागी या ब्लैकलिस्टेड’ रही कंपनियों को रोकने का सख्त नियम था। लेकिन जब दो राउंड की बिडिंग फेल हुई, तो पर्दे के पीछे से खेल बदला गया। तीसरे राउंड में नियमों को शिथिल (Dilute) करते हुए ‘पूर्व में ब्लैकलिस्टेड’ शब्द को बदलकर केवल ‘वर्तमान में ब्लैकलिस्टेड’ कर दिया गया, ताकि कोएम्प्ट को तकनीकी रूप से रेस में बनाए रखा जा सके और अनुभव के कड़े मानकों को जानबूझकर घटाकर टाटा (TCS) जैसी पारदर्शी कंपनियों को रेस से बाहर का रास्ता दिखाया जा सके।
काल्पनिक रिश्तों की आड़ में प्रशासनिक मिलीभगत।
यद्यपि सोशल मीडिया पर कंपनी के डायरेक्टर राधाकृष्णन जयरामन को शिक्षा मंत्री का ‘सगा चचा’ और उनकी बेटी का ‘लोकल गार्जियन’ बताने वाले दावे पारिवारिक तौर पर प्रमाणित नहीं होते हैं, लेकिन पारिवारिक रिश्ते न होना इस प्रशासनिक मिलीभगत के अपराध को कम नहीं करता। असली रिश्ता खून का नहीं, बल्कि ‘कॉरपोरेट नफे और राजनीतिक संरक्षण’ का है, जिसके तहत एक दागी ट्रैक रिकॉर्ड वाली कंपनी को देश की सबसे संवेदनशील परीक्षा की कॉपियों से खेलने की खुली छूट दे दी गई।
नैतिक जिम्मेदारी का ढोंग और ‘साहब’ का मौन।
जब पानी सिर से ऊपर चला गया, कॉपियों में छात्रों की हैंडराइटिंग बदलने के सबूत सामने आने लगे, री-इवैल्यूएशन का पोर्टल बार-बार क्रैश होने लगा और छात्रों का आक्रोश सड़कों पर आ गया, तब केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने झट से कैमरे के सामने आकर ‘नैतिक जिम्मेदारी’ ओढ़ ली।
संपादकीय टिप्पणी:-
India Speak Daily पूछता है कि मिस्टर धर्मेंद्र प्रधान, यह नैतिक जिम्मेदारी का मुखौटा आखिर किसे बचाने के लिए पहना गया है? क्या यह ‘नैतिकता’ कोई प्रशासनिक सुरक्षा कवच है ताकि जनता का गुस्सा शांत हो जाए और सीबीएसई के उन बड़े मगरमच्छों और नीति-निर्माताओं तक जांच की आंच न पहुंचे जिन्होंने टेंडर की शर्तों को बदला था?
जब मामला देश के 17.5 लाख बच्चों की मेहनत और उनके मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा हो, तो उसे महज “एक तकनीकी चूक” या “पहली बार का अनुभव” कहकर रफा-दफा नहीं किया जा सकता। यह ‘प्रशासनिक चूक’ नहीं, बल्कि देश की भावी पीढ़ी के खिलाफ की गई ‘आपराधिक लापरवाही’ है। और हमेशा की तरह, इस पूरे ‘एजुकेशनल कैटस्ट्रोफी’ पर हमारे प्रधानसेवक मौन हैं।
परीक्षा पे चर्चा करने वाले प्रधानमंत्री डिजिटल गवर्नेंस की इस सबसे शर्मनाक विफलता पर चुप क्यों हैं? क्या ‘डिजिटल इंडिया’ का मतलब सिर्फ निजी कंपनियों की तिजोरियां भरना और छात्रों को अवसाद की भट्टी में झोंकना रह गया है?
हमारी मांग है कि सिर्फ री-इवैल्यूएशन नहीं, स्वतंत्र न्यायिक जांच हो
12वीं कक्षा के अंक किसी छात्र के लिए सिर्फ कागज का टुकड़ा नहीं होते, वे उसके करियर, उसके मां-बाप के सपनों और उसकी जिंदगी की दिशा तय करते हैं। सीबीएसई ने कॉपियों की हेराफेरी करके लाखों बच्चों के भरोसे की संस्थागत हत्या की है।
सीबीएसई का यह तर्क कि ‘हैक होने का दावा सिर्फ डमी पोर्टल का था’, उनके इस पाप को नहीं धो सकता कि मूल मूल्यांकन प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर धांधली हुई है। कॉपियां धुंधली हैं, प्रश्नों को बिना जांचे छोड़ा गया है, और छात्रों की उत्तर पुस्तिकाएं आपस में बदल चुकी हैं।
India Speak Daily बेहद साफ और कड़े शब्दों में यह मांग करता है कि छात्रों को केवल ‘पुनर्मूल्यांकन’ के चक्कर में उलझाकर मामले को दबाने की कोशिश बंद की जाए। इस पूरे टेंडर घोटाले और मूल्यांकन की धांधली की एक स्वतंत्र न्यायिक जांच (Independent Judicial Inquiry) होनी चाहिए। टेंडर की शर्तें बदलने वाले अधिकारियों को तुरंत सस्पेंड किया जाए और कोएम्प्ट जैसी दागी कंपनियों को हमेशा के लिए ब्लैकलिस्ट कर उनके खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज हो। देश का युवा अब इस क्रॉनी सेटिंग और सरकारी निर्लज्जता को और बर्दाश्त नहीं करेगा।
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शिक्षा मंत्री का पद किसी विद्वान और जिम्मेदार व्यक्ति के पास होना चाहिए,न कि किसी भी ऐरे गैरे के पास! जिस के पास बेशर्मी के अलावा और कुछ नहीं है।
सबकुछ सहन कर लेंगे पर बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ बिल्कुल सहन नहीं!!
मुंबई एयरपोर्ट का ठेका GMR से छीनकर अडानी को देने में भी तो इसी तरह टेंडर शर्तों को ढीला किया गया था। मॉडी सरकार के सारे काम ऐसे ही हैं। मुझे आश्चर्य तो तब होता है जब द्वारका एक्सप्रेस वे, और भारतमाला प्रोजेक्ट में CAG ने घोटाला बताया है तो विपक्ष /कांग्रेस उसे क्यों नहीं उठाता है ????