वोट-चोर क्यों कुर्सी छोड़े ?
चोर – चोर मौसेरे – भाई , साथ जियेंगे साथ मरेंगे ;
चोरों की बारात है पार्टी , साथ – साथ सारे डूबेंगे ।
जिस जहाज का नाम है भारत , उसमें छेद कर दिया है ;
उसे डुबा के ही दम लेंगे , इन सबने ये ठान लिया है ।
वोट-चोर क्यों कुर्सी छोड़े ? क्या गुनाह कर दे बेलज्जत ?
सत्ता के मजे लूटने इसको , इसे चाहिये पूरी लज्जत ।
पूरी-दुनिया में घूम रहा है , पता नहीं क्या-क्या करता ?
जब भी मिले सुंदरी-नेता , पकड़े हाथ हिलाता रहता ।
कभी नहीं सत्ता छोड़ेगा , क्योंकि जेल चला जायेगा ;
सह – अपराधी संगी – साथी , सभी को लेकर जायेगा ।
चले मुकदमा सच्चाई से , सबको पूरी सजा मिलेगी ;
हत्यारे हैं बहुत से नेता , सजा मौत की उन्हें मिलेगी ।
अब केवल जनता में ताकत , रौद्र-रूप अपना दिखलाये ;
बांग्लादेश – नेपाल – श्रीलंका , वही कहानी दोहराये ।
छलक रहा है सब्र का प्याला,कभी भी कुछ भी हो सकता है ;
चुनाव-आयोग की ऐसी-तैसी, सुप्रीम-कोर्ट भी कर सकता है ।
सुप्रीम – कोर्ट से भी बढ़ करके , देश की जनता होती है ;
सुप्रीम-कोर्ट ढीले मत पड़ना , क्रांति भी खूनी होती है ।
खूनी – क्रांति बचा लो भैया ! न्याय की रक्षा करना है ;
चले हथौड़ा न्याय का अब तो , बहुत शीघ्र ये करना है ।
अपने बारे में मत सोचो , हमको देश बचाना है ;
देश रहेगा हम भी रहेंगे , वरना सबको मिट जाना है ।
भ्रष्टाचार की आग भयानक , पूरा – भारत जल जाना है ;
सुप्रीम-कोर्ट तुम निर्भय रहना , इंसाफ की रक्षा करना है ।
वरना वो दिन दूर नहीं है , जब भारत मिटने वाला है ;
किसी तरह से बचा था अब तक, पर अब न बचने वाला है ।
क्योंकि चौकीदार चोर है , रक्षक बनते जाते भक्षक ;
खून चूसते हैं जनता का , जहरीले ये नाग हैं तक्षक ।
दूर – दूर तक कोई नेता , ऐसा नहीं दिखाई देता ;
केवल सच्ची – बात करे जो , धर्म – मार्ग पर जो चलता ।
तुष्टिकरण की बात मत करो , जड़ से इसे मिटाना है ;
हर तरह योग्यता का जो दुश्मन , आरक्षण को हटाना है ।
भ्रष्टाचार की सन्तानें हैं , तुष्टीकरण और आरक्षण ;
जब तक जिंदा रहेंगे तीनों , कभी नहीं हो देश का रक्षण ।
सुप्रीम-कोर्ट तुम कर सकते हो , वरना जनता आ सकती है ;
मार-काट भी हो सकती है , नदी खून की बह सकती है ।
“जय सनातन-धर्म”, रचनाकार : ब्रजेश सिंह सेंगर “विधिज्ञ”
