श्वेताभ पाठक ( श्वेत प्रेम रस ) प्रश्न: भइया जी प्रणाम! चूँकि नवरात्र का सन्दर्भ है शायद इसीलिए ये प्रश्न मन में आया कि प्रभु नीलकंठ भोलेनाथ क्रोधित माता काली के पैरों के नीचे क्यों आए थे? क्या इस लीला का कोई प्रतीकात्मक अर्थ है? कृपया बताने की कृपा करें
उत्तर : आदरणीय श्री श्वेताभ पाठक जी द्वारा
यह है तो बहुत लंबा ।
शुरू से समझाना पड़ेगा ।
लेकिन प्रयत्न करता हूँ कि crisp and short में आपको समझा दूँ ।
देखिये जब सृष्टि का प्रादुर्भाव हुआ तो कुछ विशेष शक्तियों ने सृष्टि के संचालन या विस्तार में बाधा पहुँचाने की चेष्टा की ।
यह होता ही है ।
जब कोई भी उत्पत्ति होती है तो उसके byproducts या उसके विकार भी जन्मते हैं ।
जैसे Industries के उत्पादन के समय Pollution या Hazardous चीजें निकलती हैं ।
जिसे अपशिष्ट कहते हैं ।
जैसे हमारे शरीर से किडनी रक्त शोधित कर मूत्र निकालता है ।
Nutrients ग्रहण कर मल निकालता है ।
ऐसे ही सृष्टि की जब उत्पत्ति और विस्तार चल रहा था तो इसी के विकार से कुछ नाकारात्मक शक्तियों का प्रकाट्य हुआ ।
जैसे रुरु ।
मधु कैटभ
शुंभ निःशुम्भ
रक्त बीज आदि ।
अब इन्होंने देवताओं के कार्य में मतलब सृष्टि के विभिन्न अवयवों को संचालित करने के माध्यम को बाधा पहुँचाने शुरू कर दिया ।
इन नाकारात्मक शक्तियों को किसी भी विधा से नष्ट नहीं किया जा पा रहा था ।
क्योंकि ये नष्ट होते कुँवारी शक्ति से ।
अर्थात जिस शक्ति को शक्तिमान ने ग्रहण नहीं किया हो ।
अब समझिये ।
शक्ति जो को अपनी सत्ता को प्रतिष्ठित करने के लिए शक्तिमान की आवश्यकता पड़ती है जो इस शक्ति को धारण कर सके ।
ऐसे समझिये जैसे मैं आपसे बोलूँ कि अग्नि ले आओ ।
तो आप क्या लाएंगे ??
जलती हुई लकड़ी ।
तो क्या लकड़ी आग है ??
नहीं लेकिन आग को आश्रय या धारण लकड़ी ने किया।
आग की स्वयं की कोई सत्ता नहीं होगी जब तक वह लकड़ी या कोई भी Fuel या ज्वलनशील पदार्थ का आश्रय न ग्रहण करे ।
तो ये ऊर्जाएं थी महिषासुर
महिष का अर्थ होता है राज करने वाला । राजा या सम्राट ।
सुना होगा आपने बाहुबली में महिष्मति ।
तो ये महिष्मति का अर्थ होता है राज्य करने की मति ।
तो इस शक्ति या ऊर्जा ने देवों पर नाकारात्मक रूप से उनकी बुद्धि या शक्ति पर अधिकार कर लिया ।।
जिसके कारण सृष्टि में हलचल मच गई ।
क्योंकि उनकी बुद्धि महिष असुर अर्थात गलत तरीके से राज्य करने की बुद्धि से ग्रसित हो गयी ।
इसी को भैंस के रूप में प्रदर्शित किया गया ।
भैंसा के कोई बुद्धि नहीं होती ।
वह जड़ होता है ।
इसी जड़त्व ने सृष्टि पर अधिकार कर उसके सृष्टि की प्रक्रिया को बाधित किया ।
महिष का अर्थ भैंसा नहीं होता । यह ध्यान दीजिए ।
चूंकि महिषासुर को भैंसा प्रतीक से प्रदर्शित किया गया , तभी से महिष का अर्थ भैंसा होने लगा ।
अब इस जड़त्व शक्ति का नाश अकेली शक्ति , जो बिना शक्तिमान के हो , या जो बिना धारणत्व के हो , उससे होना था ।
इसी हेतु फिर महालक्ष्मी द्वारा इस जड़त्व राज्य करने की शक्ति जिसे आप महिषासुर कहते हैं , उसका नाश किया ।
अब ये महालक्ष्मी कौन हैं ??
ये रज शक्ति ।
रजोगुण का विकार के द्वारा ही इस महिष असुर का जन्म हुआ था ।
इसी हेतु महालक्ष्मी जो रजोगुण की अधिष्ठात्री हैं , उनके द्वारा इस रजोगुण के वैकारिक शक्ति का वध हुआ ।
महालक्ष्मी कौन है ??
महा का अर्थ होता है महत्त्वत्व ।
इस महतत्त्व के साथ जो शक्ति किसी भी क्रिया को लक्षित करके सृष्टि के निर्माण या विस्तार का कारण बनती है , उस शक्ति को महालक्ष्मी कहा जाता है ।
फिर अब आईये शुम्भ निःशुम्भ पर ।
शुं का अर्थ होता है अत्यंत तीव्रगामी ।
भ का अर्थ होता है प्रकाश या वह शक्ति जिससे सृष्टि का कार्य चल रहा था ।
शुम्भ वह वैकारिक शक्ति थी ज्ञान क्रिया की , प्रकाश या ज्ञान की , जिससे मोहित होकर ज्ञान अतिशीघ्र अवस्था को प्राप्त होकर विकार उत्पन्न कर सृष्टि के कार्य में बाधा पहुँचा रहा था ।
निशुंभ का अर्थ बिल्कुल इसके विपरीत था ।
एक शक्ति बहुत तेज थी तो निशुम्भ शक्ति बहुत ही धीरे ।
ऐसे समझिये जैसे किसी Production की मशीन अगर बहुत तेज कार्य करने लगे या बहुत धीरे तो उससे जो प्रोडक्ट बनेगा उसमैं विकृति आएगी ।
तो इसी ज्ञानक्रिया की विकृत शक्ति को नाश करने हेतु , महासरस्वती का प्रादुर्भाव हुआ ।
अब महा का अर्थ बता दिया है ।
सरस्वती का अर्थ है वह ज्ञान शक्ति जिसके कारण सृष्टि का संचालन हो रहा था ।
इसी हेतु शुंभ निःशुम्भ जो कि ज्ञान क्रिया के विकृत नकारात्मक शक्ति थी , उनका वध या नाश इन्हीं महासरस्वती से हुआ ।
ऐसे ही सब चण्ड मुण्ड से लेकर रक्तबीज आदि भी ।
अब महाकाली का अर्थ है तामस वैकारिक शक्ति ।
जो संहार की शक्ति है ।
ये संहार की तमोगुण की अधिष्ठात्री शक्ति थी ।
अब जब यह शक्ति धारण करने के तत्त्व से रहित थी , अर्थात कुंवारी थी , मतलब शक्तिमान से रहित थी , शिव से रहित थी जो इन्हें धारण करता , तो तमोगुणी शक्ति होने के कारण इस शक्ति का स्तम्भन करना कठिन हो गया ।
यह तमोगुणी शक्ति उन नकारात्मक शक्तियों का नाश करने के पश्चात abandoned अवस्था को प्राप्त हो गयी ।
मतलब यह निरंकुश हो गयी ।
तब इस शक्ति को स्तम्भित और धारण करने के लिए स्वयं शक्तिमान को इनके नीचे आना पड़ा इन्हें धारण करने के लिए ।
शक्तिमान के बिना यह शक्ति सम्भल नहीं पा रही थी और सृष्टि का विनाश ही होने लगा उल्टा ।
तो शक्तिमान को इस कुँवारी शक्ति को धारण करने के लिए भगवान शिव को इनके नीचे आना पड़ा ।
जब इन्होंने इस शक्ति को धारण किया तब जाकर यह शक्ति शांत हुई ।
तो इन सब बातों को तत्त्वज्ञान को इन सब माध्यम से दर्शाया गया ।।
Shwetabh Pathak
Shwet Prem Ras
