संदीप देव। जीवन की आपाधापी में कुछ क्षण ऐसे आते हैं, जो अंतर्मन को एक गहरे ठहराव और कृतज्ञता से भर देते हैं। वे क्षण सामान्य नहीं होते; वे किसी अनुष्ठान की तरह पवित्र और किसी विचार की तरह शाश्वत बन जाते हैं। कल का दिन मेरे लिए कुछ ऐसा ही भावुक, पावन और अविस्मरणीय दिन था, जब भारतीय पत्रकारिता के भीष्म पितामह और देश के लोकतांत्रिक आंदोलनों के अग्रदूत, आदरणीय श्री रामबहादुर राय जी का हमारे घर शुभागमन हुआ।

राय साहब का व्यक्तित्व केवल एक वरिष्ठ पत्रकार का नहीं है, वे स्वतंत्र भारत की चेतना, उसके संघर्षों और उसकी वैचारिक यात्रा के जीवंत दस्तावेज़ हैं। 1974 के उस दौर को याद कीजिए, जब सत्ता की निरंकुशता के विरुद्ध लोकनायक जयप्रकाश नारायण के आह्वान पर देश की तरुणाई उद्वेलित हो उठी थी। राय साहब उस ऐतिहासिक ‘जेपी आंदोलन’ के प्रमुख सूत्रधारों और रणनीतिकारों में थे। जब 1975 में आपातकाल का काला साया देश पर छाया, तो तानाशाही के आगे घुटने टेकने के बजाय उन्होंने जेल की सलाखों को चुना। मीसा (MISA) एक्ट के तहत सबसे पहली गिरफ्तारी झेलने वालों में वे अग्रिम पंक्ति में खड़े थे।

लोकतंत्र को बचाने की उस तपन से तपकर निकले राय साहब ने जब पत्रकारिता की मुख्यधारा में कदम रखा, तो समझौतावादी दौर में भी ‘मूल्यों की पत्रकारिता’ का परचम कभी झुकने नहीं दिया। हवाला कांड जैसे अन्वेषी खुलासों से सत्ता के गलियारों में हलचल मचाने वाले राय साहब की कलम ने हमेशा सत्य की पहरेदारी की। उनकी पुस्तकें केवल कागज़ पर उकेरे गए शब्द नहीं हैं, बल्कि समकालीन राजनीतिक इतिहास का आईना हैं। राष्ट्र, साहित्य और पत्रकारिता में उनके इसी तपस्वी अवदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें ‘पद्मश्री’ और तत्पश्चात देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पद्म भूषण’ से विभूषित किया। वर्तमान में वे ‘इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र’ (IGNCA) के अध्यक्ष के रूप में भारत की सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत को संवार रहे हैं।

उम्र के इस ढलते पड़ाव और अस्वस्थता के चलते राय साहब अब शायद ही किसी के घर जाते हैं। उनके लिए यह एक श्रमसाध्य कर्म है। लेकिन मेरे प्रति उनका जो अगाध वात्सल्य, अपनत्व और आशीर्वाद रहा है, वह किसी दैवीय कृपा जैसा है। वे इससे पहले भी मेरे नए घर के गृहप्रवेश पर पधारे थे और कल पुनः जब उन्होंने हमारे आशियाने में अपने पावन कदम रखे, तो लगा जैसे हमारी देहरी कृतार्थ हो गई।

बैठक में उनके सामने बैठकर उनसे संवाद करना मेरे लिए पत्रकारिता और जीवन मूल्यों की पाठशाला में बैठने जैसा था। उनके चेहरे की झुर्रियों में संघर्षों की चमक थी और उनकी सौम्य वाणी में सदियों का अनुभव। उनके साथ बिताया हर पल मुझे यह सिखा गया कि पत्रकारिता केवल एक पेशा नहीं, बल्कि सत्य के प्रति निष्ठा और मानवीय संवेदना की निरंतर साधना है।
राय साहब का यह सान्निध्य, उनका हाथ मेरे कंधे पर होना और उनका स्नेह—यही वह संबल है जो मुझे अपनी वैचारिक और पत्रकारीय यात्रा में अडिग रहने की शक्ति देता है। ईश्वर से करबद्ध प्रार्थना है कि वे श्रद्धेय राय साहब को उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु प्रदान करें, ताकि हम जैसे कलम के सिपाहियों को उनका मार्गदर्शन सदैव प्राप्त होता रहे।

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