संदीप देव। संघियों की पुरानी आदत है, अपने स्वयंसेवकों, कार्यकर्ताओं, समर्थकों और हिंदुओं की मौत पर चुप रह कर वोट मिलने की प्रतीक्षा करना! लेकिन यति नरसिंम्हानंद कैसे रुक जाएं अपने एक्स मुस्लिम सलीम भाई के लिए! यति को राजनीति थोड़े न करना है! वह तो भावनात्मक भोले संन्यासी हैं जो धर्म के लिए और अपनों के लिए मरने-मिटने को तैयार रहते हैं।
आज सलीम भाई अस्पताल में जीवन और मौत के बीच झूल रहे और यति उनसे मिलने के लिए छटपटा रहे हैं, बेचैन हैं और यही बेचैनी आक्रोश बनकर उनकी जिह्वा से निकल रही है! उन्हें योगी की उप्र पुलिस ने मंदिर में कैद कर रखा है कि आप सलीम भाई को देखने नहीं जा सकते!
यति छटपटा रहे हैं! वो क्या करें? भाजपा की राजनीति तो बढ़ी ही है अपनों की लाशों पर! क्या यति नहीं जानते कि सत्ता को उनकी लाश गिराने में भी संकोच नहीं होगा? यति की लाश से भी ढेर सारे हिंदू वोट भाजपा को मिल जाएंगे, हिंदुओं को उकसा कर, जैसे अयोध्या और गोधरा में कारसेवकों की मौत और हाल में उदयपुर में कन्हैयालाल की मौत पर इन्हें वोट मिला था?
