Pankaj Kumar Jat: 14 जून 1985 को जब पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने 462 करोड़ की आधिकारिक लागत से वाराणसी के दशाश्वमेध घाट से ‘गंगा एक्शन प्लान’ (GAP) की शुरुआत की थी, तब वह कैमरों के सामने चुनावी नौटंकी करने नहीं, बल्कि सनातन की सबसे पवित्र जीवनदायिनी को प्रदूषण मुक्त करने का एक वैज्ञानिक और प्रशासनिक संकल्प था।
यह वही वैचारिक और सनातनी दृढ़ता थी जिसके तहत इंदिरा गांधी ने 1971 में 161 करोड़ की भारी-भरकम राशि वाले ‘प्रिवी पर्स’ को समाप्त कर राजा-महाराजाओं के विशेषाधिकार खत्म किए और देश के खजाने को आम जनता के लिए खोला।
आज खुद को विश्व के सबसे बड़े हिंदू धर्म के ठेकेदार बताने वाले और उनकी अंधभक्त सेना जरा इन तारीखों और सरकारी आंकड़ों को अपनी याददाश्त में दर्ज कर ले, ताकि उन्हें पता चले कि सनातन की सेवा विज्ञापनों से नहीं, बल्कि ठोस नीतिगत और ऐतिहासिक फैसलों से होती है।
इतिहास में पहली बार किसी सरकार ने हिंदुओं की आस्था पर डाका डालते हुए धार्मिक सरायों, धर्मशालाओं, और यहां तक कि मंदिरों के पवित्र प्रसाद, घी, और तेल जैसी बुनियादी पूजा सामग्रियों पर 5% से लेकर 18% तक का टैक्स ठोक दिया।
यह किस प्रकार का हिंदुत्व है जो भक्तों की जेब पर टैक्स की लाठियां चलाकर अपनी राजनीतिक रोटियां सेक रहा है? क्या इसी को ‘राम राज्य’ कहते हैं जहां गरीब श्रद्धालु के प्रसाद पर भी सरकार का टैक्स वसूलने वाला गिद्ध बैठा हो?
इस देश की जनता को यह याद रखना होगा कि 1 फरवरी 1986 को राजीव गांधी सरकार के कार्यकाल में ही फैजाबाद जिला अदालत के आदेश के बाद अयोध्या में राम जन्मभूमि के ताले खुलवाए गए थे, जिससे आम श्रद्धालुओं को वहां नियमित दर्शन और पूजा-अर्चना की अनुमति मिली थी।
इतना ही नहीं, नवंबर 1989 में राजीव गांधी सरकार ने ही विश्व हिंदू परिषद (VHP) को अयोध्या में राम मंदिर के शिलान्यास की आधिकारिक अनुमति दी थी, और तत्कालीन गृह मंत्री बूटा सिंह स्वयं इस प्रक्रिया में शामिल हुए थे।
इसी दौर में 1987-1988 के दौरान दूरदर्शन पर पहली बार ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ जैसे कालजयी धार्मिक धारावाहिकों का प्रसारण शुरू करवाया गया, जिसने देश भर में एक अभूतपूर्व सांस्कृतिक पुनर्जागरण का काम किया, जिसे आज की सरकार अपना बताकर भुनाती है।
वाराणसी में ‘काशी विश्वनाथ कॉरिडोर’ के नाम पर आधुनिकीकरण के छलावे में सैकड़ों वर्ष पुराने दर्जनों ऐतिहासिक विग्रहों, प्राचीन छोटे मंदिरों और पारंपरिक सनातन धरोहरों को मलबे के ढेर में तब्दील कर दिया गया।
स्थानीय संस्कृतिविदों और सनातनी संतों ने इसे सनातन संस्कृति के मूल स्वरूप पर सीधा प्रहार और जुर्म बताया था, लेकिन सत्ता की हनक में किसी की नहीं सुनी गई।
केदारनाथ और अन्य चार धामों का जिस तरह अंधाधुंध व्यवसायीकरण करके उसे ‘वीआईपी टूरिज्म’ का अड्डा बना दिया गया है, उसने हिमालय के संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र को तो तबाह किया ही, साथ ही आम गरीब सनातनी को अपनी ही आस्था के केंद्रों से दूर कर दिया है।
इसके विपरीत, यदि हम वास्तविक मानव विकास और राष्ट्र निर्माण की तुलना करें, तो कांग्रेस के कार्यकाल ने सनातन और देश दोनों को मजबूत किया।
1986 में राजीव गांधी की राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत ग्रामीण क्षेत्रों के मेधावी बच्चों के लिए नवोदय विद्यालयों की स्थापना की गई और C-DOT (1984) के माध्यम से डिजिटल क्रांति की नींव रखी गई।
जवाहरलाल नेहरू के युग में IIT खड़गपुर (1951), AIIMS दिल्ली (1956) और ISRO की नींव (INCOSPAR – 1962) रखी गई, जिन्हें “आधुनिक भारत के मंदिर” कहा गया।
1970 के दशक में इंदिरा गांधी की ‘हरित क्रांति’ ने भारत को अनाज के मामले में आत्मनिर्भर बनाया, जिससे करोड़ों भारतीयों और सनातनी हिंदुओं का पेट भरा।
वास्तविक राष्ट्र निर्माण नागरिकों की बौद्धिक और आर्थिक प्रगति से होता है, न कि धर्म के नाम पर नफरत फैलाने से। आज देश में बेरोजगारी की दर 8% के पार पहुंच चुकी है, युवा सड़कों पर हैं, और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में गौ-संरक्षण के बड़े-बड़े दावों के बावजूद लाखों आवारा गोवंश बुनियादी सुविधाओं के अभाव में तड़प रहे हैं।
यह सरकार केवल धर्म के नाम पर जनता को प्रताड़ित कर रही है और अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए नफरत की राजनीति कर रही है।
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