जिनको समझा हिंदू-नायक , सब के सब निकले खलनायक ;
कानून का शासन दे न पाते , पूरी तरह से नालायक ।
इनकी राजनीति है साजिश, धोखेबाजी है और कपट है ;
गौ-गीता-गंगा को खतरा , “धर्म-सनातन” को संकट है ।
कालनेमि बन चुके ये नेता , हिंदू को धोखा देते हैं ;
गेरुआ-चोला ओढ़ रखा है, जिसको अपमानित करते हैं ।
षडयंत्रों की राजनीति है , नये-नये षड्यंत्र रच रहे ;
शांति का मजहब कहने वाले, “धर्म-सनातन” नष्ट कर रहे ।
धर्महीन – अपराधी – नेता , अपराधी – अफसर पाल रहे ;
गिरोहबंद – अपराधी ये सब , भारत को बर्बाद कर रहे ।
पूरा जंगल – राज देश में , चोर बन गये चौकीदार ;
रक्षक बनते जाते भक्षक , नाव डुबोता खेवनहार ।
बीच-भंवर में देश की नैया , ये नाविक देश डुबा देगा ;
फौरन इस नाविक को बदलो, वरना डूब के मरना होगा ।
ज्यादा मत सोचो आगा-पीछा , वरना नौका डूब जायेगी ;
इस नाविक को उठाके फेंकों , तब ही नौका बच पायेगी ।
देश – प्रदेश के यही हाल हैं , हिंदू – जनता बेहाल है ;
आंख मूंदकर किया भरोसा , उसके कारण ये हाल है ।
समझदार बन जाओ हिंदू ! अज्ञान की निद्रा त्यागना होगा ;
स्वार्थ,लोभ,भय,लालच छोड़ो, अच्छी-सरकार बनाना होगा ।
कार्यकाल हर-बार बदलना , जब-तक राजनीति गंदी है ;
ताश के पत्तों की तरह से फेंटो , जब-तक सरकारें नंगी हैं ।
कुर्सी से नहीं चिपकने देना , चिपकू-नेता को मार भगाओ ;
एक-बार के बाद हराओ , सरकारों को मत दोहराओ ।
लोक-सेवक जनता के नौकर , नेता-अफसर व न्यायाधीश ;
इन सबको औकात दिखाओ , “धर्म-सनातन” का आशीष ।
धर्मनिष्ठ ही हो सकता है , सत्यनिष्ठ व चरित्रवान ;
“धर्म-सनातन” के दुश्मन हैं, लोक-सेवक जो भी शैतान ।
ये शैतान देश पर काबिज , शैतानी – साम्राज्य है ;
इनसे मुक्ति पाना होगा , लाना हमको “राम-राज्य” है ।
“धर्म-सनातन” में ही क्षमता , “राम-राज्य” को लाने की ;
हिंदू ! इसको साकार बनाओ , हर-कोशिश हो पाने की ।
“शंकराचार्य” वरदान हमारे , धर्म – मार्ग दिखलाते हैं ;
कौन मार्ग कंटक से भरा है ? हमको ये बतलाते हैं ।
सर्वोत्तम ये मार्ग बताते , हिंदू ! इस पर चलना है ;
दैहिक – दैविक – भौतिक तापा , सारे – तापों से बचना है ।
“जय सनातन-धर्म”, रचनाकार : ब्रजेश सिंह सेंगर “विधिज्ञ”
