गणतंत्र-दिवस बस बचा नाम का
गणतंत्र-दिवस बस बचा नाम का , संविधान की पूर्ण उपेक्षा ;
विकृत-लोकतंत्र भारत का , अच्छे-शासन की नहीं अपेक्षा ।
चोर – डकैती लूट – मार है , सीमाहीन है भ्रष्टाचार ;
सदाचार हो गया लुप्त है , शासन करता है कदाचार ।
मूलाधिकार की नहीं है रक्षा , न्यायपालिका असफल है ;
लूटो-खाओ-मौज मनाओ , न्याय तो पूरी तरह विकल है ।
न्याय की देवी न्याय को तरसे, अन्याय के बादल बरस रहे ;
न्याय का शासन है कागज पर , न्याय को हिंदू तरस रहे ।
गंगा – स्नान करने से रोका , धर्म के “धर्माधीश” को ;
सरकारी-बाबा सब पालतू-बाबा, ये शौक है सत्ताधीश को ।
सत्ताधीशों के पालतू-बाबा , शंकराचार्यों पर भौंक रहे ;
इतने निकृष्ट हो चुके हैं शासक , धर्म का पालन रोक रहे ।
महा – अधर्मी राजनीति है , पूरी तरह विधर्मी है ;
मानव-धर्म तक नहीं जानते , बस केवल हठधर्मी है ।
कितना बड़ा पेट नेता का ? पता नहीं क्या-क्या खायेगा ?
जंगल खा गया – नदियां पी गया, सारे पहाड़ भी खायेगा ।
पर्यावरण विध्वंस कर रहा , दोनों हाथों से लूट रहा ;
टैक्स-डकैती बढ़ती जाती , देश का सपना टूट रहा ।
आजादी का स्वर्णिम – सपना , पूरी तरह तोड़ डाला ;
ये अंग्रेजो से भी बदतर , भारत – वर्ष तोड़ डाला ।
दुनिया का सबसे भ्रष्ट ये शासन , भारत-वर्ष मिटा देगा ;
ऐसा म्लेच्छ-राज भारत में , नष्ट-भ्रष्ट सब-कुछ कर देगा ।
धर्म-सनातन के ये दुश्मन , पौराणिक-मंदिर तोड़ रहे हैं ;
काम-वासना बढ़ी-चढ़ी है , हर-मर्यादा छोड़ रहे हैं ।
संबंध तोड़ते पति-पत्नी का , यौन-दासता के ये गुलाम ;
गंदे – कानून बनाये ऐसे , जो हिंदू को करें गुलाम ।
तानाशाही से भी बदतर , पता नहीं ये कौन सी शाही ?
देश के सबसे-बड़े ये दुश्मन , बढ़ा रहे गुंडा-शाही ।
मानव-अधिकार नष्ट कर डाले , बढ़ते जाते अत्याचार ;
अंतहीन है चरित्रहीनता , करते रहते हैं व्यभिचार ।
पाप बढ़ चुके इस सीमा तक,अब “अवतार” को आना होगा ;
धर्म पुनः स्थापित करके , हर-पापी को मिटाना होगा ।
सच्चे-हिंदू की यही कामना , बहुत शीघ्र पूरी होगी ;
“अवतार-कल्कि” प्राकट्य हो रहा,धर्म की पूरी रक्षा होगी ।
कोई पापी नहीं बचेगा , सौ-करोड़ तक मिट जायेंगे ;
तेंतीस-करोड़ ही बचें धर्मनिष्ठ, जो “राम-राज्य” को पायेंगे ।
“जय सनातन-धर्म”, रचनाकार:ब्रजेश सिंह सेंगर “विधिज्ञ”
