Hemant Sharma: पूत के पॉंव विमोचन मेंः पंडित अथर्व, कामाख्या का पहला नागरिक सम्मान कामाख्या और अथर्व हमारी बिटिया ईशानी की संतानें हैं. अभी एक वर्ष के भी हुए नहीं हैं. लेकिन पांव केवल पालने में नहीं दिख रहे, उसके बाहर भी उनका भ्रमण-संचरण शुरू हो चुका है. और बुधवार का दिन उनके लिए विशिष्ट बन गया क्योंकि यह उनके पहले नागरिक सम्मान का दिन है.
बुधवार को मेरे पिता श्री पंडित मनु शर्मा के महागाथात्मक उपन्यास ‘कृष्ण की आत्मकथा’ के मलयालम संस्करण का लोकार्पण दिल्ली में हुआ. आठ खण्डों में छपा यह उपन्यास भारतीय भाषाओं का सबसे बड़ा उपन्यास है. इसका मलयालम अनुवाद किया है विदुषी के.शांताकुमारी ने. कोच्चि के कुरूक्षेत्र प्रकाशन ने इसे छापा है. कल ही मलयाली नववर्ष की शुरुआत थी. इसलिए प्रकाशक की इच्छा थी कि इसी पुनीत दिन इस मलयालम संस्करण का लोकार्पण हो. लोकार्पण की इस परंपरा को निभाया कामाख्या, पंडित अथर्व और उनकी मां ईशानी ने. बच्चों ने अपने परनाना की कृति के मलयाली संस्करण की प्रति भी प्राप्त की. कामाख्या और अथर्व धैर्य और गांभीर्य के साथ इस अवसर में सम्मिलित हुए. शॉल पहनाकर उनका नागरिक सम्मान भी कर दिया गया. अपनी मुद्राओं, भंगिमाओं और कलरवों के माध्यम से उन्होंने इस अवसर पर सभी का ध्यान आकृष्ट किया.

इस कार्यक्रम में मुझे भी उपस्थित रहना था. किसी कारण यह संभव हुआ नहीं. लेकिन जो संभव हुआ वो अद्वितीय है. अब देख पा रहा हूं कि कितना सुंदर है चौथी पीढ़ी के करकमलों से इस महागाथा के मलयाली संस्करण का लोकार्पण. इस दृष्टि से यह परिवार और परंपरा के लिए ऐतिहासिक दिन तो बना ही, इसकी मीठी और सुंदर स्मृति मेरे लिए गर्व की बात भी है.
मनु शर्मा जी की जन्म शताब्दी का प्रारंभ भी इसी वर्ष हो रहा है. ‘हमारे मनु’ के तहत वर्ष भर कई आयोजनों में उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को याद किया जाएगा. मलयाली संस्करण आने से अब उनकी कालजयी रचना ‘कृष्ण की आत्मकथा’ नए पाठकों तक भी पहुंचेगी. कई वरिष्ठ और विशिष्ट साहित्यकार, भाषाविद और विद्वान इस कार्यक्रम की अलख जगाएंगे. लेकिन अथर्व के द्वारा किया गया कल का लोकार्पण मेरे लिए इस जन्म शताब्दी वर्ष का विशिष्टतम क्षण है. वह इसलिए भी कि इस बहाने एक परंपरा को उसका पोषक दाय प्राप्त हुआ. यह एक उत्तरदायित्व को, परंपरा को, संस्कार को और बोध को ग्रहण करने का अवसर बना.

कामाख्या और अथर्व अभी अबोध हैं. लेकिन इन क्षणों की छवियां आगे जब वो देखेंगे, इस कार्यक्रम के किस्से जब वो सुनेंगे तो जिज्ञासाएं उन्हें इसी बोध और दायित्व से परिचित कराएंगी. घर से मिलने वाले संस्कारों में यही विशिष्टता होती है कि वो एक पटकथा पहले से लिखने लगता है जिसमें नायक का आगे चलकर अवतरण होता है. जड़ों से जुड़े रहने के लिए जड़ों का होना ज़रूरी है. जड़े ही पोषण देती हैं. ख़ासकर संस्कार, व्यवहार, बोध और सांस्कृतिक पोषण जड़ों से ही आता है. इसलिए इस लोकार्पण की पुस्तक उनके लिए गौतम संस्कार बने, यही इच्छा है.

अथर्व का एक अर्थ गणेश भी है. ज्ञान तो है ही. और कल बुधवार था. गणपति का दिन. इसी संयोग में अथर्व पंडित ने अपने परनाना की लिखी ‘कृष्ण की आत्मकथा’ के मलयालम संस्करण की पहली प्रति प्राप्त की. कामाख्या का अर्थ है इच्छाओं, कामनाओं की पूर्ति करने वाली देवी. हमारे घर की कामाख्या और अथर्व, मनु शर्मा की विशाल और सर्वांगीण परंपरा को लेकर आगे बढ़ें, यह मेरी इच्छा है. जब कामाख्या स्वयं वहां उपस्थित थी तो मुझे यह इच्छा भी अपने लक्ष्य को स्पर्श करती दिखाई दी. इस प्रकार पंडित मनु शर्मा का वैचारिक दाय चौथी पीढ़ी को मिला. यह भी सुसंयोग ही है कि चार वेदों में अथर्व, वेद परंपरा की चौथी कड़ी है और यहां मनु शर्मा जी की वंश परंपरा में पंडित अथर्व चौथी कड़ी हैं.
चार एक विशिष्ट संयोजन है. युग चार हैं. वेद चार हैं. पीठ चार हैं. शंकराचार्य अब तो कई लोग बने घूम रहे हैं लेकिन स्थापित चार हैं. दिशाएं चार हैं. प्रहर चार हैं. मौसम चार हैं. बल भी चार हैं. उर्दू के फसानों में ज़िंदगी के दिन चार हैं. चार में पूर्णता है. स्थापत्य है. चतुर्भुज है. काबा है. आसन है. पाये चार. चलने के लिए चार पैर प्रकृति ने दिए, भले ही मनुष्य अब दो से चल रहा और दो से थाम रहा. जीवन में चार ही चीज़ें कोई भी व्यक्ति चाहता है- आयु, विद्या, यश और बल.
हम अपने जीवन में चाहे जो करें और जितना करें, लेकिन हमारे मूल में तो मनु शर्मा ही हैं और रहेंगे. उनके दिए संस्कार, दिशा और जीवन से ही वो सब संभव हो सका है, जो हमने पाया है. अब चौथी पीढ़ी तक उसका सिरा पहुँच गया है तो ऐसा लगता है कि मेरा दायित्व पूरा हो रहा है. मुझे पिता से जो मिला उसे चौथी पीढ़ी के वर्ग में स्थापित करने की जिम्मेदारी पूरी होती नज़र आ रही है. इस पूर्णता में अभी बहुत कुछ ये बच्चे सीखेंगे और बरतेंगे. लेकिन इसका मंगलाचरण कल हो गया, इसकी मुझे अपार खुशी है.
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