संदीप देव। जीवन में कुछ क्षण ऐसे आते हैं, जब शब्द छोटे पड़ने लगते हैं और हृदय केवल कृतज्ञता के भाव से भर जाता है। पत्रकारिता और सार्वजनिक जीवन में वर्षों की यात्रा के दौरान कई पड़ाव आते हैं, कई सम्मान और उपलब्धियां मिलती हैं, लेकिन जब आपको उस व्यक्तित्व के अभिनंदन का साक्षी बनने का अवसर मिले जिसे आप जीवन भर अपना वैचारिक दीपस्तंभ मानते रहे हों, तो वह अनुभूति शब्दों से परे हो जाती है।
भारतीय पत्रकारिता के भीष्म पितामह, प्रखर चिंतक और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA) के अध्यक्ष, पद्मभूषण श्री रामबहादुर राय जी अपने जीवन के 80वें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं। उनके इस विराट, निष्कलंक और संघर्षशील जीवन-प्रवाह को एक कालजयी स्वरूप देते हुए वरिष्ठ पत्रकार श्री हेमंत शर्मा जी के संपादन में प्रभात प्रकाशन एवं प्रज्ञा संस्थान द्वारा एक ऐतिहासिक ग्रंथ का प्रकाशन हुआ है—‘अस्सी के राय साहब’।

एक तपस्वी का जीवन-वृत्त।
राय साहब केवल एक पत्रकार या लेखक नहीं हैं; वे स्वतंत्र भारत की लोकतांत्रिक चेतना के जीवित इतिहास हैं। 1974 के जेपी आंदोलन की अग्रिम पंक्ति से लेकर आपातकाल के दौरान मीसा (MISA) की पहली यातनाएं सहने तक, और फिर मुख्यधारा की पत्रकारिता में निष्पक्षता व अन्वेषी साहस के प्रतिमान स्थापित करने तक—उनका पूरा जीवन एक साधना रहा है। जब पत्रकारिता सुविधा और सत्ता के गलियारों में रास्ता तलाश रही थी, तब राय साहब ने मूल्यों की उस कठिन डगर को चुना, जहां समझौता करने की कोई गुंजाइश नहीं होती।
विशाल बौद्धिक आकाशगंगा के बीच मेरी विनम्र उपस्थिति
‘अस्सी के राय साहब’ ग्रंथ की लेखक सूची को देखना अपने आप में विस्मित कर देने वाला अनुभव है। इस ग्रंथ में देश के शीर्ष राजनेताओं, केंद्रीय मंत्रियों, विचारकों, न्यायविदों, साहित्यकारों और पत्रकारिता के दिग्गजों की इस गौरवमयी आकाशगंगा के बीच, ‘संदीप देव’ के रूप में अपनी उपस्थिति देखना मेरे लिए केवल एक लेखक होना भर नहीं, बल्कि स्वयं को अत्यंत कृतार्थ अनुभव करना है।
व्यक्तिगत सान्निध्य और ऋणानुबंध
राय साहब के प्रति मेरा आदर केवल एक वरिष्ठ अग्रज के प्रति सम्मान भर नहीं है; यह एक गहरा आत्मीय और वैचारिक ऋणानुबंध है। उनका स्नेह, उनकी सौम्य दृष्टि और उनका सतत मार्गदर्शन मेरे लेखन और मेरी पत्रकारीय दृष्टि की रीढ़ रहा है। जब वे अस्वस्थता और ढलती उम्र के बावजूद आत्मीयता से भरकर मेरे घर पधारते हैं और सिर पर हाथ रखते हैं, तो वह आशीर्वाद मुझे विपरीत परिस्थितियों में भी सच के साथ खड़े रहने का साहस देता है।
इस ग्रंथ में उनके प्रति अपने भावों को शब्दों में पिरोने का अवसर मिलना, मेरे लिए उस अगाध स्नेह के प्रति एक तुच्छ सी कृतज्ञता ज्ञापित करने जैसा है।
सांस्कृतिक और वैचारिक धरोहर
इस ऐतिहासिक दस्तावेज़ को इतनी निष्ठा, भव्यता और परिश्रम से मूर्त रूप देने के लिए आदरणीय हेमंत शर्मा जी, उनके सहयोगी संपादक मंडल और प्रभात प्रकाशन साधुवाद के पात्र हैं। यह केवल एक अभिनंदन ग्रंथ नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए उस पत्रकारिता का प्रामाणिक पाठ है, जिसने कभी सत्ता के सामने घुटने नहीं टेके। 25 सितंबर 2026 को इस ऐतिहासिक ग्रंथ का लोकार्पण होने जा रहा है। श्रद्धेय राय साहब के चरणों में मेरा सादर नमन। ईश्वर उन्हें उत्तम स्वास्थ्य, सुदीर्घ जीवन और वही अडिग तेज प्रदान करे, जो आधी सदी से इस देश के विचार-जगत को आलोकित करता आ रहा है।
