9 दिसंबर, 2014: भारतीय क्रिकेट टीम 4 टेस्ट मैचों की सीरीज खेलने ऑस्ट्रेलिया पहुंची थी। इससे ठीक 8 दिन पहले, 30 नवंबर – 1 दिसंबर की रात महाराष्ट्र सीबीआई के स्पेशल जज “बृजगोपाल हरिकिशन लोया” अर्थात जस्टिस लोया की रहस्यमयी परिस्थितियों में दिल का दौरा पड़ने से तब मृत्यु हो गयी थी, जब वे अपनी सहकर्मी की बेटी की शादी में शामिल होने नागपुर गए थे। लोया की मृत्यु और क्रिकेट टीम के कनेक्शन के बारे में जानने के लिए आगे पढ़िए।
जस्टिस लोया के परिवार के मुताबिक – शव पर खून के धब्बे थे। सर पर चोट के निशान। मोबाइल फोन फॉर्मेट किया जा चुका था। लोया की मृत्यु पर खूब विवाद हुए। सबूतों की कस्टडी ऑफ चेन ब्रोकन पाई गयी। अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त भारत के सबसे बड़े फोरेंसिक विशेषज्ञ “आर के शर्मा” जैसे विशेषज्ञों ने जस्टिस लोया की विसरा और पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर सवाल उठाते हुए इसे साफ तौर पर “जहर से हुई मृत्यु” बताया। वैसे भी लोया न धूम्रपान करते थे, न शराब पीते थे, खुद की अथवा परिवार में कोई मेडिकल हिस्ट्री नहीं थी। रोज दो घण्टे टेनिस खेलने वाले आदमी को अचानक हार्ट अटैक? बात हजम होने योग्य नहीं है।
अब आपको बता दूँ कि अपनी मृत्यु के पूर्व जस्टिस लोया “सोहराबुद्दीन फर्जी एनकाउंटर” की सुनवाई कर रहे थे। मुस्लिम नाम सुनकर 2014 में पैदा हुए सनातनी चिंटू “हिन्दू-मुस्लिम” करने से बचते हुए पता करें कि सोहराबुद्दीन पर जिस “हरेन पांड्या” के कत्ल का आरोप था, वह हरेन पांड्या कौन था। पता करें कि सोहराबुद्दीन किसके लिए राजनीतिक हत्याएं और फिरौती वसूलने का कार्य करता था। सब नेट पर उपलब्ध है।
इसी सोहराबुद्दीन को खूब इस्तेमाल करने के बाद उसके आकाओं ने 2005 में गुजरात पुलिस द्वारा “आतंकी कनेक्शन” का हवाला देकर निपटवा दिया था। सोहराबुद्दीन की गर्भवती पत्नी भी गायब हो गयी, जो बाद में बलात्कार के पश्चात मृत पाई गई थी। जस्टिस लोया इसी मामले की सुनवाई कर रहे थे। तब केंद्र में 6 महीने पहले निजाम बदल चुका था। लोया अपने परिवारजन तथा दो करीबी मित्रों “खंडालकर और थाम्ब्रे” को बताया करते थे कि इस केस में मनमाफिक फैसला देने के लिए कैसे उन पर दबाब बनाया जा रहा है, धमकियां दी जा रही हैं, 100 करोड़ की रिश्वत का ऑफर दिया जा रहा है।
पर लोया अलग मिट्टी का बना था। तमाम दबाबों पर ठोकर मार कर कहता था कि नौकरी छोड़ दूंगा, खेती कर लूंगा, पर अन्याय और झूठ के समर्थन में नहीं खड़ा होऊंगा, भले ही जान चली जाए।
और अंततः जान चली गयी, या हो सकता है – जान ले ली गयी।
मार्च, 2018 में, तीन साल बाद, “चंद्रचूड़ और दीपक शर्मा” की बेंच ने इस केस में तमाम साजिशों को खारिज करते हुए केस डिसमिस कर दिया। हास्यास्पद पहलूँ देखिए कि तीन महीने पहले जनवरी में ही लोया के अपने परिवार ने ही प्रेस कॉन्फ्रेंस कर के मान लिया कि लोया की मृत्यु में कोई साजिश नहीं है, जबकि तब तक केस का फैसला भी नहीं आया था।
लोया की मौत के बाद उनके दो राजदार दोस्तों की भी मौत हो गयी। खंडेलकर ने इमारत से कूद कर जान दे दी, क्यों दे दी, ये किसी को पता नहीं। थाम्ब्रे का एक ट्रेन यात्रा के दौरान ऊपर वाली बर्थ से गिरकर निधन हो गया, जिस दुर्घटना का कोई प्रत्यक्षदर्शी है ही नहीं। अर्थात, सब राजदार गारत हुए और तमाम राज हमेशा के लिए दफन हो गए।
अब आप सोच रहे होंगे कि मैंने जस्टिस लोया की बात भारतीय क्रिकेट टीम के ऑस्ट्रेलिया दौरे से क्यों शुरू की? इसका कारण यह है कि लोया ने अपने परिवार और करीबी दोस्तों को बताया था कि महाराष्ट्र का एक चीफ जज उन्हें बार-बार धमका कर इस फैसले को खासतौर पर 30 दिसंबर, 2014 को सुनाने की सलाह दे रहा है क्योंकि – इस दिन कुछ ऐसा “धमाकेदार” होगा कि इस केस के फैसले पर किसी का ध्यान ही नहीं जाएगा।
मजे की बात देखिए कि लोया के बाद 15 दिसंबर को आये अगले जज “एमबी गोसावी” ने दस साल चले और दस हजार पन्ने की चार्जशीट वाले इस मामले को मात्र 2 दिन में रफा-दफा कर के 17 तारीख को फैसला सुरक्षित रख लिया और “30 दिसंबर” को ही अपना फैसला दिया।
30 दिसंबर को एक बेहद छोटी खबर में छपा था कि – सोहराबुद्दीन मामले के मुख्य आरोपी “मोटा भाई” अदालत से बरी हुए।
इसी दिन प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में छाई रही “बड़ी खबर” ये थी कि….
“भारत के सफलतम कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने मात्र 32 साल की उम्र में अचानक पूरी दुनिया को चौंकाते हुए चलती सीरीज के बीच में लिया टेस्ट से सन्यास”
अमृतकाल में सब दी हुई स्क्रिप्ट पर खेलने की एक्टिंग मात्र कर रहे हैं। असली खिलाड़ी कोई और ही है। नाम बताने की जरूरत है क्या?
