यति नरसिंहानंद ने ठाना
विजय मिले या वीरगति , सब महादेव के नाम ;
जीते जी रण छोड़ के जाना , वीरों का नहीं काम ।
वीरोचित उद्घोष यही है , यति नरसिंहानंद का ;
मां बगलामुखी की कृपा है इन पर , विषय है ये आनंद का ।
भीष्म – प्रतिज्ञा कर ली है इन्होंने , हिंदू – धर्म बचाने की ;
पूरा जीवन युद्ध है इनका , विजयश्री मिल जाने की ।
जो भी इनकी राह रोकता , मिट्टी में मिल जाता है ;
छंटा हुआ गुंडा अपराधी , आगे पानी ही भरता है ।
इनके मन में यही कसक है , हिंदू – जनता सोयी है ;
अज्ञान की निद्रा इतनी गहरी , धरती – माता रोयी है ।
पूरी दुनिया में म्लेच्छ बढ़ रहे , धरती का बोझ बढ़ाते हैं ;
यति नरसिंहानंद ने ठाना , इस बोझे को हटाते हैं ।
धर्म – सनातन की शक्ति से , इनका प्रण पूरा होगा ;
जागेगा निश्चित सोया हिंदू , तब भारत विश्वगुरु होगा ।
अभी तो केवल थोथी-बातें , विश्वगुरु बन जाने की ;
अब्बासी-हिंदू भारत का नेता , करता बातें फुसलाने की ।
धर्महीन – अज्ञानी हिंदू ! महामूर्ख जो सोया है ;
अपने कर्मों को भुगत रहा है , बात-बात पर रोया है ।
रोना-धोना बंद करो सब , अपना पुरुषार्थ जगाना है ;
यति नरसिंहानंद साथ हैं , उनका निर्देश मानना है ।
सच्चे-गुरु ये शक्ति-पुन्ज हैं , सबको शक्ति से भर देंगे ;
पारस – पत्थर इनको जानो , सबको सोना कर देंगे ।
यदि अब भी हिंदू ! न जागा तो , बुरी तरह पछतायेगा ;
जान-माल-सम्मान जायेगा , रोता – रोता मर जायेगा ।
गैंग-रेप बेटी संग होगा , कोई महिला नहीं सुरक्षित ;
अब्बासी-हिंदू भारत का नेता , हिंदू पूरी तरह अरक्षित ।
ए सी वाई पी एल की ट्रेनिंग , हिंदू – धर्म मिटाने की ;
पूरी तरह से धोखा देकर , हिंदू को मरवाने की ।
लगातार जो मंदिर तोड़े , धर्म-संस्कृति नष्ट कर रहा ;
महामूर्ख अज्ञानी-हिंदू ! नेता ही धर्म को भ्रष्ट कर रहा ।
राम-मंदिर को भ्रष्ट कर दिया,शास्त्र विरुद्ध हर कार्य कराया ;
रामलला की उंगली पकड़े , कहता मंदिर में पहुंचाया ।
जागो हिंदू ! अब तो जागो , यति नरसिंहानंद जगाते ;
ये मुर्दों में प्राण फूंकते , सवा – लाख से एक लड़ाते ।
भारत युद्ध का देश सदा से , म्लेच्छों से लड़ना पड़ता है ;
बुद्ध और गांधी का चक्कर , उस समय हारना पड़ता है ।
“जय सनातन-धर्म”, रचनाकार : ब्रजेश सिंह सेंगर “विधिज्ञ”
