“राजतंत्र” लाना ही होगा
लोकतंत्र निष्फल भारत में , केवल भ्रष्टाचार बढ़ाया ;
अब आया अब्बासी – हिंदू , मौत के मुंह में देश को लाया ।
राजतंत्र जब था भारत में , भारत सबसे आगे था ;
विश्वगुरु पूरी दुनिया का , सर्वत्र ही धर्म-सनातन था ।
राजतंत्र अब फिर से लाओ , मनुस्मृति से देश चलाओ ;
वरना वो दिन दूर नहीं है , पूरी तरह से मिट जाओ ।
इसी बात का जनमत-संग्रह , पूरे भारत में करवा लेना ;
ई वी एम हटाना होगा , मतपत्रों से करवा लेना ।
जो भी राय बने जनता की , उसी तरह का तंत्र बनाओ ;
यदि राजतंत्र को लाना हो तो , शंकराचार्यों से चयन कराओ ।
पहला राजा इसी तरह से , क्षत्रिय वीर – शिरोमणि लाना ;
“भगवान-राम” के वंशज ढूॅंढो , उनमें से ही चुन लेना ।
विजयनगर-साम्राज्य के वंशज , वे भी एकदम उपयुक्त रहेंगे ;
असम के फूकन के भी वंशज , पूरी तरह से उत्तम होंगे ।
राजपूताने में भरे पड़े हैं , ये वीरों की खान है ;
बुंदेलखंड भी वीर-भूमि है , ऊदल सम वीर महान हैं ।
हर प्रदेश के वीर-शिरोमणि , वहाॅं का सूबेदार बनाओ ;
उन सबमें जो सर्वश्रेष्ठ हो , भारत का सम्राट बनाओ ।
धर्महीन – अज्ञानी हिंदू , अभी भी इसको न समझेगा ;
अब्बासी-हिंदू की नाटक-नौटंकी, हिंदू ! उसमें फंसा रहेगा ।
क्योंकि सच होनी है भविष्य-मालिका,होनहार क्या टल पायेगा ?
खून की नदियां बहके रहेंगी, “अवतार-कल्कि” का आयेगा ।
बहुत भयंकर धर्म – युद्ध हो , म्लेच्छ सभी मिट जायेगा ;
पूरे विश्व में आग लगेगी , पापी सब जल जायेगा ।
सौ – करोड़ ही बच पायेंगे , शायद पूरी दुनिया में ;
“भगवान-कल्कि” का शासन होगा , निश्चय ही पूरी दुनिया में ।
राजतंत्र ही होगा केवल , मनुस्मृति से विश्व चलेगा ;
अब्बासी-हिंदू तब कहाॅं रहेंगे ? पता नहीं उनका क्या होगा ?
सब पाताल में गड़ जायेंगे , अगला जनम शूकर का होगा ;
सारी चमचे श्वान बनेंगे , वहाॅं भी भोंकना काम रहेगा ।
मास्टर-स्ट्रोक वादी क्या होंगे ? खटमल या पिस्सू होंगे ;
लाखों जन्मों तक फल भुगतेंगे , तब जाकर मानव होंगे ।
यदि जरा भी बुद्धि बची हो इनमें , फौरन धर्म-मार्ग में आयें ;
अब्बासी-हिंदू का साथ छोड़कर , धर्म-सनातन में आयें ।
पूरा प्रायश्चित करना होगा , अच्छे-शासन में बनें सहायक ;
“राजतंत्र” लाना ही होगा , इसमें मत बनना खलनायक ।
“जय सनातन-धर्म”, रचनाकार : ब्रजेश सिंह सेंगर “विधिज्ञ”
