जो धर्महीन हिंदू-कन्यायें
जो धर्महीन हिंदू-कन्यायें , “विष-कन्यायें” बनती जातीं ;
पति मारकर ड्रम में भरतीं , मेघालय जाकर कटवातीं ।
लगातार घर उजड़ रहे हैं , खास तौर पर केवल हिंदू ;
विकृत-कानून बने हिंदू के , क्योंकि नेता अब्बासी-हिंदू ।
हर तरफ से हिंदू को ये मारे , जेहाद बढ़ाता जाता है ;
गजवायेहिंद है इसका मकसद , पूरा करता जाता है ।
पूरे देश में जहर को घोला , अमृत-महोत्सव कहता है ;
धर्महीन – अज्ञानी हिंदू , इसी में फंसता जाता है ।
गंदे-दलदल से बना जो दल है, अब्बासी-हिंदू है उसका नेता ;
समलैंगिक है मातृ-संस्था , मंदिर-मूर्ति हटवाता जाता ।
कहता पचास-बरस को छोड़ो , औरंगजेब को पीछे छोड़ा ;
मौत की खाई खोद रखी है , हिंदू को उसी दिशा में मोड़ा ।
ज्यादातर हिंदू अकल के अंधे, धर्म-सनातन छोड़ रखा है ;
स्वार्थ, लोभ ,भय ,भ्रष्टाचार से, अपना-नाता जोड़ रखा है ।
नब्बे – प्रतिशत नेता – अफसर , महाभ्रष्ट व चोर हैं ;
धर्म से दूरी इसका कारण , पूरी तरह छिछोर हैं ।
मातृ-संस्था का प्लान यही है , म्लेच्छों का राष्ट्र बनाना है ;
जन्मजात गद्दार हैं सारे , भारत-वर्ष मिटाना है ।
जागो हिंदू ! अब तो जागो , बहुत देर हो चुकी है पहले ;
धर्म-सनातन में सब जागो , फिर मारो नहले पे दहले ।
सर्वश्रेष्ठ है धर्म – सनातन , बाकी सारे हैं पिछलग्गू ;
भारत के नेता सबसे गंदे,निन्यानबे-प्रतिशत बन चुके हैं ठग्गू ।
महाभ्रष्ट ये हिंदू – नेता , इनके गिरोह के धर्माचार्य ;
हिंदू के पथभ्रष्टक सारे , कितने गंदे इनके कार्य ।
धर्म – सनातन के ये दुश्मन , धर्म बेचकर खाया है ;
इसीलिए ये अंधा – बाबा , लौंडा – बाबा पगलाया है ।
बुद्धि भ्रष्ट हो चुकी है इनकी , हिंदू-धर्म नष्ट कर देंगे ;
हिंदू अब भी न जागा तो , पूरी तरह ध्वंस कर देंगे ।
म्लेच्छों से मिल रही सुपारी , पुरस्कार भी मिलते हैं ;
कायर ,कमजोर ,नपुंसक हैं सब , इसी से पूंछ हिलाते हैं ।
भविष्य-मालिका भविष्य का दर्शन, हिंदू इसकी ओर निहारो ;
धर्म से ही तुम बचोगे जीवित , वरना बुरी तरह से हारो ।
जान-माल-सम्मान जायेगा , रक्त का सागर बह जायेगा ;
सपने में भी जो न सोचा , ऐसा अनर्थ हो जायेगा ।
सारे चौकीदार चोर हैं , एक छोर से सबको बदलो ;
हर-सरकार धर्म की दुश्मन , सारी-सरकारों को बदलो ।
