जो धर्म हीन हिंदू-कन्यायें , घर-परिवार की नाक कटातीं ;
गंदे-लोगों के जाल में फंसकर , हर सीमा को तोड़ा करतीं ।
पति की हत्या तक कर देतीं , बच्चों तक को मारा करतीं ;
तन की ज्वाला में जल जातीं , अपना-जीवन चौपट करतीं ।
जगह – जगह खूंखार भेड़िये , जगह – जगह जेहाद चल रहे ;
अब्राहमिक – ग्लोबल – एजेंडा , नेता – अफसर साथ दे रहे ।
अब्बासी-हिंदू भारत का नेता , सबसे बड़ा यही खतरा है ;
धर्महीन-अज्ञानी हिंदू का , हो चुका मानसिक-खतना है ।
नब्बे-प्रतिशत तक चोर हैं बाबा , धर्माचार्य , कथा-वाचक ;
म्लेच्छों से धन इनको मिलता , हिंदू के लिये बहुत घातक ।
अब्बासी-हिंदू को मिली सुपारी , हिंदू – धर्म मिटाने की ;
गंदे – कानून बनाता जाता , हिंदू – कन्या को गिराने की ।
दहेज – उत्पीड़न के दावे हैं , ज्यादातर एकदम झूठे ;
हिंदू – लड़के शादी से डरते , क्योंकि चलें मुकदमे झूठे ।
हर जगह व्याप्त है भ्रष्टाचार , कोर्ट भी इनसे नहीं अछूते ;
अक्सर न्याय नहीं मिलता है या मिलते-मिलते जीवन बीते ।
धर्म , सत्य और न्याय की चिंता , सरकारें सब भूल चुकीं हैं ;
जैसा शासक वैसी जनता , कब की फांसी पर झूल चुकी है ।
प्रारम्भिक-गलती की हिंदू ने , क्या शायद कभी ठीक होगी ?
चुनाव-आयोग पर पाप का कब्जा, हिंदू की विजय नहीं होगी ।
ई वी एम हैक है पूरा , सुप्रीम – कोर्ट खामोश है ;
भय व भ्रष्टाचार की बिल्ली , हिंदू बेचारा खरगोश है ।
बिल्ली से रक्षा कर न पाता , आसानी से मारा जाता ;
नेता ,अफसर ,म्लेच्छ हैं बिल्ली , हिंदू खरगोश सा मारा जाता ।
भ्रष्टाचार का – अनाचार का , इनका कोई धर्म नहीं है ;
ज्यादातर ऐसे नेता-अफसर , सदा करें दुष्कर्म यही हैं ।
धर्महीन – अज्ञानी हिंदू , जो भी नेता या अफसर बनता ;
सबसे अधिक भ्रष्ट हो जाता , हिंदू-धर्म का दुश्मन बनता ।
कराके अपना मानसिक-खतना , अब्बासी-हिंदू बन जाते हैं ;
दुर्भाग्य देश का इन्हें ही मानो , धर्म के दुश्मन बन जाते हैं ।
यही तोड़ते हिंदू – मंदिर , गंदे – गलियारे बनवाते हैं ;
शास्त्र – विरुद्ध कर प्राण – प्रतिष्ठा , राम का नाम लजाते हैं ।
जागो हिंदू ! अब तो जागो , सबसे पहले घर-बार बचाओ ;
बच्चों को दो धार्मिक-शिक्षा , गंदी-शिक्षा से उन्हें बचाओ ।
आदमखोर अब्बासी – हिंदू , तेरे बच्चों को खा जायेगा ;
पूरी तरह से जागो हिंदू ! तब ही तू बच पायेगा ।
“जय सनातन-धर्म”, रचनाकार : ब्रजेश सिंह सेंगर “विधिज्ञ”
