अव्यक्तनाम्नीपरमेशशक्तिर
दुनियावी सामान्य नहीं जो , गुरु ने दुर्लभ-ज्ञान कराया ;
गीता में उल्लेख है जिसका , दुर्लभतम् अहसास कराया ।
“परमगोपनीय-राजविद्या” ,“योगेश्वर-कृष्ण” ने जिसे सुनाया ;
“सत्य-गुरु” ने कृपापूर्वक , उसका सारा भेद बताया ।
“ब्रह्मनिष्ठ – श्रोतीय – गुरु” ही , “सत्य-गुरु” हो सकता है ;
“ईश-कृपा” जिस पर भी होगी , “सत्य-गुरु” को पा सकता है ।
“ईश-कृपा” कैसे मिल सकती ? पाप-पुण्य से बचना है ;
इन दोनों से निस्पृह होकर , सदा “सुकृत्य” ही करना है ।
कई-जन्मों के “सुकृत्य” इकट्ठे , फलीभूत जब होते हैं ;
मन में “शुभ-इच्छा” जागृत कर , “सत्य-गुरु” से मिलवाते हैं ।
इसी को “ईश-कृपा” कहते हैं , और नहीं है कृपा दूसरी ;
“मोक्ष-मार्ग” का द्वार यही है, इसी पर चलकर मुक्ति हमारी ।
“ईश-कृपा” से “गुरु-कृपा” है , “गुरु-कृपा” से “आत्म-कृपा” ;
जीवन का उद्देश्य यही है , “पुरुषार्थ” से पाना सभी कृपा ।
“प्रारब्ध” से कुछ न लेना-देना , केवल “पुरुषार्थ” ही करना है ;
“प्रारब्ध” हमें संसार दिलाता , “पुरुषार्थ” से मोक्ष को पाना है ।
“तीनों-कर्म” हैं बंधन-कारक , “निष्काम-कर्म” करते जाना ;
“निष्काम-कर्म” ही “सुकृत्य-कर्म” हैं, इन्हें सदा करते रहना ।
“प्रारब्ध” तो छूटा हुआ तीर है, लक्ष्य-वेध निश्चित होना है ;
पर और कर्म फिर नहीं बनेंगे , “मुक्ति-मार्ग” तब मिलना है ।
“संचित” हों “क्रियमाण” कर्म हों , सबके सब मिट जायेंगे ;
तेरे भक्त पुण्य पायेंगे , पापी पापों से लिपट जायेंगे ।
फिर “कुछ न लेना – कुछ न देना” , सारे बंधन टूटेंगे ;
सब कुछ भास रहा माया से , सब के सब ही छूटेंगे ।
“जीव-जगत-जगदीश” नहीं है , सब केवल माया ही माया ;
“ज्ञान-काल” में कुछ न रहता , कोई नहीं कहीं से आया ।
इन तीनों की नहीं है सत्ता , केवल “मैं” की ही सत्ता ;
“गुरु-कृपा” से ही मिल पाता, और नहीं है अन्य रास्ता ।
मार्ग कठिन है बहुत ही लम्बा, केवल पुरुषार्थ ही पार लगाता ;
“श्रवण-मनन-निदिध्यासन” करके,”गुरु-कृपा” से मिल पाता ।
“गुरु-कृपा” मिल गई हो जिसको , उसे नहीं कुछ शेष है ;
“योग-क्षेम” फिर “ईश्वर” करता , लगता नहीं निमेष है ।
“मायाविशिष्टचेतन-ईश्वर” है , माया “मैं” की शक्ति है ;
“अव्यक्तनाम्नीपरमेशशक्तिर” , करती “मैं” की भक्ति है ।
एकमात्र “मैं” ही “मैं” केवल , और नहीं है कोई दूसरा ;
“अभिन्ननिमित्तोपादानकारण” , “मैं” के अलावा नहीं दूसरा ।
“तस्मै श्री गुरुवे नमः”, कृपा-पात्र: ब्रजेश सिंह सेंगर “विधिज्ञ”
