मानव और सूअर का अंतर
मानव और सूअर का अंतर , केवल विवेक का अंतर है ;
चरित्रहीन व भ्रष्टाचारी – मानव से , कोई न अंतर है ।
आहार , निद्रा , भय व मैथुन , इन दोनों में एक समान ;
केवल विवेक का अंतर ही है , दोनों को करता है असमान ।
अब्बासी-हिंदू भारत का नेता , एकदम सूअर समान है ;
साथ ही इसके लगुवे-भगुवे , वे भी इसी समान हैं ।
धर्महीन – अज्ञानी – हिंदू ! जिसने हृदय – सम्राट बनाया ;
क्या वो भी सूअर समान हो गया,जब नेता ऐसा सूअर बनाया।
भ्रष्टाचार का जो भी धन है , मैले से भी ज्यादा-गंदा है ;
नेता ,अफसर , व्यापारी , बाबा , ज्यादातर का ये धंधा है ।
इन जैसों में और सूअर में , कहीं नहीं है कोई अंतर ;
हिंदू ! तुम तो सुअर मत बनो, रखो बीच में चरित्र का अंतर ।
चरित्र ही सबसे बड़ा है सद्गुण , इसको अंगीकार करो ;
धर्म – सनातन में आ जाओ , पूरी तरह स्वीकार करो ।
वरना सूअर समान जो होते, अगला-जन्म सूअर का होता ;
वैसे सूअर है इनसे अच्छा , धोखा नहीं किसी को देता ।
छल , कपट , धोखा , बेईमानी , लफ्फाजी व जुमलेबाजी ;
बेचारा सूअर कभी न करता, फिर भी उसकी जान की बाजी ।
अब जिसमें थोड़ी शर्म बची हो, सूअर से अच्छे बन जाओ ;
भ्रष्टाचार कभी मत करना , चरित्रहीनता से बच जाओ ।
इसमें लाभ तुम्हारा ज्यादा , सूअर से मानव बन जाओगे ;
आने वाला है समय भयंकर , उससे भी तब बच पाओगे ।
वरना अब्बासी-हिंदू नेता, बदनुमा-दाग है जो भारत का ;
आग में झोंक देगा ये भारत , कारण दूजे-महाभारत का ।
सुप्रीम-कोर्ट “धृतराष्ट्र” बन चुका , आंख में पट्टी बांध रखी है ;
न्याय की देवी न्याय को तरसे , हालत इतनी गिरा रखी है ।
लगता है भारत नहीं बचेगा, बेईमान हर-जगह हैं हावी ;
“भविष्य-मालिका” बता रही है , महाविनाश अवश्यसंभावी ।
इस विनाश से बचना है तो , “सूअरपने” को छोड़ना होगा ;
“गौ – गीता – गंगा” की रक्षा , हर – हालत में करना होगा ।
गाय के आंसू जहाॅं भी गिरते , वो देश नष्ट हो जाता है ;
“शंकराचार्य” का करो समर्थन , वरना सब मिट जाता है ।
बचा सको तो बचा लो हिंदू ! वरना भारत मिटने वाला है ;
“खून का दरिया-रक्त का सागर” , भारत में बहने वाला है ।
“जय सनातन-धर्म”, रचनाकार : ब्रजेश सिंह सेंगर “विधिज्ञ”
