“समग्र-क्रांति” है बहुत जरूरी
“समग्र-क्रांति” है बहुत जरूरी , अंधकार में जगे प्रकाश ,
“जैन-जी” आगे आ जाओ , अब भारत की तुम हो आस ।
बूढ़े – तोते बहुत हैं खूसठ , राम – नाम क्या बोलेंगे ?
नाटक – नौटंकी जुमले – बाजी , लफ्फाजी ही बोलेंगे ।
सब कुछ है पर कुछ भी नहीं है , चरित्र नहीं है सत्य नहीं है ,
अन्याय में डूब चुका है भारत , खोजे से भी न्याय नहीं है ।
कैसे देश चल रहा अब तक ? क्या वाकई राम भरोसे है ?
पर अब राम भी साथ न देंगे ,जब भक्त ही रावण जैसे हैं ।
हर पल सीता का हरण हो रहा ,भारत-माता का चीर हरण ,
लकवाग्रस्त बुद्धि हिंदू ! की , लगातार हो रहा क्षरण ।
अपनी मौत मर रहा हिंदू ! जीवन – अमृत से दूर है ,
धर्म – सनातन जीवन – अमृत , क्यों हिंदू ! इससे दूर है ?
फंसा हुआ है पाखंडों में , फर्जी साधु – संत फंसाते ,
शंकराचार्यों की बात न सुनते , नेता के पीछे गला कटाते ।
बुद्धिनष्ट ज्यादातर हिंदू ! अंधियारों में भटक रहे हैं ,
खाया-कमाया और अघाया , नेता की धुन पर मटक रहे हैं ।
राजा की तरह प्रजा होती है , जनता की भांति बने नेता ,
अंधेर-नगरी चौपट-राजा , ये नेता ही जान को लेता ।
हिंदू की जान बहुत सस्ती है , नेता इसको मुफ्त में लेता ,
महाकुंभ में कितनी भगदड़ ? नेता मौत छिपाता फिरता ।
पूरे देश में मची है भगदड़ , रेलवे – स्टेशन एयरोड्रोम ,
अब अमीर भी शिकार हो रहे , जले हाथ करते हुये होम ।
नालायक से आशा कैसी ? सुविधा और सुरक्षा की ,
पूरा – देश लूट डाला है , चिंता केवल अपनी रक्षा की ।
सेना तक कमजोर हो गयी , अग्नि-वीर को जो लाया ,
जनरल-रावत तक बच न पाये , कुछ ऐसा दुष्चक्र चलाया ।
अकाल-मृत्यु को प्राप्त हुये हैं , जाने कितने वीर-सपूत ?
संदिग्ध मृत्यु जस्टिस-लोया की,हरेन-पंड्या की कैसी मौत ?
पापी-लोगों का देश बन रहा , भारत को मुक्ति दिलानी है ,
“मार्ग-अहिंसक” यही है केवल , अच्छी-सरकार बनानी है ।
पूरा आंदोलन करो अहिंसक , गांधी जी को याद करो ,
रोड-जाम व धरना – प्रदर्शन , सामूहिक – उपवास करो ।
सत्य की ताकत को पहचानो , सत्याग्रह सबको करना है ,
जो अपना देश मानते भारत , उन सबको ही ये करना है ।
करो – मरो की बेला है ये , भारत – वर्ष बचाना है ,
हर स्तर पर आंदोलन कर , अच्छी – सरकार बनाना है ।
“जय सनातन-धर्म”, रचनाकार : ब्रजेश सिंह सेंगर “विधिज्ञ “
