Hemant Sharma । राजनीतिक सिद्धांतकार माओ से-तुंग ने कहा था कि ‘राजनीति बिना खून खराबे का युद्ध है, जबकि युद्ध खून खराबे वाली राजनीति’. नेपोलियन मानता था कि ‘राजनीति के लिए मूर्खता या बेवकूफी बाधा नहीं है’. दार्शनिक मैकियावेली ने कहा था कि ‘राजनीति में नैतिकता की कोई जगह नहीं होती’. साम्यवादी राजनेता खुश्चेव मानते थे कि ‘नेता दुनिया भर में एक जैसे होते हैं, वे वहां भी पुल बना देने का वायदा कर देते हैं जहां नदी न हो’. लेखक जॉर्ज ऑरवेल मानते थे कि ‘राजनीति की भाषा में झूठ सच की तरह और हत्यारा इज्जतदार दिखता है’. यह सिलसिला मुसलसल अब भी जारी है. आज की राजनीति भी कमोवेश सत्य से परे और आभासी चर्चाओं पर आधारित है. इसे ‘उत्तर सच्चाई’ (यानी पोस्ट ट्रुथ) का जमाना भी कहा जा सकता है.

राजनीति की इन्हीं जटिलताओं और उत्तर सच्चाई की परतें खोलती है राज खन्ना की यह किताब ‘इंडिया अर्थात भारत’. यह किताब आजाद भारत की राजनीति के सभी प्रस्थान बिंदुओं, युगों, धाराओं और प्रवृतियों की बड़े रोचकता और बेबाकी से विश्लेषण करती है. किताब के चार अध्यायों में भारत की राजनीति और उसके केन्द्रीय व्यक्ति बंटे हैं. किताब भारत के संविधान निर्माण से लेकर 2024 तक के भारत की दास्तानगोई है. किताब को कहीं से पढ़ना शुरू कर सकते हैं. हर पन्ना नई कहानी सुनाता है. क्योंकि सारे लेख किताब के लिए नहीं लिखे गए हैं. लेख अलग-अलग मौके पर लिखे गए हैं जो अपनी निरंतरता में किताब की शक्ल पा गए हैं.
दरअसल, हम जब अपने समय की घटनाओं को लिखते, बताते हैं तो हम इतिहास का ही पुनर्पाठ कर रहे होते हैं. इतिहास समय का वह बिंदु है जो अनंत अनुभवों, दृष्टांतों, साक्ष्यों और संवादों पर आधारित होता है. इसलिए इतिहास अनंत है. और इतिहास की कहानी भी. एक ही घटना, एक ही व्यक्ति, एक ही जगह, एक ही प्रसंग अपने में न जाने कितने ही पहलू और परिधियां छिपाए रखते हैं. इसलिए इतिहास का कोई भी पाठ उसका आद्योपांत वर्णन नहीं होता. हर किसी की इतिहास दृष्टि उसकी अपनी होती है. जैसे किसी नदी के एक तट पर सभी लहरों को गिना नहीं जा सकता, इतिहास भी उसी तरह कभी भी कितना भी कहे जाने के बाद बहुत कुछ कहने के लिए शेष रह जाने वाला प्रवाह है. यही इतिहास की सुंदरता भी है और विशेषता भी.
सोचिए, कि आखिर इतिहास इतना बहुरूप क्यों है? क्योंकि इतिहास कुछ और नहीं एक समय का सच है. बीते समय का. गुजर गए समय का. और गुजरा हुआ समय किसी एक का नहीं होता, वो होता है उस हर जीव, सजीव, निर्जीव का जो उसके साक्षी होते हैं. पत्थरों पर छपे हुए मछलियों के जीवाश्म, पेड़ों की छालों पर कुरेदे गए नाम, किसी दीवार पर गोलियों के निशान, किसी इमारत के खंडहर के उखड़े हुए दरवाजे या फिर किसी गाँव से उजाड़े गए लोग, बसाए गए शहर, हरवाई और जितवाई गई सरकारें, खुले और बंद पड़े कारखाने, शमशान की कालिख, कब्रिस्तानों के पत्थर, घाटों की घिसी हुई सीढ़ियां और इन सब से इतर उस समय का साक्षी रहा मनुष्य, जिसने अपनी स्मृति, अनुभव, पहचान, भूमिका, मंशा और प्रभाव के आधार पर उन घटनाओं को देखा, समझा और बताया, ये सब इतिहास ही तो है. एकसाथ होते हुए भी कितनी ही अलग दृष्टियां हैं और कितने ही अलग आयाम. राममंदिर आंदोलन को ही लीजिए. एक समय वहां मंदिर था, फिर मस्जिद, फिर मंदिर, फिर मस्जिद, फिर उसे हटाने का अभियान, फिर विध्वंस, फिर एक शून्यता- तिरपाल के अस्थायी बसेरे के जैसी और फिर भव्यता, रामजन्मभूमि के मंदिर के रूप में. एक ही जगह के कितने ही चेहरों और आकार को हमने अपने समय में बदलते, गिरते, बनते देख लिया. और इसी कालखंड के इतिहास का पाठ किसी राजनीतिक व्यक्ति के लिए कुछ और है, धार्मिक और आस्तिक व्यक्ति के लिए कुछ और. दोनों में समानताएं भी हैं और असमानताएं भी. किसी के लिए यह धर्म की जीत है. तो किसी के लिए यह धर्म का राजनीतिकरण. किसी के लिए यह पहचान और निशान का संकट है तो किसी के लिए यह पौरुष और परंपरा का प्रमाण. इतिहास कभी स्थिर और एकालाप नहीं है. विविध है. गतिशील और वैविध्यपूर्ण है. इसलिए इतिहास जितना जरूरी है, उतनी ही जरूरी है उसकी बहुलता और उसका पुनर्पाठ.
राज खन्ना की किताब इसी वजह से रोचक, उपयोगी और प्रासंगिक है. वो आजाद भारत को एक इतिहास के छात्र की तरह देखने और समझने-समझाने की कोशिश कर रहे हैं. इसमें कई रसायन उन्होंने डाले हैं. कई विचार पढ़ें या सुने हैं. इतिहास की तार्किक परिणति बताई है. बहुत से लोगों के विचारों और अनुभवों से इतिहास को सींचना और फिर उसे अलग दृष्टि से लिखना, साझा करना. नट की डोर पर चलने सरीखा है. इसलिए इतिहास का यह पुनर्पाठ न किसी एक विचारधारा के चश्मे का है और न ही किसी एक दृष्टि का पुनर्लेखन. इसमें नवीनता है, विविधता है, अद्वितीयता है, व्याख्या, विमर्श और विश्लेषण भी नयापन लिए हुए हैं. इन रसायनों से सजी यह पुस्तक हमें इतिहास के चौराहों तक कई नई गलियों से होकर ले जाती है. काशी में जो मजा गलियों की घनी बुनाई के रेशे पकड़कर काशी विश्वनाथ या कालभैरव तक जाने में है, वही मजा इतिहास को नई दृष्टियों और उदाहरणों से देखने में है. राज खन्ना इस काम को बखूबी कर पाए हैं, यह मैं विश्वास के साथ कह सकता हूं. और इसलिए राज खन्ना इस पुस्तक के लिए बधाई के पात्र हैं.
राज खन्ना मेरे चालीस बरस पुराने मित्र हैं. जब मैं ‘जनसत्ता’ लखनऊ में आया तो खन्ना जी सुल्तानपुर से मेरे सहयोगी बने. खन्ना जी सुल्तानपुर के वरिष्ठतम पत्रकारों में एक है. सीधे चलने वाले पत्रकार. न उधौ का लेना न माधो को देना. तीस बरस से वो मुझे अपने घर का बना अचार खिलाते है. नाना प्रकार के. यूँ कहूँ कि मेरे विचार उनके अचार खाकर ही बनते है. तब सुल्तानपुर, अमेठी और रायबरेली भारतीय राजनीति का ‘ब्रह्म केंद्र’ थे. खन्ना जी यहां रहकर न सिर्फ घटते इतिहास के साक्षी थे बल्कि इतिहास की धड़कती नब्ज पर उनकी उंगलियां थी. वे बेहद संजीदा, कलात्मक, जीवंत और संवेदनशील लेखक हैं. खन्ना जी की रचनात्मकता उनकी पहली किताब ‘आजादी से पहले और आजादी के बाद’ में देखी जा सकती है.
राज खन्ना राजनीति और समाज को पढ़ने में माहिर हैं. हमारी आजादी के सपने, संविधान निर्माण की जद्दोजहद, आजादी के उत्साह और उल्लास की फूटती किरणें, इन किरणों का मृग मरीचिका में तब्दील होना, पहली से चौथी लोकसभा तक देश के शासन में कांग्रेस का वर्चस्व फिर गैर-कांग्रेसवाद के दौर में पगी संविद सरकारों का दौर, 1969 में कांग्रेस की टूट, 1975 की इमरजेंसी, 1977 का गैर-कांग्रेसी प्रयोग और फिर 1989 में बोफोर्स तोप से निकली बवंडरी राजनीति, 1990 में ‘मंडल’ का मुकाबला करता ‘कमंडल’, एक से समाज बंटा, दूसरे से संप्रदाय. इस अस्थिरता से उपजी बेकाबू आर्थिक फिसलन, जातीय राजनीति की कटुता, कुर्सी के लिए साम्प्रदायिक राजनीति की पूरी नंगई, फिर 2014 से कांग्रेस मुक्त भारत की शुरुआत… यह किताब इन्हीं राजनीतिक प्रवृत्तियों और परिघटनाओं की जीवंत गवाही है. किताब इस दौर की अनकही कहानियों का भी खुलासा करती है. कुछ रहस्यों से पर्दा उठाती है. कहीं-कहीं भारतीय राजनीति के ‘ग्रे एरिया’ पर भी रोशनी डालती है.
आजाद भारत में 40 बरस तक अमेठी, रायबरेली सत्ता का ‘न्यूक्लियस’ रहे. सजग पत्रकार के नाते राज खन्ना इस घटते इतिहास के चश्मदीद बन सत्ता के केंद्र से परिधि को देख रहे थे. इसलिए इस दौर पर उनकी टिप्पणियां प्रासंगिक ही नहीं, वस्तुनिष्ठ भी हैं. इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी, राहुल गांधी के गिर्द घटते घटनाक्रम की पटकथा इस किताब में है. राज खन्ना ने इसे साक्षी भाव से लिखा है. किताब का पूर्वार्द्ध खन्ना जी की ‘कानन सुनी’ है और उत्तरार्ध ‘आंखन देखी’ है. पढ़ते वक्त किताब में इतिहास की नीरसता नहीं कथा की रोचकता है, बातों की काव्यात्मकता है.
चार हिस्सो में बंटी इस किताब का पहला अध्याय संवैधानिक परिचर्चा का है. भारत की आज की पहचान के पीछे आज़ादी के बाद जो सबसे महत्वपूर्ण घटना है, वो है हमारा संविधान. संविधान की सोच, विचारधारा और उसके बनने की प्रक्रिया, उससे निकली राजनीति और उसके दम पर बदलता-बढ़ता समाज. अगर भारत के आधुनिक इतिहास या स्वातंत्र्योत्तर इतिहास को समझना है तो उसके लिए संविधान को जानना एक अनिवार्य शर्त है. लेकिन राज खन्ना अपनी किताब में पूरा संविधान नहीं बाँच रहे और न ही संविधान सभा से लेकर संविधान के एक-एक अनुच्छेद को समझाने बैठे हैं. राज कुछ संदर्भों की चर्चा कर रहे हैं. जिन्हें समझना इसलिए ज़रूरी है ताकि आगे के भारत को देखने के लिए हमारे पास एक आलोक हो और उसी आलोक में हम अपने समय के सच को देखने और परखने की कोशिश करें. मसलन, संविधान का श्रेय, अल्पसंख्यकों के अधिकार और अंबेडकर की सोच, न्यायपालिका और कार्यपालिका के टकराव, विधायिका और न्यायपालिका के द्वंद्व, राष्ट्रपति और राज्यपालों के अधिकार और उनका चुने हुए जनप्रतिनिधियों और सत्ता से अंतर-संघर्ष. ऐसे कई पहलुओं को पहले अध्याय में रखने से हम संविधान के अकादमिक पाठ से निकलकर सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि हासिल कर पाते हैं. जो संविधानजीवी भारत को थोड़ा हटकर और नए सिरे से समझने के लिए बहुत आवश्यक है. अक्सर होता यह है कि राजनीति अपने हितों के अनुरूप इतिहास की एक ही कथा को, टेप पर बज रहे गीत की तरह दोहराती रहती है. वो ऐसी घटनाओं को नेपथ्य में डाल देती है जहां से सवाल और तर्क की गुंजाइश बने. सत्ता यथास्थितिवाद से पोषित होती है. वो मतेक्य से इतर न देखती है और न दिखाती है. राज खन्ना का पहला अध्याय और उसके वर्गीकृत पाठ इस लिहाज़ से बहुत उपयोगी हैं.
दूसरे और तीसरे अध्याय में ‘इंडिया अर्थात् भारत’ दरअसल एक ही टाइमलाइन को दो हिस्सों में बाँटकर देखने की कोशिश करती है. पहली टाइमलाइन है राजनीतिक व्यक्तित्व की जिसमें जवाहर और जनसंघ से लेकर ज्ञानी जैल सिंह तक की राजनीतिक यात्रा की चर्चा है. और इसके बाद तीसरे अध्याय मे बात राजनीतिक दाँवपेंच की है जहां वीपी सिंह और राजीव गांधी से नरेंद्र मोदी तक का सफर व्यक्तियों के जरिए देखने की कोशिश की गई है. दरअसल, पहले हिस्से की कहानी के पात्र आज़ादी और उसके नायकों की शार्गिदगी से जन्मी राजनीतिक पीढ़ी को दिखाती बताती है. लेकिन इसके बाद भारत करवट लेता है. मंडल और कमंडल देखता है. सामाजिक और सांस्कृतिक आंदोलनों का साक्षी बनता है. तकनीक और पहचान के सवालों पर करवट लेता है. यह वो समय है जहां पुरानी राजनीति टूट रही है. नई राजनीति खड़ी हो रही है. टूटन और विघटन के द्वंद्व हैं. नई पहचान के दल बन रहे हैं. नए विचारधाराएं पुरानी विचारधाराओं और नायकों के केंचुल से बाहर निकलकर अपनी नई खाल और नई चाल में आगे बढ़ रही हैं. पहचान और सम्मान की राजनीति ने केंद्रीकृत विचारधाराओं के खेल को बिगाड़ा और तोड़ा. लेकिन इतिहास की इसी मिट्टी में पहचान केवल जातियों तक रुकी नहीं, उसने अपनी सांप्रदायिक और सांस्कृतिक पहचान के लिए भी एकजुट होना सिखाया. बाद की राजनीति बहुसंख्यक की पहचान और तुष्टिकरण के फार्मूले को तोड़ने की सच्चाई है.
चौथा अध्याय है आशा और निराशा. इसमें एक पार्टी और १२ व्यक्तित्वों पर लेख हैं. ये चेहरे किसी एक विचारधारा या पार्टी के नहीं हैं. लेकिन इनकी भूमिका और उपलब्धियां अपने-अपने समय में बहुत बड़ी और ऐतिहासिक रही हैं. इनमें सबने अपने समय में कुछ न कुछ ऐसा अर्जित किया है जो अलग था, ऐतिहासिक था और भारत का भविष्य बदलने वाला था. लेकिन कुछ के कामों को क्रमबद्धता मिली और कुछ कमज़ोर पड़ते गए. इतिहास कमज़ोर पड़ने के आधार पर व्यक्तियों और उनके योगदान का मूल्यांकन नहीं करता क्योंकि जन्म और उपलब्धियों की तरह ही मृत्यु और उतार भी अवश्यंभावी हैं. कबीर कह गए हैं ‘जो फरा सो झरा, जो बरा सो बुताना’. उतार आता ही है. इतिहास उसके कारणों और सीमाओं का विश्लेषण ज़रूर करता है. यह स्वाभाविक वृत्ति है कि जीत से ज्यादा हार का अध्ययन किया जाता है. क्योंकि जीत कुछ देखने नहीं देती और हार देखने पर मजबूर कर देती है. इसलिए जगजीवन राम, सीताराम केसरी और हेमवती नंदन बहुगुणा से लेकर नीतीश, मायावती, लालू, राहुल और आडवाणी तक का राजनीतिक व्यक्तित्व इस अध्याय में तौला गया है.
कुल मिलाकर पुस्तक रोचक है. किसी अकादमिक पाठ्यक्रम के अनुशासन में बंधी नहीं है लेकिन कहीं पर भी उबाऊ और दोहराव वाली नहीं लगती. ऐसा लगता है कि जैसे हम अलग-अलग सवालों के साथ अलग अलग समय और चरित्रों की चर्चा कर रहे हैं. किताब लखनऊ का कॉफी हाउस है, बनारस की अड़ी है, कानपुर का घंटाघर है और दिल्ली का प्रेस क्लब है. विषय की रोचकता और भाषा के प्रवाह में मुकाबला है. राज खन्ना को इस पुस्तक के लिए फिर से साधुवाद. आप सब इसे पढ़ें. पढ़ना ज़रूरी है. जानना ज़रूरी है. और जानकर, पढ़कर फिर उसे दूसरों को बताना उससे भी ज्यादा जरूरी.
किताब Kapot पर उपलब्ध है. उसका लिंक है –https://kapot.in/product/india-arthat-bharat/
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