Hemant Sharma । इतिहास रोचक होता है. लेकिन इतिहास का लेखन नहीं. शास्त्रीय इतिहास लेखक इसे घटनाओं का रोजनामचा बनाकर इसके किस्सा तत्व की जान निकाल देता है. बीसवीं सदी में यूरोपीय शोधपूर्ण लेखन ने इतिहास को इतिहासकारों की सख्त और उबाऊ मेज से उठाकर किस्सागोई की बैठकी में पहुंचा दिया. नई शैली की प्रामाणिकता अक्षुण्ण थी. लेकिन विषय छेने की तरह रसीले. तब हमें दुनिया की कई ऐसी चीजों का इतिहास उस क़िस्सागोई की शक्ल में पढ़ने को मिला जैसे हम जानना चाहते थे. यह थीमेटिक इतिहास लेखन था.
हमारे यहां भी यह सवाल लंबे समय से लंबित रहा है कि क्या कोई ऐसी लेखन विधा या फार्मेट बनाया जा सकता है जिसमें लोक की ध्वनि, इतिहास की प्रामाणकिता, गझिन किस्सागोई और मुखर समकालीनता एक साथ पिरोई जा सके? मशहूर लेखक, संपादक अंशुमान तिवारी ने अपनी नई किताब ‘विक्टर और बेताल’ में इसे नए शिल्प में बहुत कामयाबी के साथ पिरोया है.
‘विक्टर और बेताल’, इतिहास लिखने की एक बिल्कुल नई शैली है. यह एक पत्रकार और डार्क वेब प्रेत की आपसी बतकही है. लेखन का पैटर्न अनोखा है. जैसे रात दो बजे कोई मुँहफट दोस्त आपको दुनिया समझा रहा हो. फर्क बस इतना है कि उसके पास पाँच हज़ार साल का डेटा है और आपके पास आज की ख़बर का नोटिफिकेशन.

हर अध्याय एक ऐसे नोटिफिकेशन से शुरू होता है, यह नोटिफिकेशन कथा में यात्रा करता है और अचानक इतिहास के थप्पड़ पर खत्म हो जाता है. अंत तक पहुँचते-पहुँचते पता चलता है अरे, यह सिर्फ़ कथा नहीं, ठोस शोध पर टिका इतिहास है, जिसकी गहराई एक ख़जाने में चुपचाप आपका इंतज़ार कर रही है. इसलिए जब आप किताब बंद करते हैं, सबसे बड़ा बदलाव यही होता है- आप खबर देखना बंद नहीं करते… आप उसे समझना शुरू करते हैं.
अंशुमान तिवारी बेबाक़, विचारशील, बहुपठित, बहुआयामी पत्रकार हैं. फुर्तीले, ऊर्जावान और हमेशा उम्मीद, संभावनाओं और भविष्य से भरे हुए. वे भाषा की जड़ता को तोड़ते हुए मुश्किल को आसान बनाते है. अर्थशास्त्र, राजनीति शास्त्र और इतिहास की गुत्थियों को वे बड़ी सहजता से सुलझाते हैं. इससे ज्ञान का सरलीकरण जनसामान्य तक सहज पहुंचता है. लोकमन की पहचान ही उनके लेखन का आधार है. लम्बे समय तक वो आर्थिक लेखन के लिए जाने जाते रहे. हिन्दी साप्ताहिक पत्रिका ‘इण्डिया टुडे’ के संपादक रहे. टीवी ९ नेटवर्क में संपादक रहे. इन दिनों अमर उजाला के बिजनेस मंच ‘बोनस’ के संपादक हैं.

उनकी नई किताब ‘विक्टर और बेताल’ वर्तमान को पकड़ इतिहास में झांकने की एक तड़प है. कथ्य के अनूठे शिल्पगत प्रयोग से सजी यह हिंदी की पहली किताब है जिसमें आज की हर कथा के गुणसूत्र इतिहास में ढूंढे गए हैं. अंशुमान अपनी तीक्ष्ण मेधा और शोधवृत्ति से दिखाते हैं की जो आज है, वह पहले भी था. यानी आज की हर कथा दरअसल इतिहास का दोहराव मात्र है. अंग्रेज़ी में इस विधा को ‘डेजा-वू’ कहते हैं. मगर हिंदी की दुनिया पहली बार इस प्रयोग से परिचित होगी. अंशुमान का आर्थिक लेखन भी हिंदी में बेजोड़ रहा है. उनकी तीन किताबें ‘अर्थात्’, ‘लक्ष्मीनामा’, और ‘उल्टी गिनती’ बहुप्रशंसित हैं. पर कथ्य, विन्यास और शिल्प की दृष्टि से ‘विक्टर और बेताल’ न सिर्फ अनूठी है, उसमें कल्पना का नावीन्य भी है.
‘विक्टर और बेताल’ में न्यूज़रूम का पत्रकार आज की सुर्खियों को टाइम मशीन में डाल यह पता लगा लेता है कि ऐसा पहले हो चुका है. किताब में इतिहास की सनसनीख़ेज़ घटनाएँ, युद्ध, स्कैम, अपराध, अर्थशास्त्र, करंसी, रेल, मोटर सब हैं… अपने अतीत के साथ. आप चौंक जाएंगे… क्या इतिहास ऐसे भी लिखा जा सकता है? इतना रोचक, इतना मारक, इतना दिलचस्प! आज के वैश्विक परिदृश्य को देख आपको लगता होगा कि दुनिया पागल हो गई है? पर यह किताब साबित करती है- दुनिया हमेशा से ऐसी ही थी. फर्क बस इतना है कि अब दुनिया बदली है. आपके हाथ में जो फोन है उसपर नोटिफिकेशन जल्दी जल्दी आते हैं. आप सूचनाओं के बो झ तले दबे रहते हैं. इस किताब में आपको इतिहास पढ़ाया नहीं जाता, आप उसमें फेंक दिए जाते है. बिंदास, बेबाक, और खतरनाक सच्चाइयों के साथ. इस किताब के हर पन्ने पर आप ठहरकर पूछेंगे- यह कहानी है या शोध? और एक गहरा एहसास होगा कि इस किताब को आप पढ़ नहीं रहे हैं, यह किताब आपको पढ़ रही है. किताब का हर पन्ना आपकी यादों पर दस्तक देता दिखेगा.
अंशुमान तिवारी ने इस पुस्तक में इतिहास को तथ्यों की अलमारी से निकालकर उसमें कथा का स्पंदन दिया है. ‘विक्टर और बेताल’ सिर्फ इतिहास की किताब नहीं है, न समसामयिक घटनाओं की व्याख्या भर. यह उन अदृश्य सूत्रों की खोज है जो अलग-अलग सदियों को एक ही धागे में पिरो देते हैं. समय यहाँ रेखा नहीं, वृत्त है. वह लौटता है. कभी नए चेहरों के साथ, कभी नई तकनीकों के साथ, कभी नए नारों के साथ. लेकिन उसकी धड़कन पहचान में आ जाती है.
इस यात्रा के दो मुसाफ़िर हैं—विक्टर और कबूस। पहला हर नई घटना पर विस्मित हो उठता है. उसे लगता है कि दुनिया हर सुबह पहली बार घट रही है. दूसरा मुस्कराता हुए बताता है यह सब वह पहले कहीं देख चुका है. एक प्रश्न है, दूसरा स्मृति. एक वर्तमान का नागरिक है, दूसरा समय का पुराना साक्षी. दोनों की बातचीत धीरे-धीरे पाठक को यह समझा देती है कि इतिहास का सबसे बड़ा चमत्कार उसकी पुनरावृत्ति नहीं, इंसान की विस्मृति है.
अंशुमान जी पाठक का हाथ पकड़कर चलते नहीं, केवल एक दरवाज़ा खोल देते हैं. उसके बाद एक साधारण-सी लगने वाली घटना अचानक सदियों पुराने फ़्लैश बैक में ले जाती है. पेरिस के एक संग्रहालय में हुई चोरी देखते-देखते सभ्यताओं की सबसे बड़ी कलात्मक लूट का दरवाज़ा खोलती है.अमेरिका और चीन की ताज़ा तनातनी एकाएक अफ़ीम के धुएँ और साम्राज्यों की महत्वाकांक्षाओं तक जा पहुँचती है. सोने की चमक केवल बाज़ार की ख़बर नहीं रह जाती, वह मनुष्य के भय, भरोसे और मुद्राओं के बदलते भाग्य की कथा बन जाती है. कहीं रोमन गणतंत्र की धूल उड़ती है तो कहीं आधुनिक लोकतंत्र की बेचैनियाँ उसी धूल में अपना चेहरा खोजती दिखाई देती हैं. लेखक हर बार इतना ही कहते हैं कि पाठक अगला पन्ना पलटे बिना रह न सके. रहस्य बना रहता है और इतिहास धीरे-धीरे अपना चेहरा खोलता है.
इस किताब की एक और मोहक विशेषता है. हर अध्याय एक शेर पर आकर ठहरता है.जैसे कथा अपना अंतिम वाक्य कविता को सौंप देती हो. वे शेर अध्याय का निष्कर्ष नहीं, उसकी अनुगूँज हैं. कथा समाप्त हो जाती है, पर उसका स्वर भीतर देर तक बना रहता है. इतिहास और कविता का यह संगम पुस्तक को केवल ज्ञान का नहीं, रस का भी अनुभव बना देता है.
कहते हैं इतिहास स्वयं को दोहराता है. शायद यह आधा सत्य है. पूरा सत्य यह है कि इंसान अपनी विस्मृति को बार-बार दोहराता है. जो स्मृति बचा लेते हैं, वे भविष्य भी बचा लेते हैं. इतिहास का सबसे बड़ा सबक़ घटनाओं को याद रखना नहीं, उनके भीतर छिपे पैटर्न को पहचानना है. वही पैटर्न आने वाले समय की आहट बनते हैं. “विक्टर और वेताल 2.0” इसी आहट को सुनने की किताब है. इसे Vani Prakashan ने छापा है. Aditi Maheshwari ऐसे प्रयोग करती रहती है. इसे पढ़ते हुए लगता है कि अतीत कहीं पीछे नहीं छूटा.वह हमारे साथ-साथ चलता है. कभी समाचार बनकर, कभी बाज़ार बनकर, कभी युद्ध बनकर, और कभी केवल एक प्रश्न बनकर—क्या सचमुच यह सब पहली बार हो रहा है?
साभार- मूल लिंक
