संदीप देव। राजनीति के इस वैचारिक पतन और कार्यकर्ताओं के अंतर्द्वंद्व पर यह कविता उस कड़वे सच को बयां करती है, जिसे सत्ता के गलियारों में अक्सर अनसुना कर दिया जाता है। “सीढ़ियों का विलाप”

जिस कम्युनिस्ट नेता अच्युतानंद के मुख्यमंत्रित्व काल में केरल में सर्वाधिक हिंदू, संघी स्वयंसेवक और भाजपाई कार्यकर्ता मारे गये उन्हें भाजपा की ही मोदी सरकार ने पद्मभूषण सम्मान प्रदान किया है। ऐसे ही हिंदू कारसेवकों पर अयोध्या में गोली चलवाने वाले मुलायम सिंह यादव को पद्म विभूषण प्रदान किया गया और नृपेंद्र मिश्रा को पहले पीएमओ का दायित्व सौंपा गया और बाद में राम मंदिर निर्माण का सर्वेसर्वा बना दिया गया। यह कविता उन्हीं सब त्रासदियों पर एक व्यंग्य है!
अवसरवादी सत्ता!
वह जो कल तक ‘शत्रु’ था, आज ‘सम्मानित’ है,
तुम्हारी वफादारी का, यही अंत सुनिश्चित है!
जिनके हाथों पर थे निशान, तुम हिंदुओं के खून के,
उन्हें ही पहनाए जा रहे, ‘पद्म’ अब सम्मान के!
तुमने ढोए झंडे, तुमने खाईं लाठियां,
तुम्हारी ही लाशों पर बनीं, संघ-सत्ता की कोठियां!
वो जो ‘कारसेवक’ था, कब का मिट्टी में सो गया,
जिसने चलाई थी गोलियां, वो ‘विभूषण’ हो गया!
नारा था ‘एकता’ का, पर खेल ‘विभाजन’ का चला,
हिंदू को हिंदू से लड़ाकर, अवसरवाद का दीप जला!
तुम ‘विचार’ के लिए मरे, वो ‘वोट’ के लिए जी रहे,
बलिदानियों के तर्पण का जल, वो ‘सुरा’ समझकर पी रहे!
अब मत करना ‘हिंदुत्व’ की बात,
यह तो है केवल ‘कुर्सी’ की,
एक सुनियोजित बिसात!
तुम प्यादे थे, प्यादे हो, प्यादे ही रहोगे,
सत्ता के हर ‘धोखे’ को, तुम ‘सबका विश्वास’ कहोगे!
ढोंग की इस राजनीति का, अब अंत क्या होगा?
जब रक्षक ही भक्षक का,अभिनन्दन कर रहा होगा?
इतिहास लिखेगा जब, इस शासन का काला अध्याय,
कहेगा, ‘बलिदान’ हार गई,’अवसरवाद’ की हुई हमेशा जय!
विवेचन:
यह कविता उस मर्म को पकड़ने की कोशिश करती है जहाँ एक कार्यकर्ता ठगा हुआ महसूस करता है। जब ‘सिद्धांत’ और ‘सत्ता’ के बीच जंग होती है, तो हमेशा ‘सिद्धांत’ की बलि चढ़ाई जाती है। मुलायम सिंह और अच्युतानंदन को दिए गए पुरस्कार उसी ‘नैतिक बलि’ के प्रतीक हैं।
