संदीप देव। मैंने कल आप लोगों से पूछा था कि हिंदू धर्म और धर्मांतरण पर डॉ.भीमराव आंबेडकर के विचारों को आप सभी पढ़ना चाहेंगे, तो अधिकांश लोगों ने इसके लिए हामी भरी थी।
इस श्रृंखला को आरंभ करने से पूर्व बता दूं कि भीमराव आंबेडकर ने अपने जीवन में 15,000 पृष्ठों से भी अधिक लिखा, बोला है। उनका लेखन, भाषण, ज्ञापन, साक्षात्कार, पत्र आदि सब मिलाकर हिंदी में लगभग 40 वॉल्यूम है और अंग्रेजी में करीब 17 वॉल्यूम है। इसे भारत सरकार के सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने छापा है। अतः सरकार का धन्यवाद।
बता दूं कि डॉ आंबेडकर का लिखा इतना अधिक है कि आम जनता तक न तो वह पहुंच सकती है, न वह इन स्थूलकाय ग्रंथों को पढ़ सकती है और न ही वह इन ग्रंथो में बिखरे सूत्रों को जोड़ कर संदर्भ सहित उसे प्रस्तुत कर सकती है। हिंदू धर्म के SC/ST वर्ग तक शायद ही आंबेडकर का ओरिजनल लिखा पहुंचता हो! वह वही पढ़ या सुन पाते हैं जो नव-बौद्धवादी और कथित दलित एवं जातिवादी विचारक अपने विचारों की चासनी में लपेट कर उन तक पहुंचाते हैं।
अब आते हैं इस पुस्तक पर। यह पुस्तक ‘धर्मांतरण: आंबेडकर की धम्म यात्रा’ के लेखक स्वयं डॉ भीमराव आम्बेडकर हैं। इस पुस्तक में हिंदू धर्म और उसे छोड़ कर बौद्ध धर्म में धर्मांतरित डॉ आंबेडकर का उनके ही द्वारा लिखे लेखों, भाषणों और वक्तव्यों का संकलन है, जिसे संकलित किया है मशहूर आंबेडकरवादी चिंतक एवं हिंदू कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास के एसोसिएट प्रोफेसर रतनलाल जी ने।

अतः यह शुद्ध आंबेडकरवादी व्यक्ति द्वारा संकलित पुस्तक है, जिस पर दलित ऊंगली नहीं उठा सकते हैं। इसमें संकलित डॉ आंबेडकर के सभी लेखों व भाषणों की तिथि, स्थान सहित संपूर्ण संदर्भ दिया गया है। बड़ी बात यह कि यह भारत सरकार द्वारा प्रकाशित आंबेडकर वॉल्यूम से लिया गया है। अतः इसमें लिखी बातों पर विवाद की कोई गुंजाइश ही नहीं है, क्योंकि जो भी लिखा है डॉ आंबेडकर ने लिखा है, जिसे भारत सरकार द्वारा प्रकाशित ग्रंथों से एक आंबेडरवादी विद्वान ने संकलित किया है।
यह पुस्तक इसी वर्ष आई और इसे प्रकाशित किया हिंदी के बड़े प्रकाशकों में से एक राजकमल प्रकाशन ने। इसका पहला एडिशन फरवरी 2025 में आई और देखते ही देखते केवल 110 दिनों में 1100 प्रतियां बिक गई। फिर इसका दूसरा संस्करण मई 2025 में आई और वह भी सारी निकल गई। लेकिन इसके बाद पांच महीने हो गये, यह पुस्तक बाजार से गायब है। प्रकाशक से मेरी टीम ने स्वयं बात की है। उन्होंने कहा कि “यह पुस्तक उपलब्ध नहीं है और आगे कब प्रकाशित होगी, इसका पता नहीं है!”
मुझे लगता है इस पुस्तक में हिंदू धर्म के प्रति डॉ आंबेडकर के जो विस्फोटक विचार हैं, वह शायद सरकारी सिस्टम पचा नहीं पाया है, जिस कारण ‘हिंदू वोट’ पाने वाले असहज हो गये हैं!
इस दौर में डॉ आंबेडकर को नया गॉड बनाया जा रहा है, उनके नाम पर ‘पंच-तीर्थ’ विकसित कर ही दिये गये हैं, नया ‘धाम’ उनके नाम पर विकसित हो ही रहा है, उनकी जयंती पर छुट्टी भी घोषित हो चुकी है और SC/ST act का उत्पीड़न भी उनके नाम का उपयोग करके ही बढ़ाया गया है! इस देश को बुद्ध का देश घोषित कर नव-बौद्धवादियों को सिस्टम से लेकर न्यायपालिका तक भरा जा रहा है, तो फिर ऐसे में यह पुस्तक उस सोए हिंदुओं को जगा सकती है, जो यह सब तमाशा देखकर भी सच से अनजान ताली पीटने में मगन है!
ऐसा एक अन्य उदाहरण भी हाल के भारत में देखने को मिला है, जब अब्राहमिकों के बारे में विस्तृत जानकारी देती गीता प्रेस के ‘भविष्य पुराण’ को अचानक से छापना बंद कर दिया गया है। अन्य पुराण भी अब धीरे-धीरे कम छापे जा रहे हैं और यह सब हुआ है गीता प्रेस को मिले सरकारी सम्मान के बाद!
हो सकता है कि यह कुछ उदाहरण महज संयोग हो, या मेरा भ्रम हो! परंतु इस संयोग या प्रयोग से बहुत कुछ जिसे हिंदू जनता को पढ़ना चाहिए, वह नहीं पढ़ पा रही है, यह सच है!
हां तो आते हैं असली मुद्दे पर! तो कल से डॉ. आंबेडकर का हिंदू धर्म और धर्मांतरण को लेकर उनके विचार मैं इस पुस्तक से रखूं, इसलिए पहले आपको बताना आवश्यक था कि यह पुस्तक क्या है?
प्रभु की कृपा से इस पुस्तक की एक कॉपी मेरे पास सुरक्षित है। मेरा प्रयास राजकमल प्रकाशन से लगातार बात कर उन्हें इस पुस्तक को पुनः प्रकाशित करने के लिए प्रेरित करना भी है ताकि अधिकांश भारतीय पाठक के घर में यह पुस्तक हो। कल से आप लोगों को प्रतिदिन एक लेख पढ़ने को मिलेगा और मैं लिखूंगा, यह मेरा वचन है। तो क्या आप तैयार हैं कुछ कड़वे सच को सुनने और पढ़ने के लिए?
जाते-जाते एक कड़वा सच बता दूं कि डॉ आंबेडकर ने भले ही 1956 में हिंदू धर्म का परित्याग कर बौद्ध धर्म अपनाया हो, परंतु वह हिंदुओं की एक बड़ी आबादी को धर्मांतरण के लिए 1920 के दशक से ही तैयार करने लगे थे! वंदे विष्णुं 🙏
