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India Speak Daily > Blog > SDEO's Story > एकात्म मानव दर्शन प्रतिष्ठान में मेरे भाषण से वैचारिक भूचाल: आयोजकों का संघ से पल्ला झाड़ने का प्रयास, शारदा पीठ, पी.एन. मिश्र और कुसुमलता केडिया का संबल!
SDEO's Storyसंघवाद

एकात्म मानव दर्शन प्रतिष्ठान में मेरे भाषण से वैचारिक भूचाल: आयोजकों का संघ से पल्ला झाड़ने का प्रयास, शारदा पीठ, पी.एन. मिश्र और कुसुमलता केडिया का संबल!

Ssandeep Deo
By Ssandeep Deo 12 Min Read
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12 Min Read
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संदीप देव। दीनदयाल शोध संस्थान परिसर स्थित ‘एकात्म मानव दर्शन अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान’ के मासिक स्वाध्याय मंडल में जब मुझे ‘अपने हिंदू समाज का जातीय परिप्रेक्ष्य: आरक्षित एवं अनारक्षित जातियां’ विषय पर मुख्य वक्ता के रूप में आमंत्रित किया गया था, तो मेरा उद्देश्य किसी राजनीतिक संकीर्णता में उलझना नहीं था। वरिष्ठ पत्रकार पद्मश्री व पद्मभूषण श्री राम बहादुर राय जी और प्रतिष्ठान के अध्यक्ष डॉ. महेश चंद्र शर्मा जी की गरिमामयी उपस्थिति में मैंने औपनिवेशिक काल से लेकर वर्तमान शासन तक, हिंदू समाज के जातीय विखंडन और आरक्षण की विधायी यात्रा को छह ऐतिहासिक चरणों में तथ्यों के साथ रखा।

मंच से मैंने संघ के स्वयंसेवकों को सीधे संबोधित करते हुए यह प्रश्न उठाया कि शाखा में गाया जाने वाला मंत्र—‘हिन्दवा सोदरा सर्वे न हिन्दु पतितो भवेत्’—यदि सत्ता और व्यवस्था के स्तर पर चरितार्थ नहीं होता, तो यह सहोदर भाव केवल एक नारा बनकर रह जाता है। इस वक्तव्य के सार्वजनिक होते ही संघ और भाजपा के वैचारिक गलियारों में असहजता और खलबली मच गई।

भाषण के तुरंत बाद का संवाद और महेश चंद्र शर्मा जी का व्यंग्य

कार्यक्रम संपन्न होने के बाद मैंने आयोजक डॉ. महेश चंद्र शर्मा जी को औपचारिक शिष्टाचार के तहत संदेश भेजा था:

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मेरा संदेश:“धन्यवाद सर परिचर्चा में बुलाने के लिए। संवाद से ही राह आसान होती है। संवाद ऐसे ही चलते रहना चाहिए। मेरा आलेख पढ़कर आप अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दीजियेगा सर। आपकी प्रतिक्रिया मेरे लिए बेहद महत्वपूर्ण है।”

इसके जवाब में डॉ. महेश चंद्र शर्मा जी ने मुझे जो संदेश भेजा, उसमें स्वस्थ संवाद के लिए ‘स्वस्थ चित्त’ की बात कहकर उन्होंने परोक्ष रूप से मुझ पर और मेरे मनोचित्त पर तीखा व्यंग्य कसा:

महेश जी का जवाब:“आप आए। स्वाध्याय मंडल में सार्थक वार्ता के लिए आभारी हूं। संवाद के लिए हमें अधिक स्वस्थ चित्त होने की आवश्यकता है। कृतज्ञता स्वीकार कीजिए। शुभम्।”

वीडियो सार्वजनिक होते ही ‘विलगाव‘ और संघ का दबाव

जैसे ही इस व्याख्यान का वीडियो यूट्यूब पर सार्वजनिक हुआ, प्रतिष्ठान और संघ तंत्र के भीतर मानो आग लग गई। आलोचक संदीप देव को मंच क्यों दिया गया, इस बात को लेकर संघ ने महेश चंद्र शर्मा जी को घेरना शुरू कर दिया। इसके बाद महेश जी ने पुनः संदेश भेजकर खुद को और अपनी संस्था को बचाने की कोशिश की:

महेश जी:“संदीप जी, किसने आमंत्रित किया आपको संघ के मंच पर? मैंने तो आपको एकात्म मानव अध्ययन के अकादमिक मंच पर आमंत्रित किया था। ऐसा असत्य प्रचार आप क्यों करते हैं। इसको सार्वजनिक करने के पहले क्या आपको मुझे या राय साहब को सूचित नहीं करना चाहिए था? शुभम्।”

मैंने उन्हें स्पष्ट शब्दों में उत्तर दिया:

मेरा जवाब:“क्या एकात्म मानव संघ से संबंधित नहीं है? यह आप घोषित कर दीजिए, मैं हेडिंग बदलवा दूंगा। यह केवल थंबनेल पर है, अंदर कहीं नहीं है। आप संघ से अलगाव की बात कहिए, मैं अभी बदलवाता हूं। और वीडियो संचालक अशोक शर्मा जी से परमिशन लेकर हमने शूट किया था और उनके परमिशन के बाद ही डाला है।”

इस पर महेश जी ने बचाव की मुद्रा अपनाते हुए लिखा:

महेश जी:“एकात्म मानवदर्शन अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान के मासिक स्वाध्याय मंडल का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से कोई आधिकारिक संबंध नही है। प्रतिष्ठान अपने कार्य व्यवहार के लिए स्वयं उत्तरदायी है। शुभम्।”

मैंने उन्हें मंच के सत्य का संस्मरण कराते हुए लिखा:

मेरा जवाब:“आदरणीय, मंच से मैं बार–बार संघ और संघ स्वयंसेवकों को संबोधित कर रहा था, उसी वक्त आपको टोकना चाहिए था कि एकात्म… का संघ से कोई लेना–देना नहीं है। वहीं मैं अपनी बात वापस ले लेता। वह बात तो वीडियो में आपके समक्ष ही आ गयी है। वैसे आज मैं अपने वीडियो में घोषणा कर दूंगा कि आपने कहा है कि एकात्म का संघ से कोई संबंध नहीं है।”

इस पर उन्होंने और अधिक रक्षात्मक रुख अख्तियार किया:

महेश जी:“जो मैने कहा है वही कहियेगा। मैने यह नहीं कहा है कि ‘एकात्म का संघ से कोई संबंध नहीं है।’ एकात्म तो विचार है किसका संबंध किससे है और किसका नहीं है, यह कहने या बताने का मुझे कोई अधिकार नहीं है। एकात्म मानवदर्शन अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान के मासिक स्वाध्याय मंडल का किसी इतर संगठन से कोई संबंध नहीं। आश्चर्य है इसको समझने में आपको कठिनाई हो रही है। आप अपने विडियो में कुछ घोषणा करें इसमें मेरी कोई रुचि नहीं है। मेरी रुचि इस बात में है कि आप जैसा सुधि व्यक्ति, सत्य जैसा है उसको वैसा ही समझे। शुभम्।”

मैंने अंत में स्पष्ट कर दिया:

मेरा जवाब:“सत्य से मैं अवगत हूं आदरणीय। संघ भाजपा से खुद को डिटैच्ड दिखाती है और भाजपा का संगठन महामंत्री संघ से ही होता है। यही तो संघ का अपंजीकृत होने का फायदा है। सभी उसकी संस्थाएं हैं और फिर कोई भी उसकी संस्था नहीं है। यही संघ और उसकी संस्था का स्वरूप है। आप निश्चिंत रहिए आपका बयान यथावत पढ़ दूंगा।”

इतिहास के आईने में डॉ. महेशचंद्र शर्मा एवं संघ के ‘अपंजीकृत‘ होने की चतुराई

डॉ. महेश चंद्र शर्मा जी का यह दावा कि ‘प्रतिष्ठान का संघ से कोई आधिकारिक संबंध नहीं है’, केवल राजनीतिक ढाल है। डॉ. महेश चंद्र शर्मा कोई साधारण अकादमिक चिंतक भर नहीं हैं। वे छात्र जीवन में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के पूर्णकालिक कार्यकर्ता रहे, राजस्थान विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष रहे, राजस्थान भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रहे और राज्यसभा में भारतीय जनता पार्टी के सांसद रहे। पंडित दीनदयाल उपाध्याय के ‘एकात्म मानववाद’ पर 10 खंडों के संपूर्ण वांग्मय का संपादन करने वाले और दीनदयाल शोध संस्थान से दशकों से जुड़े व्यक्ति का यह कहना कि उनका संघ से नाता नहीं, संघ की उसी पुरानी रीति का हिस्सा है।

संघ स्वयं एक अपंजीकृत संगठन (Unregistered Organization) है। इसकी कार्यशैली ही यही रही है कि भाजपा, विद्यार्थी परिषद, विहिप, दीनदयाल शोध संस्थान और एकात्म मानव दर्शन प्रतिष्ठान—सभी संघ के आनुषंगिक अंग हैं, सभी के शीर्ष पदों पर प्रचारक बैठते हैं, परंतु जब भी कोई तीखा सत्य सामने आता है, तुरंत ‘स्वायत्तता’ की आड़ लेकर दायित्व से पल्ला झाड़ लिया जाता है।

वरिष्ठ अधिवक्ता पी.एन. मिश्र जी का साधुवाद

जहाँ आयोजक संगठन की नाराज़गी से घबराकर शब्दों के जाल में उलझ रहे थे, वहीं सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता और श्री राम जन्मभूमि के सर्वप्रमुख अधिवक्ता एडवोकेट पी.एन. मिश्र जी ने इस व्याख्यान को सुनकर अत्यंत सारगर्भित संदेश भेजा। उन्होंने लिखा:

“आपका साहसिक व्याख्यान पूरा सुना। यह जाति से संबंधित न केवल पक्षपात रहित इतिवृत्त को प्रस्तुत करता है, वरन् राजनैतिक व्यवस्था के कुत्सित एवं संकीर्ण सोच को प्रकट करते हुए उसके परिहार का उपाय भी सुझाता है। एतदर्थ साधुवाद।”

प्रसिद्ध लेखिका व विचारक कुसुमलता केडिया जी का समर्थन: ‘धर्म मीमांसा‘ पर विस्तृत विमर्श का आह्वान

इसके साथ ही, प्रख्यात लेखिका एवं प्रखर चिंतक कुसुमलता केडिया जी ने मेरे इस व्याख्यान को सुनकर मुझसे फोन पर लंबी वार्ता की। उन्होंने भाषण की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए कहा कि औपनिवेशिक काल से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी और वर्तमान सरकार तक जिस प्रकार व्यवस्था को क्रमबद्ध व तथ्यात्मक रूप से उजागर किया गया है, वह अद्भुत और अभूतपूर्व साहस का कार्य है।

कुसुमलता केडिया जी का समर्थन

कुसुमलता दीदी ने कहा कि स्वाध्याय मंडल में समय के संकोच के कारण आपको अपनी बात संक्षेप में रखनी पड़ी थी। उन्होंने आह्वान किया कि मेरे इस पूरे 80 पृष्ठ के शोध आलेख को उनके मंच ‘धर्म मीमांसा’ पर चार से छह कड़ियों में, बिना किसी जल्दबाजी के, एक-एक तथ्य, पृष्ठ संख्या और संदर्भ सहित समाज के सामने रखा जाए। उन्होंने यह भी साझा किया कि किस प्रकार ‘धर्म मीमांसा’ को पीएमओ और देश-विदेश की शीर्ष बौद्धिक व नीतिगत एजेंसियां गंभीरता से देखती हैं। उन्होंने रेखांकित किया कि वैचारिक युद्ध में तथ्यों की ही सबसे बड़ी शक्ति होती है, और जब लंका में आग लग ही चुकी है, तो इस आख्यान को पूरी गहराई के साथ जन-जन तक ले जाना अनिवार्य है।

शारदा पीठाधीश्वर का आशीष: साधक कभी अकेला नहीं होता

इससे पूर्व, भारतीय ज्ञान-परंपरा की सर्वोच्च पीठ ॥ श्री शारदा सर्वज्ञ पीठ, काश्मीर भारत ॥ के पीठाधीश्वर डॉ. स्वामी अमृतानन्द देव तीर्थ जी महाराज ने भी इस व्याख्यान पर अपना विस्तृत संदेश भेजकर स्पष्ट किया था कि आज के शोरगुल में तथ्यों को रखने वाला व्यक्ति पत्रकार नहीं, साधक बन जाता है। उन्होंने लिखा था कि खंडित कश्मीर की पीठ खंडित समाज को स्वीकार नहीं कर सकती; अतः मंदिर, विश्वविद्यालय और सेना में केवल ‘तप और योग्यता’ ही कसौटी होनी चाहिए, कोटा या प्रमाणपत्र नहीं।

स्वामी जी के ये सूत्रवाक्य मेरी चेतना में सदैव अंकित रहेंगे:

“तपस्या ब्राह्मणत्व देती है, प्रमाणपत्र नहीं।योग्यता राष्ट्र बचाती है, कोटा नहीं।साहस इतिहास लिखता है, भीड़ नहीं।”

एक निष्पक्ष पत्रकार और शोधकर्ता के रूप में मेरा यह स्पष्ट मानना है कि संस्थाएं और नेता संघ की नाराज़गी या सत्ता के भय से पीछे हट सकते हैं, परंतु जब शारदा पीठ के पूज्य स्वामी जी, राम जन्मभूमि के शीर्ष अधिवक्ता पी.एन. मिश्र जी और कुसुमलता केडिया जी जैसी मनीषी इस सत्य के साथ खड़े हैं, तो राष्ट्र-सत्य को उजागर करने की यह वैचारिक यात्रा बिना झुके और बिना रुके निरंतर जारी रहेगी।

Ssandeep Deo October 1, 2026
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TAGGED: #BJPandRSS, RSS, rss and bjp, RSS and the Syndicate, sandeep deo, sandeep deo blog, sharda peeth

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Ssandeep Deo
Posted by Ssandeep Deo
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Journalist from 2.5 decades | Bestseller Author by Nielsen Jagran | Awarded the Sahitya Akademi Award for his book writing | He also received the Pandit Madan Mohan Malaviya Award and the Shivaji Ratna Award for journalism | Founder Editor of https://www.indiaspeakdaily.in
5 Comments
  • Avatar Anonymous says:
    October 2, 2026 at 10:18 am

    संदीप जी आप ने बहुत ही साहस, तथ्य, साक्ष्य और सत्यनिष्ठा से हनुमानजी की तरह लंका मे आग लगा दी है आपको वंदन सह अभिनंदन।

    Loading...
    Reply
    • Avatar Anonymous says:
      October 4, 2026 at 4:52 pm

      जय सियाराम हर हर महादेव!संदिपजी

      Loading...
      Reply
  • Avatar Anonymous says:
    October 2, 2026 at 1:25 pm

    सत्य, असत्य को चुभता है। मां शारदा पीठाधीश्वर ने जो आप के लिए कहा, सर्वोपरि है! आदरणीय श्री पी एन मिश्र जी ने और कुसुम लता केडिया दीदी ने आपको जो सम्मान दिया, सर्वोपरि है! हमें आप पर गर्व है! आप के घंटों के परिश्रम का फल आपको मिल गया!बस बाकी सब गौण है 🙏🙏

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    Reply
  • Avatar Anonymous says:
    October 2, 2026 at 3:03 pm

    संदीप देव जी,
    आपने जिस अदम्य साहस और निर्भीकता से संघ के मंच से उनके प्रारंभ से किए जा रहे राष्ट्र विरोधी,सनातनी हिंदू विरोधी नीतियों एवं कार्यों की धज्जियां उड़ाई वो आपके जैसा राष्ट्रवादी सनातनी पत्रकार ही कर सकता है। अब संघ उससे पल्ला झाड़ ले या उस मंच से अपने आप को अलग मान ले, कोई फायदा नहीं है, क्योंकि बुद्धिजीवी वर्ग सबकुछ जानता है।
    आपके सनातनी पत्रकारिता और सनातनी हिंदुओं के लिए किए जा रहे कार्य के लिए सनातनी हिंदू आपका सदैव ऋणी रहेगा। आपका बहुत बहुत धन्यवाद और आभार 🚩🚩

    Loading...
    Reply
  • Avatar Mahavir Singh says:
    October 2, 2026 at 9:42 pm

    आपने समाज में हमारी एकता को तोड़ने की ब्रिटिश योजना के बारे में सभी तथ्य सामने रखे हैं। मौजूदा राजनीतिक पार्टियां, खासकर BJP और RSS, जाति-आधारित कानूनों (जैसे UGC एक्ट, SC/ST एक्ट, आरक्षण आदि) के ज़रिए हिंदू समाज को बर्बाद कर रही हैं। ये कानून हिंदुओं को जाति के नाम पर आपस में लड़ने के लिए उकसाते हैं, जिससे भारत का विनाश हो रहा है। हमारे सभी राजनेताओं, खासकर भाजपाइयों और संघियों पर शर्म आती है।

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