योगी जी शङ्कराचार्य पर कहते हुए कहा,”हर व्यक्ति शंकराचार्य नहीं हो सकता। अगर वह शंकराचार्य थे तो आप लोगों ने(सपा वालों ने) वाराणसी में लाठी चार्ज क्यों किया था। एफआईआर क्यों लिखा था।”
योगीजी, आप मुख्यमंत्री भी हैं और उससे पहले गोरक्षपीठाधीश्वर हैं। आपको झूठ बोलना शोभा नहीं देता। साल भर पहले आप स्वयं शंकराचार्य कह सम्बोधित करते हैं। आपके मठ का ऑफिसियल हैंडल अविमुक्तेश्वरानंद को ‘शङ्कराचार्य’ कह सम्बोधन किया है। और अब? दूसरी बात,’हर व्यक्ति शङ्कराचार्य नहीं हो सकता’ अभी कुम्भ में ही आपके द्वारा छद्म शङ्कराचार्यों को पट्टा दिया गया। आश्रम दिया गया। बकायदा उनका नाम फलाने पीठ के शङ्कराचार्य रूप में परिभाषित किया गया। क्या यह आपकी जानकारी से बाहर की चीज़ है? क्या इन सभी को नोटिस दिया गया? क्यों नहीं कार्यवाई किए? आप वासुदेवानंद को ‘शङ्कराचार्य’ कह सम्बोधित करते हैं, मंचासीन होते हैं, क्या वो अधिकृत शङ्कराचार्य हैं? क्या आपने इन्हें नोटिस दिया? अधोक्षजानंद को ‘शङ्कराचार्य’ कह संघ, बीजेपी थाईलैंड घुमाती है, क्या आपने इस विषय को पार्टी या संगठन में उठाया?
तीसरी बात, अखिलेश के लाठी चलाने के समय वो शङ्कराचार्य नहीं थे, सिर्फ दण्डी संन्यासी थे। अधकचरा ज्ञान सदैव खतरनाक होता है। और योगीजी आपसे यह त्रुटि हो, सम्भव नहीं। अगर कर रहे इसका मतलब मतभेद गहरा है। आप शांत रहते, न बोलते तो शायद बेहतर रहता। पर्दे के पीछे की बाते पब्लिक में न आती। आने वाले समय में अन्य बातें भी पर्दे का आवरण फाड़ कर पब्लिक होंगी जो अभी तक केवल कयास के तौर पर चर्चा की जाती है। आपका बयान साफ साफ गंभीर मतभेद दर्शाता है। सतुआ बाबा के आश्रम में आपके डीएम, एसपी रोटियां सेंक रहे थे (इनकी फोटू, वीडियो वायरल हुई थी), उनको भीड़ के साथ संगम तक ले जाने से भगदड़ नहीं मची। लेकिन शङ्कराचार्य के जाने से भगदड़ मच जाती। माने गजब है।
खैर, अहम का टकराव सदियों से होता आया है। आज भी वही हो रहा है। इसका मतलब साफ स्पष्ट है कि सारा कार्यक्रम पूर्व नियोजित था और उसी क्रम में आगे बढ़ रहा है।
संघ को कैसे भी शंकराचार्य पद पर किसी ग़ैर ब्राह्मण को प्रवेश कराना है। धर्म के क्षेत्र में यह उसका अल्टीमेट गोल है। ऑर्थोडॉक्स हिंदुत्व को ख़त्म कर उसे neo-हिंदुत्व ऑर्डर से रिप्लेस किया जा सकता है। उसके लिए वो तमाम चक्रव्यूह रच रहा है। कई फर्जी शंकराचार्य और जगद्गुरु वह तैयार कर चुका है। इसके लिए वह दशकों से लगा है। उसे एक ऐसे व्यक्ति की तलाश है जो यह अभियान पूर्ण कर सके। संघ को शंकराचार्य परंपरा के लोकतांत्रिकिकरण के लिए जिस धारदार हथियार की तलाश थी वो पूरी हो गई है। योगीजी का ‘संघम शरणम् गच्छामि’ अब पूर्ण हो गया है। खैर, इसका शुभारंभ उसी दिन हो गया था जब इनसे इनकी युवा वाहिनी भंग कराई गई। और शङ्कराचार्य प्रकरण एक कदम और संघ पर डिपेंडेंट होने की तरफ बढ़ा लिए हैं। पूरा डिस्कोर्स ऐसे इंजीनियर किया गया है कि पहले फेज में समर्थक सुखी महसूस करेंगे दूसरे फेज़ में विरोधी। वन एट ए टाइम।
साधु-संत और सनातन परंपरा को मानने वाले लोग कभी इस सरकार की USP हुआ करते थे। लेकिन अब संदेश साफ है अगर आप नवनिर्मित नैरेटिव में फिट नहीं बैठते तो फर्क नहीं पड़ता कि आप शंकराचार्य हैं या जनेऊ-कांठी माला धारण किए कोई संत। डंडा ऐसा घूमेगा कि पहचान, परंपरा और धर्म एक साथ नीचे गिर जाएंगे। इसमें वही साधु, संत फिट बैठेंगे जो संघ प्रमुख को ‘पूज्य’ ‘परम्पूज्य’ कहेगा और पार्टी, संगठन के समक्ष नतमस्तक होंगे। उम्मीद करते हैं अगले सदी तक हम संघ का लाया नया धर्म देखें जिसके गर्भ गृह में भारत माता और पेरीफेरी में अंबेडकर, फूले और पेरियार आदि की मूर्तियाँ देखें।
करपात्री जी महाराज दूरदर्शी थे। उन्हें पता था कि धर्म के लोकतांत्रिकिकरण के आड़ में संघ क्या लाने वाला है। इनकी दूषित धार्मिक समझ उन्हें भली भाँति ज्ञात था। बौद्ध मठों और विहारों के तरह सनातन धर्म स्थल भी एक दिन पर्यटन का केंद्र बनकर रह जाएँगे बस। महाराज जी ने अपनी पुस्तक ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिन्दु धर्म’ में विस्तार में इनके क्रियाकलापों, प्रलापों को लिखा है।
