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India Speak Daily > Blog > समाचार > देश-विदेश > क्या वोटरों को लुभा पायेगा अरुण जेटली का बजट?
देश-विदेश

क्या वोटरों को लुभा पायेगा अरुण जेटली का बजट?

Courtesy Desk
Last updated: 2018/02/04 at 11:33 AM
By Courtesy Desk 111 Views 6 Min Read
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6 Min Read
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भारतीय मिडिल क्लास जिसके लिये बजट का सिर्फ एक ही अर्थ होता है और वह इनकम टैक्स की छूट। बाकी बजट को पढ़ना और उसकी मजबूत अर्थव्यवस्था में होने वाली भूमिका से कोई मतलब नही होता है। हमे चीन को भी पटकना है, पाकिस्तान को घर मे घुस कर पीटना है और इस सबके साथ हमे गांव गांव सड़क, बिजली, अस्पताल भी चाहिये है। लेकिन शर्त यह की यह सब हमको बिना किसी कष्ट और प्रतिभागिता के चाहिये है। अमित सिंघल की कलम ने कुछ लिखा है, उसे पढ़ने की जरूरत है बाकी मोदी को 2019 में हराने और इनकम टैक्स पर रुदाली का कार्यक्रम बदस्तूर जारी रखिये क्योंकि गांव, गरीब और महिलाएं 2019 में मोदी को जिताने में लगेंगे।

दिल्ली की सीलिंग और कांग्रेस-केजरीवाल का खेल!

बजट प्रस्तुत होने के बाद कुछ मित्रों ने फेसबुक में मोदी सरकार के प्रति अपनी नाराजगी प्रकट की है। कहने को तो वह वित्त मंत्री जेटली को ब्लेम कर रहे हैं लेकिन यह मानकर चलिए कि इस दोषारोपण के असली हकदार प्रधानमंत्री मोदी जी है। कुछ मित्रों ने लिखा कि सरकार के बचाये हुए पैसों से अगले वर्ष कांग्रेस चुनाव जीत के मौज उड़ाएगी। उनका ऐसा लिखने का मतलब यह है कि वे प्रधानमंत्री के कार्य करने की प्रणाली को नहीं समझ पाए।

क्या आप वास्तव में ऐसा प्रधानमंत्री चाहते हैं जो चुनाव जीतने के लिए आपके और हमारे कर से जुटाई गई निधि को ऐसे ही उड़ा दे; अनाप-शनाप के खर्चों में बर्बाद कर दें। फिर उनमें और कांग्रेसियों में क्या फर्क रह जाएगा? क्या आपकी माता जी ने पड़ोसियों को खुश करने के लिए अपने जेवर बेचकर उनको राज भोग कराया था? क्या उन्होंने अपने घर के बजट की ऐसी तैसी कर दी थी?

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इस सदी में हुए अब तक के चुनावों में हर चुनाव के एक वर्ष पूर्व प्रस्तुत किए गए बजट में सरकार ने अपने खर्चे को वोटरों को लुभाने के लिए अभूतपूर्व रूप से बढ़ा दिया गया था। सन 2009 के चुनाव के पिछले वर्ष सरकारी खर्च 24% बढ़ गया था, जब कि पिछले चुनाव के एक वर्ष पूर्व सन 2013 के बजट में सरकारी खर्च साढ़े दस प्रतिशत से अधिक बढ़ गया था। लेकिन मोदी सरकार ने इस वर्ष के सरकारी खर्च में सिर्फ 10% की वृद्धि हुई जबकि अगले वर्ष चुनाव होना है।

इस बजट में उसके लिए गांवों में सड़क, शौचालय, सिंचाई, बिजली, गैस और सर के ऊपर छत उपलब्ध कराने के बारे में है। यह बजट ग्रामीण विकास और बुनियादी ढाँचे के बारे में है। पिछले वर्ष और इस वर्ष को बजट को अगर मिला कर देखें तो सरकार एक लाख आठ हज़ार किलोमीटर ग्रामीण सड़क बना देगी। अगले चुनाव होने के पहले लगभग सभी गांवों में सड़क पहुंच जाएगी। इसी प्रकार दो वर्षों (पिछले वर्ष और इस वर्ष) में एक करोड़ से अधिक ग्रामीण घर बन जाएंगे; चार करोड़ से अधिक घरों में बिजली पहुंच जाएगी तथा आठ करोड़ घरो में फ्री की गैस। यह सब कुछ अगले लोकसभा चुनावों के पूर्व हो जाएगा। इसके अलावा गांवों में 18 करोड़ से अधिक बैंक अकाउंट खोल दिए गए हैं तथा कई लाख हेक्टेयर भूमि को सिंचाई की सुविधा प्रदान कर दी जाएगी।

ऐसा नहीं है कि यह सिर्फ कागजी स्कीम है; इन सभी प्रोजेक्ट के लिए बजट में उचित धन का प्रावधान है। और उनकी चौबीसों घंटे मॉनिटरिंग हो रही है। इनको आप अगर स्वास्थ्य बीमा से जोड़ कर देखें, तो इस बजट में कम से कम 50 करोड़ ग्रामीण और निर्धन व्यक्तियों को सीधे-सीधे लाभ होगा, जिनमें 25 करोड़ मतदाता सूची में हो सकते हैं (बाकी 18 वर्ष से कम आयु के हो सकते हैं)। पिछले लोकसभा चुनावों में लगभग 55 करोड़ भारतीयों ने मत दिया था. इसमें से भाजपा को 31% तथा एनडीए को लगभग 40% वोट मिले थे. एक तरह से भाजपा को 17 करोड़ भारतीयों ने वोट दिया था तथा एनडीए को 22 करोड़ मत मिले थे।

राजस्थान में हुए उपचुनावों में बुरी तरह हारने के बाद भी भाजपा को 40% मत मिले। इसका मतलब यह है कि वह ग्रामीण मतदाता जिन्हें अभी हाल ही में गैस, बिजली, शौचालय और घर मिला, तथा उनका गांव सड़क से जुड़ा, वह शायद मतदान केंद्र के समय जाते हुए सोचे कि उसे क्या लाभ हुआ है और उनमे से आधे लाभार्थी अल्टीमेटली कमल पर उंगली रख दे। अतः आप नेतृत्व पर अपना विश्वास बनाए रखें।

साभार: अमित सिंघल वाया पुष्कर अवस्थी के फेसबुक वाल से

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Courtesy Desk February 3, 2018
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