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India Speak Daily > Blog > इतिहास > आजाद भारत > आपातकाल में किया गया पाप यथावत जारी क्यों?
आजाद भारत

आपातकाल में किया गया पाप यथावत जारी क्यों?

ISD News Network
Last updated: 2025/06/26 at 5:55 PM
By ISD News Network 30 Views 32 Min Read
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प्रो. रामेश्वर मिश्र पंकज। 25 जून को आपातकाल की स्मृति का दिन है। आपातकाल में क्या हुआ पहले तो संक्षेप में आपको यह बता दें। वैसे तो सारा देश जानता है लेकिन नई पीढ़ी शायद नहीं जानती हो कि उस इमर्जेन्सी की पृष्ठभूमि क्या थी। जयप्रकाश नारायण जी ने भ्रष्टाचार की समाप्ति के लिए जो आंदोलन छेड़ा उसकी पृष्ठभूमि यह थी कि देश के नवयुवकों ने वह आंदोलन छेड़ा। सबसे पहले गुजरात में नवनिर्माण आंदोलन हुआ। उसके बाद फिर देश भर के युवक इकट्ठे, हुए विशेषकर गुजरात, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, आदि के और दक्षिण भारत के भी और उन्होंने जयप्रकाश जी से निवेदन किया कि आप नेतृत्व करें इस युवा आंदोलन छात्र आंदोलन की अगुवाई करें।

तो जयप्रकाश जी ने स्वीकार कर लिया ये कह के कि फिर मेरा अनुशासन मानना पड़ेगा। तो सब ने स्वीकार कर लिया और उन्होंने जो आंदोलन छेड़ा वो जो लोग उस समय जीवित थे, केवल वही उसका महत्व ठीक से आंखों देखा बता सकते हैं जिन जय प्रकाश जी की उससे पहले 1960-62 के बाद केवल छोटी-छोटी सभाएं ही हो पाती थीं संपूर्ण क्रांति आंदोलन प्रांरभ होते ही उनकी सभा में लाखों की भीड़ होने लगी। लाखों लाखों लोग। हर शहर में। कहीं एक लाख, कहीं दो लाख, कहीं 5 लाख लोग उमड़ पड़ते थे। जिसका अर्थ था कि सारा देश परिवर्तन चाहता है। इंदिरा गांधी जिस तरह से सत्ता चला रही थी और जो मनमानी कर रही थी उसके विरुद्ध सारा देश चाहता है। स्वच्छ शासन इंदिरा जी ने बिहार में गोली भी चलवाई आंदोलनकारियों पर।

लेकिन दमन …………………… लोगों ने और ज्यादा प्रतिरोध का मार्ग अपनाया। सारे देश में एक अलग ही वातावरण बन गया। इस बीच राज नारायण जी ने इंदिरा गांधी की चुनावी विजय को लेकर चुनाव को चैलेंज करते हुए एक याचिका दाखिल की जिसमें ये बताया कि गलत संसाधनों का उपयोग करके और गलत ढंग से प्रोपेगेंडा करके, झूठा प्रोपेगेंडा करके इंदिरा गांधी सरकारी साधनों के दुरुपयोग के द्वारा जीती हैं और प्रमाणों के द्वारा उन्होंने यह प्रमाणित कर दिया। तो माननीय उच्च न्यायालय ने ने उनकी चुनाव की विजय को रद्द घोषित कर दिया कि ये अवैध साधनों से विजय हुई है इसलिए ये इनकी जीत नहीं मानी जाएगी। वो प्रधानमंत्री बन गई थी इस विजय के द्वारा। तो इससे हड़कंप मच गया और इंदिरा गांधी को बहुत क्रोध आया तो उन्होंने जुडिशरी को भी सबक सिखाने की सोची और विपक्षी नेताओं को भी और उन्होंने देश में अपने लोगों से सलाह करके इमरजेंसी घोषित कर दी।

25 जून की रात को जय प्रकाश नारायण, मुरारजी देसाई, राज नारायण, चरण सिंह, अटल जी, आडवानी जी, नाना जी, दे’ामुख, जो’ाी जी और बहुत सारे लोग, बहुत सारे युवा नेता किशन पटनायक, जो नीतीश कुमार वगैरह भी, ये सब लोग गिरफ्तार हो गए। गोविंदाचार्य अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के थे। गोविंदाचार्य तो भूमिगत हो गए। लेकिन अन्य बहुत से छात्र नेता गिरफ्तार भारतीय जनता पार्टी जो बाद में बनी, पहले जनसंघ थी जनसंघ के महत्वपूर्ण नेता, समाजवादियों के महत्वपूर्ण नेता, सारे ही बंदी बना लिए गए। जयप्रका’ा जी ने बस इतना कहा ‘‘ विनाश’ काले विपरीत बुद्धि’’। और जो पुलिस दल उन्हें लेने आया था, उसके साथ सहज ही चल दिए। उनकी बात बाद में अं’ातः सही निकली पर अं’ातः तो वह पाप आज तक जारी है। सभी गेर कांग्रेसी नेता जेल में डाल दिए गए छात्र नेता डाल जेल में डाल दिए गए और कुछ पत्रकार जो संपूर्ण क्रांति आंदोलन का खुलकर समर्थन कर रहे थे, जिनमें से एक मैं भी था, उनको भी जेल में डाल दिया गया और कुछ के विरुद्ध तैयारी की जाने लगी क्योंकि प्रमाण नहीं थे सिवाय इसके कि उन्होंने भाषण दिया और लेख लिखा। तो ये तो कोई प्रमाण नहीं था तो उनके विरुद्ध कुछ घेरने की तैयारी होने लगी

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और ज्यादातर पत्रकारों को उनके मालिकों पर दबाव डाल के उनको उनकी नौकरी से अलग कर दिया गया जिनमें से स्वयं मेरी भी जो पत्रकारिता की नौकरी थी वो समाप्त कर दी गई। कहा गया कि अब आप की सेवाओं की आवश्यकता नहीं है। जहां चाहे वहां जाइए। ऐसे बहुत से लोग हो गए। उनमें से जिन्होंने और सक्रियता दिखाई उनको तो जेल में डाल दिया गया और शेष की नौकरी समाप्त कर दी गई। बहुत सारे लोग जैसे डॉक्टर रघुवंश थे जिनके दोनों हाथ काम नहीं करते थे वो पैर से लिखते थे वैसे बहुत बड़े विद्वान थे प्रयागराज के एक लेखक थे उनको भी कह दिया गया कि यह भी कुछ नारा लगा रहे थे और कुछ गलत काम कर रहे थे जो कि वो कर ही नहीं सकते थे सिवाय लिखने पढ़ने के उनको भी जेल में डाल दिया। जगह जगह जो कांग्रेस के विरोधी लोग थे उनको पुलिस के द्वारा सताया जाने लगा। कहीं किसी का घर गिरा दिया गया। यूं ही बिना किसी नोटिस के अथवा बहुत शॉर्ट नोटिस के और कई जगह तो अचानक झुग्गी झोपडि़यां तोड़ी जाने लगी और फिर विरोध करने पर गोली चली। नई दिल्ली तुर्कमान गेट में गोली चली। उस समय में दिल्ली में ही विद्यमान था जब तुर्कमान गेट में गोली चली।

संजय गांधी के नेतृत्व में उनकी एक शिष्या थी मुस्लिम उसकी उपस्थिति में वो सब झुग्गियांं उजाड़ी गई और गोली चली। सारी दिल्ली में तहलका मच गया, सारे देश में तहलका मच गया और जो कांग्रेस के चाटुकार थे और प्रशंसक थे और साथ ही कम्युनिस्ट पार्टी के लोगों ने सम्मेलन करना शुरू किया फासिस्ट विरोधी रैली यानी जयप्रकाश नारायण को फासिस्ट कह दिया। जो कि केवल लोकतांत्रिक आंदोलन कर रहे थे शांतिपूर्वक उनको सबको फासिस्ट कह के जेल में डाल दिया गया कि ये तो देश में फासिस्ट है और जो कांग्रेस स्वयं कर रही थी वो दूसरों पर आरोप लगा दिया गया और फासिस्ट विरोधी रैली कांग्रेस के लोग कम्युनिस्टों के सहयोग से करने लगे। कम्युनिस्ट उस समय शबाब पर थे, जवानी पर थे, जोश पर थे, सोवियत संघ से नेता आने लगे।

हर शहर में सोवियत संघ का कोई ना कोई प्रतिनिधि आता, उसका स्वागत होता और वहां के मुख्यमंत्री मंत्री आदि उनके स्वागत में आते। फिर बहुत बड़ा सम्मेलन करने की कोशिश होती लेकिन अक्सर वो सम्मेलन विफल हो जाते। कई जगह छात्र नेताओं ने, युवा लोगों ने अपने मन से भी काले झंडे दिखाए। तो उनको बहुत बुरी तरह मारा गया। स्वयं मेरा एक शिष्य था रामायण पटेल। उसने सोवियत उपराजदूत को रीवा में प+द्यधर पार्क में जब उनकी सभा थी तो काला झंडा दिखाया बड़ी होशियारी से क्योंकि पुलिस जबरदस्त चैकसी करती थी। उसको पकड़ लिया गया वो। बहुत ही दुबला पतला तेजतर्रार लड़का था। उसकी बहुत बुरी तरह पिटाई की गई। यहां तक कि उसके एक दो शरीर के अंग काफी कमजोर हो गए।

उसको बहुत मारा गया। बाद में उपचार से ठीक हुआ। लेकिन बहुत मारा गया। ऐसे ही लेकिन देश भर में जगह-जगह आंदोलन होने लगे। कुछ हमारे भी अनुयायी बहुत से युवकों ने, जो वैसे विद्यार्थी ही थे पढ़ रहे थे, लेकिन वो वास्तव में किसी राजनीतिक दल में सक्रिय भी नहीं थे, ऐसे बहुत से लोग अचानक सक्रिय हो गए। हमारे अपने महाविद्यालय के छात्र जो अब वृद्ध भी हो गए हैं, उन्होंने कई कहीं कलेक्टेªट का झंडा उतार के वहां काला झंडा लगाया, कहीं कमिश्नरी अॉफिस का झंडा उतार कर काला झंडा फहराया। देश भर में ये होने लगा और क्योंकि उसमें ज्यादातर अच्छे मेधावी छात्र काम कर रहे थे, मुख्य लोग तो जेल चले गए थे, तो उन पर सामान्यत पुलिस को शंका भी नहीं जाती थी। पुलिस बहुत परेशान थी।

ऐसा भय फैला दिया गया कि सामान्यत लोग कानाफूसी मेंं में भी कांग्रेस का विरोध करने से बचते थे लेकिन अंत में तो लोग तो लोग ही है वो भी भारत के लोग, आपस की बातचीत को बहुत महत्व देते हैं। तो चारों तरफ खूब जोर से किस्से फैल आपातकाल लगने के कारण प्रेस पर प्रतिबद्धता था तो यह हुआ कि जितना हो रहा था उससे कई गुनी अधिक कहानियां फैलने लगी कि वहां घर ढहा दिया। अगर चार घर ठहे तो 400 घर ठहने की बात फैली चार लोग मरे तो 440 लोग मर गए यह फैल गया। इंदिरा गांधी के प्रति घृणा फैलने लगी। कांग्रेस के प्रति विरोध फैलने लगा। भय भी फैला। आतंक फैल गया। अखबार सब झुक गए। मध्य प्रदेश प्रदेश में केवल दो अखबारों ने पहले दिन में संपादकीय छोड़ा एक नई दुनिया इन्दौर दूसरा बांधवीय समाचार, रीवा। इसके संपादकीय पेज मैं ही देखता था तो हमने काला छोड़ दिया। अगले दिन अखबार के मालिक की ओर से संपादक ने संदेश दिया कि आपने तो संपादकीय पेज काला छोड़ दिया, बहुत गलत किया। अब आपकी सेवाओं की आवश्यकता नहीं है। ऐसे ही और जगह हुआ होगा।

नई दुनिया में तो किसी को नहीं निकाला गया क्योंकि वहां नरेंद्र तिवारी जी थे वरिष्ठ कांग्रेसी थे लेकिन वो बहुत ही दमदार आदमी थे, बहादुर। तो उन्होंने किसी को नहीं निकाला श्री राहुल बालपुते संपादक थे और मालिकों में से ही अभय छपलानी उनके सहयोगी थे और राजेंद्र माथुर भी वहां काम करते थे। किसी को नहीं निकाला। सबको रहने दिया। यथावत। लेकिन बाकी अखबारों में प्रायः जो अच्छे पत्रकार थे उनको निकाल दिया गया। दिल्ली में, मुंबई में, कोलकाता में, और जबलपुर, रीवा, ग्वालियर, इन्दौर, पटना, प्रयागराज, कानपुर, काशी, सब जगह दमन हुआ। जयपुर में, जोधपुर में, जैसलमेर में, बीकानेर में, सभी जगह दमन हुआ। महाराष्ट्र में, गुजरात में, हरियाणा में, दिल्ली में। मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार में तो भयंकर दमन हुआ क्योंकि ये मुख्य केंद्रीय भूमि थे आंदोलन के। तो ऐसा अत्याचार हुआ। और बिना किसी प्रमाण के बिना किसी व्यवस्थित चार्जशीट के अनेक लोगों को जेल में डाल दिया गया और लोगों के घर ढहाए जाने लगे। पुलिस के द्वारा आतंकित किया जाने लगा हमारे भी परिवार के और भी परिवार के लोगों को पुलिस बार-बार आतंकित करने लगी। नेताओं के इशारे पे।

लेकिन इसके साथ पुलिस के भीतर यह भाव भी आने लगा कि हमको बेकार नागरिकों से उलझाया जा रहा है तो कई जगह पुलिस नरमी भी बरतती थी। कई बार पुलिस जिनके खिलाफ वारंट भी हो, उन्हें देख भी लेती थी तो गिरफ्तार नहीं करती थी। सभी प्रकार के लोग थे पुलिस में भी। ऐसे बहुत लोग थे जिनको लगता था कि अपनी गद्दी के लिए इतना अत्याचार। देश के अपने ही जैसे नेताओं के विरुद्ध कांग्रेस ये सब करवा रही है। दोनों बात थी। खैर मेरी स्थिति तो ये थी कि दिल्ली में तो मुझे काम मिला नहीं। हालांकि मैं दिल्ली में रहा। लेकिन हमारे जितने परिचित थे उसमें से रघुवीर सहायजी ‘दिनमान’ के संपादक थे। बहुत डरे हुए थे, कांप रहे थे और उन्होंने कहा कि अब तो मेरी नौकरी चली जाएगी।

तो मुझे संजय गांधी की आज्ञा माननी ही पड़ेगी और संजय गांधी के जो पांच सूत्र थे उनके आधार पर उन्होंने ‘दिनमान’ जैसी अत्यंत प्रबुद्ध राजनैतिक पत्रिका का एक एक एक विशेष अंक निकाल दिया जो कि बौद्धिक समर्पण की पराकाष्ठा थी। श्रीकांत वर्मा कवि थे, लेखक थे, लेकिन उससे ज्यादा वो कांग्रेस के नेता थे और वो स्वयं रघुवीर सहाय को आए दिन धमकाते कि मैं मैडम को जाकर आपकी शिकायत करता हूं, मैं ये करता हूँ, वो करता हूँ। तो इस प्रकार वो कांग्रेस के एक लंपट किस्म के और लफंगे किस्म के कार्यकर्ता की भूमिका निभाने लगे बजाय कवि और लेखक और पत्रकार के बाकी तो मनोहर श्याम जोशी जैसे लोग थे वो कम्युनिस्ट ही थे तो वो तो कांग्रेस के साथ ही थे।

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना सोशलिस्ट थे लेकिन उस समय दब गए तो इस प्रकार दिल्ली में तो निर्मल वर्मा के सिवाय कोई भी बड़ा लेखक पत्रकार ऐसा नहीं रहा जिसने खुलकर विरोध का साहस किया हो। जैनेंद्र जी ने किया लेकिन उनका तो एक दार्शनिक वाला पक्ष था, अधिकां’ा शांत रहते थे। निर्मल वर्मा खुलकर विरोध में थे असयजी विदेश चले गए कोई भी बड़ा लेखक बड़ा पत्रकार इंदिरा गांधी के विरुद्ध खड़े होने का साहस नहीं कर पाया और बहुत से लोग बढ़चकर इंदिरा गांधी की चाटुकारिता प्रशंसा, चापलूसी करते हुए सब तरह से निकृष्ट भूमिका निभाने लगे।

जयप्रकाश जी उनको एक बार आपातकाल लगने के पहले ही हरियाणा में एक पहलवान किस्म के आदमी ने कसकर ऐसे दबाया था चपेट के छाती से कि उनकी छाती की पसलियां दरक गई थी जिनके कारण उनकाहृदय कमजोर हो गया था, उसका उपचार अंत तक होता रहा। डायलिसिस भी होता रहा। किडनी भी कमजोर हो गई और अंत में उसी डायलिसिस की बीमारी के दौरान आपातकाल समाप्त होने के कुछ ही महीनों बाद जयप्रकाश जी का देहांत भी हो गया। इंग्लैंड, फ्रांस, हित पश्चिमी यूरोप और अमेरिका के दबाव से और भारत में आनंदमयी मां तथा अन्य संतों के दबाव से इंदिरा गांधी को आपातकाल समाप्ति की घोषणा चुनाव करने की घोषणा करनी पड़ी। साधारण आदमी तो डरा हुआ था कि कौन हिम्मत करेगा इंदिरा गांधी के विरोध की।

लेकिन जनता में भीतर जो भाव सुलग रहे थे, उसको जयप्रकाश नारायण ने तथा संतों ने देख लिया था। मैं आचार्य श्री राम शर्मा जी के पास शांति कुंज में था हरिद्वार में। तो हमने कहा कि क्या होगा? हमको तो नहीं लगता कि कोई खड़ा हो पाएगा या खड़ा होगा तो जीत पाएगा? तो उन्होंने कहा- ‘‘नहीं बेटे, सारे देश में आग लगी हुई है इंदिरा गांधी की कांग्रेस का सफाया हो जाएगा।’’

तो जो श्रेष्ठ लोग थे, बड़े लोग थे प्रतिभाशाली लोग थे, समाज की धड़कन का जिनको अंदाज था उनको सबको लगा कि अब जनता जवाब देगी और यही हुआ। जैसे ही चुनाव घोषित हुआ, जगह जगह जनता स्वयं उमड़ कर जो विरोधी दल के लोग थे उनको सहयोग देने लगी। जय प्रकाश जी ने दबाव डाल के सभी दलों का विलय करवाया और जनता पार्टी नाम की एक नई पार्टी बनी। इसमें सारे ही दल थे। जनसंघ भी था, सोशलिस्ट भी था, लोकदल भी था जनता पार्टी के सब प्रतिनिधि बनाए गए।

उनके प्रत्याशी बनाए गए जनता प्रत्याशी और जनता प्रत्याशी के पक्ष में सचमुच जनता जगह खड़ी जगह खड़ी हुई। जैसे मैं रीवा के लोकसभा चुनाव का उस बार प्रचार संयोजक। था यमुना प्रसाद शास्त्री जी हमारे प्रिय थे तो वो हमको हरिद्वार से आचार्य श्री राम शर्मा जी के यहां जहां मैं साधना के लिए था, आपातकाल में मैं वही रहने लगा था क्योंकि और कहीं कोई ठिकाना नहीं था तो मुझे वहां से बुला के ले गए कि आप चलिए। क्योंकि आप रीवा में बहुत दिन रहे हैं तो जानते हैं तो मुझे चुनाव प्रचार का प्रभारी बनाया गया तब मैंने देखा कि जनता अपनी ओर से धन दे रही है जिसकी जो हैसियत है कोई 1 रुपया कोई 2 रुपया कोई हजार भी, कोई 2000 भी, साधनों की कमी नहीं लोग साइकिल दे रहे हैं। उस समय साइकिल भी बड़ा साधन थी जो कार्यकर्ता प्रचार के लिए जा रहे हैं तो उनको आगे से लोग कहते थे हमारे घर में दो साइकिल है एक साइकिल आप चुनाव के समय तक रख लीजिए।

कुछ लोगों ने मोटरसाइकिल दी कार दिया। ऐसे सारे देश में हुआ। जनता ने स्वयं वो चुनाव लड़ा। परिणाम यह हुआ कि महाराजा रीवा जो रीवा राज्य में निर्विवाद रूप से लोकप्रिय व्यक्ति थे और थे भी बहुत अच्छे आदमी लेकिन क्योंकि वो कांग्रेस के समर्थन से खड़े हुए थे तो महाराजा रीवा जिनके बारे में कोई कल्पना नहीं कर सकता कि ये पराजित किए जा सकते हैं वो हार गए। यमुना प्रसाद शास्त्री जैसे अत्यंत साधारण आर्थिक स्थिति के लगभग गरीब परिवार के एक नेता से महाराजा रीवा हार गए। ये जनता में भावना आ गई ये। अलग बात है कि बाद में जब जनता पार्टी आपस में लड़ी और 18 महीने बाद ही फिर से चुनाव हुआ तो महाराजा रीवा जीत गए देश भर में कांग्रेस जीत गई क्योंकि लोगों को लगा कि ये तो बंदरों की तरह आपस में लड़ते हैं और शासन करना जानते ही नहीं। आपस में लड़ते हैं कुत्ते बिल्लियों की तरह और इनको शासन करना नहीं आता तो लोगों ने फिर से कांग्रेस को वापस ला दिया। लेकिन पहली बार 77 में जो चुनाव हुआ उसमें जनता ने कांग्रेस का उत्तर भारत में सफाया कर दिया। तो ये तो हुआ।

आपातकाल में जितना दमन संभव था लोकतंत्र के परिवेश वाले देश में उतना अधिकतम दमन कांग्रेस ने किया। हालांकि अगर सोवियत संघ और चीन से तुलना करें अथवा यूरोप के अन्य देशों में जैसा आपातकाल लगने पर बर्बर दमन होता है, कठोरता होती है, उसकी तुलना में तो कुछ नहीं था भारत का दमन क्योंकि हमने यूरोप का इतिहास पढ़ा है, हमें पता है यूरोप में विरोधियों को बहुत ही कठोरता से कुचला जाता है। देश का वातावरण ऐसा था, भारत का वातावरण ऐसा है विशेषकर हिंदू समाज का कि जो कोई ज्यादा अत्याचार करे उसके विरुद्ध लोग हो जाते हैं। इंदिरा गांधी को यह पता था तो उन्होंने छिपछिप कर जो नीचता हो सकती है, जो कुटिलता हो सकती है, जो दमन हो सकता है, जो अत्याचार हो सकता है वह किया।

लेकिन ऐसा भी नहीं है कि चाहे जिसको गोली मरवा दे, चाहे जिसको मार दे। ऐसा नहीं था। संभाल के। लेकिन योजना चल रही थी। अगर चार छ साल, और रह जाते बाहर का दबाव नहीं पड़ता तो इंदिरा गांधी से ज्यादा उनके जो चाटुकार सिपाहसालार थे वो दमन पर उतारू थे और वो चाहते थे कि सबको निपटा दिया जाए। तो तैयारी कांग्रेसियों की तो बहुत अधिक थी। लेकिन ना तो प्रशासन तंत्र में सब के सब उनके समर्थक थे, ना पुलिस में सब मन से उनके समर्थक थे, ना जुडिशरी में सब उनके मन से समर्थक थे, और देश का वातावरण तो ऐसे सब अत्याचारों के विरुद्ध ही है। तो इसलिए जब यूरोप का दबाव पड़ा पश्चिम यूरोप का और संयुक्त राज्य अमेरिका का तो इंदिरा गांधी को चुनाव की घोषणा करनी पड़ी जनवरी 1977 में चुनाव सम्पन्न हुए। दिसंबर के अंत में ही घोषणा हो गई थी।

उसका परिणाम यह हुआ कि जनता खुलकर आ गई जनता ने अपने मनोभाव व्यक्त किए खुलकर। 1977 का चुनाव वस्तुतः जनता ने लड़ा ये मैंने अपनी आंखों से देखा है। उसमें पार्टियां तब तक संगठित ही नहीं हो पाई थी। बस मिली ही थी जयप्रकाश नारायण के दबाव से ज्यादातर नेता जो जेले में रहे 18 महीने तो उनका घर ही अस्तव्यस्त हो गया था। किसी के पास साधन नहीं थे, कुछ अपवाद नेताओं को छोड़कर। कुछ ही थे जिनके पास बहुत धन है। शेष विरोधी नेताओं के पास अधिक साधन भी नहीं थे। तो बहुत ही कठिन परिस्थिति में लोग लड़े। जार्ज फर्नांडिस पर एक आरोप लगा दिया गया डायनामाइट कांड का केस जो कभी सिद्ध नहीं हो पाया कह दिया गया कि ये षड्यंत्र से इंदिरा गांधी की सत्ता को उलटना चाहते हैं। स्वयं जय प्रकाश नारायण पर राजद्रोह का आरोप लगाया गया कि ये स्थापित सत्ता को समाप्त करना चाहते हैं जबकि उनका तो कुछ भी नहीं था।

वो तो केवल आंदोलन कर रहे थे और जिसने स्वयं सत्ता का दुरुपयोग किया इंदिरा गांधी वो उस समय नायिका बनी हुई थी सोवियत संघ और कम्युनिस्टों के सहयोग से। तो एक प्रकार से बड़ा काला दौर था। बहुत ही अंधकारमय दौर था। लेकिन अगर आप यूरोप का और विशेषकर सोवियत संघ और चीन का, या यूरोप का भी चाहे वो जर्मनी हो, चाहे फ्रांस हो, चाहे इंग्लैंड हो जब वहां इस तरह से आपातकाल आता है तो बहुत कठोरता की जाती है बहुत कठोरता। उसकी तुलना में भारत में कम ही कठोरता हुई और सोवियत संघ जैसी क्रूरता तो यहां संभव ही नहीं है। क्योंकि यहां के किसान और यहां के नागरिक बहुत ही जागरूक है और वो वीर भी है नेताओं से अधिक वीर। इसलिए वैसा दमन तो संभव नहीं हुआ लेकिन जितना संभव था देश की परिस्थिति में उतना दमन कांग्रेस ने किया और जिस लोकतंत्र की अभिव्यक्ति की आजादी की बात राहुल गांधी और कांग्रेसी करते हैं, असल में भारत की जनता अगर वस्तुत सजग हो तो तो क्या कहें, पता नहीं यूरोप हो तो इनके मुंह पर थूक दें लोग और जूता मारे और टमाटर मारे। कि तुमने तो सभी लोकतांत्रिक अधिकारों को कुचल डाला था। भीषण दमन करने वाली कोई पार्टी है तो कांग्रेस है।

सारा दमन कांग्रेस ने किया। लोकतंत्र को एकदम कुचल डाला। जितना अधिक लोकतांत्रिक अधिकारों का दमन संभव है उतना कांग्रेस ने किया। कांग्रेस का रिकॉर्ड है कि उसने लोगों की आवाज दबाई। वि’वविद्यालयों में झूठी पढ़ाई कराई। ह्यूमैनिटीज में कम्युनिस्टों के सहयोग से झूठा इतिहास लिखवाया। इंदिरा गांधी ने तो एक कैप्सूल भी तैयार करवाया उसको गड़वा दिया कि ये सदा के लिए गड़ा रहेगा कि यही भारत का इतिहास है। उसमें अपनी चाटुकारिता लिखवाई लेकिन अंत में वो कुछ नहीं चला तो भारत की यह विशेषता भी है कि यहां लोग उतने खून खराबा के लिए तो नहीं निकलते लेकिन शांति से धैर्य से मन ही मन वो सत्य और असत्य का निर्णय करते रहते हैं और मौके पर अवसर आते ही वो सत्य के पक्ष में और असत्य के विरुद्ध खड़े होते हैं।

इसके लिए भारत के लोगों की विशेषकर हिंदू समाज की प्रशंसा करनी होगी स्तुति करनी होगी कि वो अंत में सत्य के पक्ष में ही खड़ा होता है राजनीतिक दलों का यह हाल है कि वस्तुत जब चुनाव जीत गए उस समय जो नेताओं का आचरण था उसकी याद करिए आप तो हंसी आती है। कोई कहता था कि मैं हनुमान चालीसा पढ़ता था जेल में इसलिए छूट गया। कोई कहता था गायत्री मंत्र पढ़ता था इसलिए मेरी रक्षा हुई। भारत की जनता इतनी सजग है और उसने ये वातावरण बनाया, उस जनता के प्रति हम कृतज्ञ हैं, ऐसी भाषा 1977 में किसी भी नेता को बोलते हमने नहीं सुना। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि भाई, जिस जनता ने इनको जिताया है, उसके प्रति साधुवाद तो दे नहीं रहे उसको। कहना कि आप हमारे ऊपर आशीर्वाद बनाए रखिए, कृपा बनाए रखिए, ऐसी स्वाभाविक भाषा कोई बोल ही नहीं रहा था। मैंने ये किया, मैंने वो किया। मैंने महामृत्युंजय मंत्र पाठ किया।

मैंने हनुमान चालीसा पढ़ा। मैंने सत्यनारायण की कथा का संकल्प लिया था। मैंने गायत्री मंत्र पढ़ा था। पढ़ा था या नहीं पढ़ा था क्योंकि ये कोई साधक तो थे नहीं। सब रजोगुणी लोग थे। नेता तो रजोगुण प्रधान ही होते है। किसी की तैयारी नहीं थी। आपातकाल में जो वास्तविक समस्या सामने आई कि सिवाय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के और कोई भी संगठन सक्षम ही नहीं था कि विरोध कर पाता। अगर इंदिरा गांधी 10 या 20 साल आपातकाल जारी रखती तो वो अंग्रेजों ने जैसा दमन किया उससे अधिक दमन कर देती और कुछ नहीं होता क्योंकि संगठन के स्तर पर कोई तैयारी नहीं थी। समाज में अवश्य चेतना थी। जैसे क्रांतिकारी लोग अंग्रेजों के समय तैयार हुए अगर कुछ समय तक आपातकाल रहा आता तो नए लड़के लड़कियां जो अराजनैतिक है, राजनीति में नहीं है वो निश्चित निकलते और वो फिर मारकाट भी करते इनको खत्म कर देते कांग्रेसियों को। लेकिन संगठित राजनीतिक दलों में ऐसी कोई भी तैयारी नहीं थी। यहां तक कि सिवाय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बाकी के संगठनों में तो सहायता को भी तैयारी नहीं थी।

व्यक्तिगत मैत्री या रिशेदारी के द्वारा लोगों ने खोज खबर ली। अगर किसी परिवार में कष्ट है, समस्या है रोग है हारी-बीमारी है, तो रिश्तेदारों ने, नातेदारों ने, मित्रों ने कुछ मदद की हो तो की लेकिन एक राजनीतिक संगठन के रूप में बहुत मदद करते हो एक दूसरे को, ये समाजवादियों तथा अन्य राजनीतिक दलों में बिल्कुल नहीं दिखा। केवल केवल जनसंघ और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में यह बात दिखी। लेकिन साथ ही क्योंकि ये लोग उतने ज्यादा लड़ाका नहीं थे तो बहुत सारे लोग टूट भी गए बहुत से लोगों ने माफी भी मांगी कि चलो माफी मांग ले और बाहर जाए। लेकिन सबसे ज्यादा व्यवस्थित विरोध अगर किसी ने किया तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने ही देश भर में किया। अगर लगभग एक लाख लोग देश भर में गिरफ्तार हुए तो उसमें 50 हजार से अधिक संघ और जनसंघ के लोग थे और शेष 50 हजार में सात आठ पार्टियों के लोग थे।

तो उसमें बहुत अच्छे कार्यकर्ता गिरफ्तार हुए थे जो तपे तथपाए थे। वो तो झुकने का सवाल ही नहीं। वो तो जीवन भर जेल में रहने की तैयारी थी। उनकी भगवान का भजन करना, वही शाखा लगाना, वही प्रार्थना करना, सब मस्त रहते थे। लेकिन जो नए नए लोग जुड़े थे अथवा साधारण स्थिति के थे जो इसलिए जाते थे कि हम देश का गीत गाते हैं देश की याद करते हैं देश की प्रार्थना करते हैं भजन करते हैं कोई गलत काम तो करते नहीं और अराजनैतिक लोग थे उनमें से कुछ लोग टूट भी गए कि अरे हमें तो ये पता नहीं था, हम तो अच्छा काम करते थे भगवान का काम, देश का काम, ये क्या हो गया? चलो भाई, घर में एकदम अकेलापन है, अभाव है तो ऐसे भी है। जो बड़ा संगठन है उसमें सब प्रकार के लोग संख्या में अधिक होते हैं तो वीर और तेजस्वी और प्रतिरोध करने वाले संघर्ष करने वाले भी सबसे ज्यादा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और जनसंघ के ही लोग थे और संख्या बल अधिक होने के कारण जो लोग माफी मांग के छूटे तो उनमें हो सकता है कि इनकी संख्या भी अन्य दलों से कम नहीं हो। अन्य दल के लोगों ने भी खूब माफी मांगी।

तो ये सब वातावरण उस समय देश में था। ये हो गयी चालू स्थिति की समीक्षा। एक संकट सा आया राजनैतिक संकट और चला गया राजनीतिक कारणों से लेकिन कोई बौद्धिक स्तर पर गहरे स्तर पर सांस्कृतिक स्तर पर विशेषकर बौद्धिक और विधिक स्तर पर
कोई तैयारी हुई इसका कहीं कोई प्रमाण नहीं मिलता। आपातकाल लगाकर इंदिरा गांधी ने जो मूल पाप किए थे, संविधान की प्रस्तावना में भी अवैध परिवर्तन का पाप, वह तो अब तक यथावत है। उनकी ओर किसी पार्टी ने कोई कार्यवाही सोची ही नहीं। (क्रमशः)

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ISD News Network June 26, 2025
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