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India Speak Daily > Blog > भाषा और साहित्य > जिसे तुलसी, सूर का ज्ञान नहीं वह प्रकाशक है! सोचिए हमारी हिंदी के प्रति वह कितनी नफरत से भरी है!
भाषा और साहित्य

जिसे तुलसी, सूर का ज्ञान नहीं वह प्रकाशक है! सोचिए हमारी हिंदी के प्रति वह कितनी नफरत से भरी है!

Sonali Misra
By Sonali Misra 12 Min Read
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12 Min Read
India Speaks Daily - ISD News
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किताबें इंसानों के लिए सबसे बड़ा दोस्त बताई जाती हैं, और हैं भी! जो भी उत्तर नहीं मिल रहा हो, वह आपको झट से किसी न किसी किताब में मिल जाएगा। आज किताबें ऑनलाइन हैं, ईप्रिंट हैं, हार्डप्रिंट है। हम सब किताबों के दीवाने हैं, किसी न किसी रूप में और हम सब आज लगभग किन्डल, जगरनॉट आदि पर किताबें पढ़ रहे हैं, और खुद को समृद्ध कर रहे हैं। हम सभी में पढ़ने की एक भूख है, उस भूख को ये किताबें शांत करती हैं। हम लेखक से प्रभावित होते हैं, और आजकल तो ट्विंकल खन्ना जैसी सेलेब्रिटी भी किताबें लिखकर हम सबके बीच आ रही हैं, और इन्हें हम तक पहुँचाने वाले हैं प्रकाशक!

हम सब लेखक के बारे में बहुत जागरूक होते हैं, कि लेखक ने यह लिखा, लेखक ने वह लिखा, मगर एक बहुत ही महत्वपूर्ण व्यक्ति है, जो छूट जाता है, क्योंकि यह उसीकी जानकारी होती है जिसके कारण कोई किताब अपने मूर्त रूप में आ पाती है। कोई किताब प्रकाशित होगी या नहीं, और उसमे क्या बदलाव आएं, वह केवल प्रकाशक ही तय करता है क्योंकि उसके प्रकाशन की छवि उस किताब से होती है। अब जरा सोचिये कि यदि प्रकाशक ही अपने देश की भाषा और साहित्य के बारे में नहीं जानता हो तो? और वह एक अजीब हीनताबोध वाले पूर्वाग्रह से भरा हुआ तो? यदि वह अपने देश के साहित्य से ही परिचित नहीं है तो वह किस आधार पर किताबें चुनेगा? शायद ऊपरी सतह की ऐसी ही किताबें, जिनसे कुछ हलचल हो। और जब आप अपने ही देश की एक समृद्ध परम्परा से अपरिचित हों, तो ऐसे में क्या आप उन किताबों के विषय में वह निष्पक्ष नज़र रख पाएंगे जो एक प्रकाशक में होनी चाहिए।

परसों ट्विटर पर अंग्रेजी के प्रतिष्ठित प्रकाशन जगरनौट की संस्थापक चिकी सरकार ने एक ट्वीट किया कि जब शेक्सपियर लिख रहे थे तो भारत में कौन लिख रहा था? मैं किसी और अर्ली मॉडर्न इंडियन राइटर के बारे में नहीं सोच सकती?।

So when Shakespeare was writing, who was writing in india? I can’t think of an early modern Indian writer?

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शेक्सपियर का युग:

इस ट्वीट के जबाव में उनके पास कई उत्तर आए और शायद अब तक चिकी सरकार को मालूम हो गया होगा कि उस समय भारत में कितने महान कवि अपने रचनाकर्म में लगे हुए थे। जिस समय शेक्सपियर लिख रहे थे अर्थात पन्द्रवीं और सोलहवीं शताब्दी में, तो उन्हीं के समकालीन भारत में थे तुलसीदास, सूरदास, मीराबाई और भी न जाने कितने भक्ति आन्दोलन से जुड़े संत। दरअसल शब्द मॉडर्न ही अपने आप में भ्रामक हैं। शेक्सपियर कभी मॉडर्न की परिभाषा में नहीं आए। विलियम शेक्सपियर एलिजाबेथ काल के लेखक थे, और एलिजाबेथ काल में साहित्य को राजाश्रय भी प्राप्त था।

एलिजाबेथ प्रथम का काल साहित्य में पुनर्जागरण का काल कहा जाता है, और इस समय यूरोप में नई खोजों का भी समय था, नए नए सैन्य अभियान शुरू हो गए थे और यह सब शेक्सपियर के नाटकों में भी दिखता है। मगर शेक्सपियर को मॉडर्न कहने वाले शेक्सपियर को केवल अंग्रेजी भाषा का लेखक होने के कारण ही मॉडर्न कहते हैं या उन्हें मॉडर्न की परिभाषा भी पता है? शेक्सपियर की रचनाओं में चुड़ैल, भूत भी मिलते हैं और इसीके साथ उनके नाटकों में स्त्री का भी कोई बहुत आधुनिक रूप सामने नहीं आता है। जहां मैकबेथ में चुड़ैल हैं तो वहीं उनके प्रसिद्ध नाटक ओथेलो में नायिका की ह्त्या केवल शक के कारण होती है और नायिका का पिता अपनी ही बेटी के चरित्र पर उंगली उठाकर कहता है कि जो अपने पिता की नहीं हुई, वह किसी भाग जाने वाले की क्या होगी? और यदि शेक्सपियर के नाटकों को ध्यान से पढेंगे तो उनमें साम्राज्यवाद और सामंतवाद दोनों ही दिखते हैं, समाज सुधार के लिए उठाया गया कोई कदम किसी भी रचना से सहज प्रतीत नहीं होता है। और कम से कम मॉडर्न की परिभाषा में तो शेक्सपियर नहीं आते हैं। हाँ वे महान रचनाकार थे, एलिजाबेथ युग के एक महान रचनाकार।

भारत में लेखन मॉडर्न ही रहा है:

अब आते हैं भारत पर। भारत में उन दिनों मुगलिया आतंक था। मुग़ल सुल्तानों के द्वारा किए गए अत्याचारों से हिन्दू समाज कराह रहा था। यह युग भारतीयों के भी पुनर्जागरण का काल था क्योंकि उन्हें भक्ति गानों से जगाया जा रहा था। जिस समय शेक्सपियर अपने नाटकों में वहां का सामंतवाद लिख रहे थे, उस समय हमारे यहाँ पर तुलसी और सूर अपने अपने आराध्यों को जनता की भाषा में लिख रहे थे। तुलसीदास किसी भी परिचय के मोहताज़ नहीं हैं, उनके द्वारा लिखा गया राम चरितमानस आज लगभग हर घर में पाया जाता है और उन्होंने एक ऐसा महाकाव्य लिखा है, जिसने उस समय की जनता को अपने आराध्य के प्रति एक प्रेम से भरा। रामचरितमानस ने समाज को चेतना दी। भारत में उस समय चेतना के संघर्ष का युग था। और उस समय एक नहीं बल्कि कई कवि ऐसी रचनाएं लिख रहे थे, जो कालजयी हैं, कौन भूल सकता है मीरा का भजन, “मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरों न कोय,
जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई।”

यह समाज के प्रति एक क्रांति है। मीरा ने अपने रूढ़िवादी समाज के प्रति विद्रोह किया, क्या ऐसा कोई विद्रोह शेक्सपियर की रचना में है? तो हम किसे मॉडर्न कहेंगे? उसे जो अपने समाज की कुरीतियों के साथ साथ विधर्मियों का भी सामना कर रहा है या फिर उसे जो अपने युग की सामंतवादी सोच को ही अपने लेखन में लिख रहा है। शेक्सपियर से कहीं पहले हमारी ही भूमि पर कबीर जैसा महाकवि जन्म ले चुका था, जो एक पूरे सोते हुए समाज में धर्म के प्रति सुधार की भावना विकसित कर चुका था। जैसा हमारे यहाँ कविता के प्रयोजनों के विषय में भी बहुत पहले चर्चा हो चुकी थी कि आखिर जो लिखा जा रहा है, उसका प्रयोजन क्या है। यह प्रयोजन हर काल में भिन्न होते रहे। परन्तु लोक के लिए एक संदेश, यह एक मुख्य प्रयोजन है। यदि लेखन में कोई सन्देश ही नहीं है, तो वह लेखन नहीं। शेक्सपियर की रचनाओं में जहां तत्कालीन समाज का विवरण परिलक्षित होता है तो वहीं भक्तिकाल के समकालीन कवियों में अपने समाज को सुधारने और अपने समाज को हीनता की ग्रंथि से बाहर निकालने की एक भावना। अपने समाज को यह स्वीकार कराने की भावना कि तुम्हारे भीतर भी चेतना है।चेतनाप्रज्ञ बनो और लिखो। मूल्यों की स्थापना करना भी लेखन का प्रयोजन है।

मॉडर्न होने का दंभ भाषाई दंभ है:

दरअसल यह जो मॉडर्न होने का दंभ है, वह केवल अंग्रेजी भाषा को लेकर है। क्योंकि जो उस समय या उससे कहीं पहले भारत में लिखा जा चुका था वह कहीं से भी शेक्सपियर से कम नहीं है, बल्कि शेक्सपियर से कहीं बढ़कर है। जब हमारे मन में शुरू से ही यह बैठाया जाता है कि कालिदास भारत के शेक्सपियर हैं, तो लड़ाई में सबसे पहले हम वहीं हार जाते हैं। कालिदास ने शाकुंतलम की जो रचना की है, क्या इतने भव्य नाटक के सामने दुनिया की कोई कृति ठहर सकती है? मेघदूत में जिस प्रकार मेघों के माध्यम से श्रृंगार रस, वियोग रस का जो वर्णन है, क्या उतना सरस वर्णन पूरे साहित्य में कहीं मिलता है? यदि नहीं, तो यह मूर्खतापूर्ण कथन किसने कहा है कि कालिदास भारत के शेक्सपियर हैं?

नहीं, कालिदास, सूरदास, कबीरदास, तुलसीदास, मीराबाई, रहीम, रसखान, चैतन्य महाप्रभु, और भी न जाने कितने कहे अनकहे साहित्यकारों से समृद्ध है यह धरती। हमें गर्व होना चाहिए कि जब पूरी दुनिया में अंधियारा था, तब हमारे यहाँ पर भरत मुनि नाट्यशास्त्र के रूप में हमें काव्य की परिभाषा और काव्य प्रयोजन, काव्य गुण दोष बता रहे थे।

मॉडर्न क्या है?

मॉडर्न का मतलब केवल अंग्रेजी नहीं होता। मॉडर्न का अर्थ होता है जो स्थापित है, जो बरसों से चला आ रहा है, और जो गलत है, या सत्ता में बैठकर जो गलत कर रहा है, उसके खिलाफ लिखना। जैसे कबीर लिखते हैं। जैसे मीरा लिखती हैं, जैसे तुलसी लिखते हैं। मॉडर्न केवल अंग्रेजी नहीं है। यही दर्द एक बार वरिष्ठ कवि नीलाभ ने व्यक्त किया था। कि अंग्रेजी ने हमें दृष्टि तो दी, मगर दुःख की बात है कि उसने हमें वही दृष्टि दी, जो वह दिखाना चाहती थी और उसने हमारी दृष्टि छीन ली।

और यही दृष्टिहीन लोग अब अंग्रेजी की सामन्तवादी सोच का परिचय देते हैं, जब वे अपनी इस अज्ञानता का परिचय देते हैं कि शेक्सपियर जब लिख रहे थे, तो भारत में कौन लिख रहा था? सच यही है कि भारतीय लेखकों की सोच हमेशा ही मॉडर्न रही है। मॉडर्न पोएट्री की एक खासियत यह है कि यह आम जन की भाषा में होनी चाहिए, जैसा विलियम वर्ड्सवर्थ ने भी लिरिकल बैलेड्स के प्रीफेस में कहा है कि कविता वही है जो आम जन की भाषा में हो, आम जन के मुद्दों की हो और ऐसी हो जिसे आम जन समझ पाए। लिरिकल बैलेड्स के इस प्राक्कथन को मॉडर्न पोएट्री की सबसे अहम परिभाषा के रूप में माना जाता है। यदि इस आधार पर भी आंकें तो तुलसी मॉडर्न पोएट हो सकते हैं क्योंकि उन्होंने जनता की ही भाषा में बात की, कबीर ने जनता की भाषा में बात की, मीरा ने आम जन की भाषा में लिखा और इन सभी ने उसी सरलता से लिखा जिस सरलता की बात विलियम वर्डस्वर्थ करते हैं।
तो मॉडर्न की बात करने वालों को पहले हर तरह की परिभाषा जान लेनी चाहिए, ख़ास तौर पर जब आप किताबों के व्यापार में हैं।

@Chikisarkar आप प्रकाशक हैं, इसलिए आपको पढ़ना और जानना दोनों चाहिए। इस लेख को पढ़िए, शायद हिंदी को लेकर आपके अंदर का कुंठा-बोध कुछ कम हो! आपकी अज्ञानता का बादल कुछ छंटे! @juggernautbookshttps://t.co/EEVx78mrol#IndiaSpeaksDaily @Luckyone202

— Sandeep Deo (@sdeo76) August 8, 2018

URL: What is the difference between Indian literature and foreign literature

keywords: Indian literature, Hindi, hindi literature, tulsidas, surdas, mirabai, shakespeare, modern literature, भारतीय साहित्य, हिंदी, हिंदी साहित्य, तुलसीदास,सूरदास, मीराबाई, शेक्सपियर, आधुनिक साहित्य

Sonali Misra August 8, 2018
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Posted by Sonali Misra
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सोनाली मिश्रा स्वतंत्र अनुवादक एवं कहानीकार हैं। उनका एक कहानी संग्रह डेसडीमोना मरती नहीं काफी चर्चित रहा है। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति कलाम पर लिखी गयी पुस्तक द पीपल्स प्रेसिडेंट का हिंदी अनुवाद किया है। साथ ही साथ वे कविताओं के अनुवाद पर भी काम कर रही हैं। सोनाली मिश्रा विभिन्न वेबसाइट्स एवं समाचार पत्रों के लिए स्त्री विषयक समस्याओं पर भी विभिन्न लेख लिखती हैं। आपने आगरा विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में परास्नातक किया है और इस समय इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय से कविता के अनुवाद पर शोध कर रही हैं। सोनाली की कहानियाँ दैनिक जागरण, जनसत्ता, कथादेश, परिकथा, निकट आदि पत्रपत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं।
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