India Speak Daily Bureau. सबरीमाला मंदिर (केरल) में महिलाओं (10-50 वर्ष की आयु) के प्रवेश पर प्रतिबंध से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट में अभी 9 जजों की संविधान बेंच सुनवाई कर रही है।
वर्तमान स्थिति (8 अप्रैल 2026 तक):-
*9 जजों की बेंच का गठन किया गया है, जिसकी अध्यक्षता चीफ जस्टिस सूर्य कांत कर रहे हैं। अन्य जजों में जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, एम.एम. सुंदरेश, अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, अरविंद कुमार, ए.जी. मसीह, प्रसन्ना बी. वराले, आर. महादेवन और जोयमाल्या बागची शामिल हैं।
*सुनवाई 7 अप्रैल 2026 से शुरू हुई है। पहले दिन (7 अप्रैल) लगभग 5 घंटे की सुनवाई हुई, जिसमें केंद्र सरकार और समर्थक पक्षों के तर्क सुने गए।
समय-सारणी
*7-9 अप्रैल: रिव्यू पेटिशन दाखिल करने वालों (प्रतिबंध समर्थक) के तर्क।
*14-16 अप्रैल: विरोधी पक्ष (महिलाओं के प्रवेश समर्थक) के तर्क।
*21 अप्रैल: रीजॉइंडर (प्रत्युत्तर)।
*22 अप्रैल: अमिकस क्यूरी के अंतिम तर्क।
*कोर्ट का इरादा अप्रैल के अंत तक मामले को निपटाने का है।
मुख्य मुद्दे:-
* 2018 के 5 जजों के फैसले की समीक्षा, जिसमें महिलाओं को सभी आयु वर्ग में प्रवेश की अनुमति दी गई थी।
*अब यह केवल सबरीमाला तक सीमित नहीं है, बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25-26), समानता (अनुच्छेद 14), महिलाओं के अधिकार, essential religious practice (मूलभूत धार्मिक प्रथा) और अदालत की धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप की सीमा जैसे बड़े संवैधानिक सवालों पर चर्चा हो रही है।
*केंद्र सरकार का रुख: प्रतिबंध के पक्ष में है केंद्र। सरकार के अनुसार यह धार्मिक आस्था का मामला है, अदालत को इसमें दखल नहीं देना चाहिए। यह “छुआछूत” जैसा नहीं है। लॉर्ड अयप्पा मंदिर की परंपरा (नैष्टिक ब्रह्मचारी स्वरूप) को बनाए रखना चाहिए। सरकार ने कहा कि 2018 का फैसला गलत था।
*जस्टिस नागरत्ना ने सवाल उठाया: मासिक धर्म के आधार पर 3 दिन “अछूत” जैसा व्यवहार कैसे उचित है? संविधान सबके लिए समान है।
अन्य महत्वपूर्ण बातें:-
*केरल सरकार की तरफ से भी कुछ बदलाव की खबरें हैं (संभवतः रिव्यू पक्ष में जुड़ने की मांग)।
*यह सुनवाई सिर्फ सबरीमाला पर नहीं, बल्कि अन्य धर्मों/मंदिरों में महिलाओं से संबंधित भेदभाव वाले मामलों पर भी असर डालेगी।
*सुनवाई अभी चल रही है और कोई अंतिम फैसला नहीं आया है। 2018 का फैसला अभी लागू माना जाता है, लेकिन रिव्यू के नतीजे पर निर्भर करेगा कि परंपरा बहाल होती है या नहीं।
सबरीमाला मंदिर मामले में 2018 का सुप्रीम कोर्ट फैसला।
सबरीमाला मंदिर मामले में 2018 का सुप्रीम कोर्ट फैसला एक ऐतिहासिक और विवादास्पद निर्णय था। यह 28 सितंबर 2018 को 5 जजों की संविधान बेंच द्वारा सुनाया गया, जिसमें 4:1 के बहुमत से फैसला आया।
मुख्य फैसला:-
*सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की आयु वाली महिलाओं के प्रवेश पर लगी पारंपरिक रोक को असंवैधानिक घोषित किया गया।
*कोर्ट ने कहा कि यह रोक महिलाओं के मूलभूत अधिकारों का उल्लंघन करती है और मंदिर की परंपरा को बनाए रखने का कोई वैध आधार नहीं है।
*केरल हिंदू प्लेसेस ऑफ पब्लिक वर्शिप (ऑथराइजेशन ऑफ एंट्री) रूल्स, 1965 के रूल 3(b) को रद्द कर दिया गया, जो महिलाओं को कस्टम के आधार पर पूजा स्थलों से बाहर रखने की अनुमति देता था।
किस मामले में फैसला आया?
मामला Indian Young Lawyers Association vs. State of Kerala था। याचिकाकर्ताओं ने अनुच्छेद 14, 15, 25 और 26 के तहत महिलाओं के समानता और धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकारों की रक्षा की मांग की थी।
बहुमत का रुख (4 जजों का मत)
*तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा (खानविलकर जे. के साथ) — महिलाओं को जैविक कारण (मासिक धर्म) के आधार पर अलग करना लिंग भेदभाव है। धर्म की आड़ में पितृसत्ता को बढ़ावा नहीं दिया जा सकता। समर्पण (devotion) लिंग भेदभाव का विषय नहीं हो सकता।
*जस्टिस आर.एफ. नरीमन और जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़। अलग-अलग सहमतिपूर्ण राय दी।
*चंद्रचूड़ जे. ने इसे अनुच्छेद 17 (अछूतता का निषेध) से जोड़ा और कहा कि मासिक धर्म को अशुद्ध मानकर महिलाओं को बाहर रखना महिलाओं की गरिमा का अपमान है।
* जस्टिस नागरत्ना ने सवाल उठाया कि जिन लोगों का मंदिर से कोई सरोकार नहीं है, जो भक्त नहीं हैं, उन्होंने PIL क्यों दाखिल की? क्या कोई अजनबी किसी संप्रदाय की निजी परंपराओं में हस्तक्षेप कर सकता है?
कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला:-
* सबरीमाला के अयप्पा भक्त अलग धार्मिक संप्रदाय (religious denomination) नहीं हैं, इसलिए अनुच्छेद 26 के तहत विशेष अधिकार नहीं मिल सकते।
*महिलाओं को बाहर रखना essential religious practice (ERP) नहीं है।
*यह प्रथा अनुच्छेद 14 (समानता), 15(1) (लिंग के आधार पर भेदभाव) और 25(1) (धार्मिक स्वतंत्रता) का उल्लंघन करती है।
अल्पमत (असहमति) — जस्टिस इंदु मल्होत्रा।
*एकमात्र महिला जज ने असहमति जताई।
*उनका मत: अदालत को धार्मिक प्रथाओं में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए जब तक वे दमनकारी, अत्याचारपूर्ण या सामाजिक बुराई न हों (जैसे सती प्रथा)।
*सबरीमाला की परंपरा आस्था का मामला है। अदालत को यह तय नहीं करना चाहिए कि कौन सी धार्मिक प्रथा सही है।
*धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25-26) को संतुलित रखना चाहिए।
फैसले के प्रमुख प्रभाव
*फैसले के बाद महिलाओं को सभी आयु वर्ग में सबरीमाला मंदिर में प्रवेश की अनुमति मिल गई (हालांकि व्यावहारिक रूप से काफी विरोध और प्रदर्शन हुए)।
*यह फैसला केवल सबरीमाला तक सीमित नहीं था, बल्कि अन्य धार्मिक स्थलों में महिलाओं से संबंधित प्रथाओं पर भी प्रभाव डाल सकता था।
*फैसले के खिलाफ कई रिव्यू पेटिशन दाखिल हुईं, जिसके कारण 2019 में इसे बड़े बेंच को रेफर किया गया। वर्तमान में (2026) 9 जजों की बेंच इसकी समीक्षा कर रही है।
सबरीमाला: 9 जजों की बेंच के वो 7 ‘अस्तित्ववादी’ सवाल?
१. धार्मिक स्वतंत्रता बनाम व्यक्तिगत समानता (Art 25 vs Art 14)
पहला और सबसे बड़ा सवाल यह है कि अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) के बीच संतुलन क्या है? क्या किसी समुदाय की सामूहिक धार्मिक परंपरा को ‘व्यक्तिगत समानता’ के नाम पर कुचला जा सकता है?
२. ‘सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य’ की परिभाषा
संविधान कहता है कि धार्मिक स्वतंत्रता ‘सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य’ के अधीन है। कोर्ट अब यह तय कर रहा है कि क्या इस ‘नैतिकता’ (Morality) का मतलब ‘संवैधानिक नैतिकता’ है या ‘धार्मिक नैतिकता’? यदि कोर्ट इसे केवल ‘संवैधानिक’ मानता है, तो हर वह परंपरा खतरे में है जो आधुनिक सेकुलर मूल्यों से मेल नहीं खाती।
३. ‘धार्मिक संप्रदाय’ के अधिकार (Article 26)
क्या भगवान अयप्पा के भक्त एक अलग ‘धार्मिक संप्रदाय’ (Religious Denomination) हैं? यदि हाँ, तो अनुच्छेद 26 के तहत उन्हें अपनी परंपराओं को खुद प्रबंधित करने का पूर्ण अधिकार है। क्या कोर्ट उनके इस अधिकार को छीन सकता है?
४. ‘अजनबियों’ का हस्तक्षेप (Locus Standi)
यह वही बिंदु है जिस पर आज जस्टिस नागरत्ना ने तीखा सवाल पूछा। क्या वे लोग, जो उस धर्म या संप्रदाय का हिस्सा नहीं हैं, केवल ‘जनहित याचिका’ (PIL) के माध्यम से किसी मंदिर की सदियों पुरानी प्रथा को चुनौती दे सकते हैं? क्या न्यायपालिका को ‘अजनबियों’ की शिकायतों पर धर्म का स्वरूप बदलना चाहिए?
५. ‘हिंदू’ शब्द की व्यापकता और अनुच्छेद 25(2)(b)
संविधान का अनुच्छेद 25(2)(b) कहता है कि हिंदू संस्थानों को ‘सभी वर्गों’ के लिए खोला जा सकता है। सवाल यह है कि क्या ‘सभी वर्गों’ (All classes) का मतलब ‘लिंग’ (Gender) भी है? क्या मंदिर में प्रवेश का अधिकार ‘लिंग भेद’ से ऊपर है, भले ही मंदिर की प्रकृति (नैष्ठिक ब्रह्मचर्य) कुछ और हो?
६. ‘अनिवार्य धार्मिक प्रथा’ (Essential Religious Practice)
क्या न्यायपालिका के पास यह विशेषज्ञता या अधिकार है कि वह शास्त्रों को पढ़कर यह तय करे कि कौन सी प्रथा ‘अनिवार्य’ है और कौन सी नहीं? आज बहस यही है कि क्या जज ‘धर्मशास्त्री’ की भूमिका निभा सकते हैं?
७. अन्य धर्मों के साथ समानता
क्या सबरीमाला का फैसला अन्य धर्मों (जैसे मस्जिदों में महिलाओं का प्रवेश या पारसी महिलाओं के अधिकार) के लिए मिसाल बनेगा? क्या कोर्ट हिंदू मंदिरों के लिए एक पैमाना और अन्य धर्मों के लिए दूसरा पैमाना रख सकता है?
निष्कर्ष:-
2018 का यह फैसला संवैधानिक नैतिकता (constitutional morality) बनाम धार्मिक आस्था के बीच संतुलन का बड़ा उदाहरण माना जाता है। बहुमत ने कहा कि धार्मिक प्रथाएं संविधान के मूल सिद्धांतों (समानता, गरिमा) के अधीन होनी चाहिए।
