धरा बेच देंगे-गगन बेच देंगे
जब सत्यनिष्ठ थी न्याय-पालिका, लूटमार की छूट नहीं थी ;
नेता-अफसर कोर्ट से डरते , वोट-डकैती कहीं नहीं थी ।
सुप्रीम-कोर्ट जब से फिसला है , देश में हाहाकार मचा है ;
अपराधी छा गये देश पर , लूट का बंदर-बांट मचा है ।
राजनीति व न्यायपालिका , बन गये हैं पूरे शर्म-निरपेक्ष ;
शर्म-निरपेक्ष बन गया भारत , जो पहले था धर्म-निरपेक्ष ।
खुली-आंख में धूल झोंकते , कोई शर्म नहीं बाकी ;
वोट-डकैती खुले-आम है , मिली-भगत इसमें इन सबकी ।
नब्बे-प्रतिशत गद्दार हो चुके , देश को खुलकर लूट रहे हैं ;
सुप्रीम-कोर्ट से छूट है इनको , सत्तायें जबरन लूट रहे हैं ।
संविधान से बलात्कार कर , भारत-माता को नोंच रहे ;
कायर-कमजोर-नपुंसक जितने , अब भी कुछ न बोल रहे ।
माना लड़ने की नहीं है हिम्मत, तो गांधी को ही याद करो ;
असहयोग आंदोलन कितने ? डरकर मत फरियाद करो ।
धरना , प्रदर्शन , घेराव करो सब , सामूहिक-उपवास करो ;
करो या मरो को मंत्र मानकर,सविनय-अवज्ञा हर जगह करो ।
काली-पट्टी बांधकर निकलो,सबको सड़कों पर आना होगा ;
शांति-पूर्ण बस ये ही मार्ग हैं,सबको इन पर ही चलना होगा ।
कोई भी अब चुप न बैठे , वरना सब मिट जायेंगे ;
कविवर “पूर्ण” की यही पंक्तियां, अब सब मिलकर गायेंगे ।
धरा बेच देंगे-गगन बेच देंगे, अमन बेच देंगे-चमन बेच देंगे ;
कलमके पुजारी अगर सोगये तो,वतनके पुजारी वतन बेच देंगे
यही कर रहे हैं भारत में , नेता – अफसर – न्यायाधीश ;
मिलकर भारत लूट रहे हैं , काट रहे भारत का शीश ।
इस कदर स्वार्थ में अंधे हैं सब,सही-सही कुछ नहीं दीखता ;
अपने ही घर में आग लगाते , जिसमें अंधा खुद ही रहता ।
मत आग लगाओ तुम भारत में, तुम खुद भी जल जाओगे ;
जिस डाली पर तुम बैठे हो,क्या उसे काट कर मिट जाओगे ?
महामूर्खता का ये अंधापन , आखिर कैसे आता है ?
पूरी तरह जो चरित्रहीन हो , दशकों में ऐसा बन पाता है ।
चरित्र का संकट इस कदर बढ़ा है, देश भरा गद्दारों से ;
अब भारत का बचना मुश्किल है, इन सारे मक्कारों से ।
साफ-साफ अब दीख रहा है, दूजा-महाभारत होने वाला है ;
चरित्रहीन जो नेता-अफसर, अब सब इसमें मिटने वाला है ।
“भविष्य-मालिका” यही बताती , सौ-करोड़ तक मिट जायेंगे ;
चरित्रहीन नेता व अफसर , भीषण-गृहयुद्ध करा जायेंगे ।
“जय सनातन-धर्म”,ब्रजेश सिंह सेंगर “विधिज्ञ”
