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India Speak Daily > इतिहास > गुलाम भारत > द्वितीय विश्‍व युद्ध में गांधी ब्रिटेन को दोस्‍त कह रहे थे और सुभाष अंग्रेजों को मिटाने पर आमदा थे!
गुलाम भारत

द्वितीय विश्‍व युद्ध में गांधी ब्रिटेन को दोस्‍त कह रहे थे और सुभाष अंग्रेजों को मिटाने पर आमदा थे!

ISD News Network
By ISD News Network 6 Min Read
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पुरानी कहावत है, दूसरे के फटे में टांग अड़ाना। जब द्वितीय विश्‍व युद्ध शुरु हुआ तो गांधी जी के नेतृत्‍व में कांग्रेस ब्रिटिश शासन को बार-बार मदद देने का प्रस्‍ताव दे रही थी, जबकि ब्रिटिश को केवल भारतीय सैनिकों की जरूरत थी, जो पहले से ही ब्रिटिश सेना में बहाल थे। ब्रिटिश कांग्रेस को कोई भाव नहीं दे रहे थे और गांधी जी बार-बार कह रहे थे कि यदि जर्मनी और इटली की विजय हो गई तो यह दुनिया के लिए सबसे बड़ा अपशकुन होगा।

दूसरी तरफ नेताजी सुभाषचंद्र बोस थे, जिनका मानना था कि ‘दुश्‍मन का दुश्‍मन दोस्‍त होता है।’ भारत में यह नीति चाणक्‍य ने दी थी और नेताजी चाणक्‍य की नीति का अनुसरण करते हुए ही धुरी राष्‍ट्रों की मदद से भारत में ब्रिटिश को परास्‍त करना चाहते थे। नेताजी चाणक्‍य को बहुत अधिक मानते थे और देश की स्‍वतंत्रता के लिए वह उसकी नीतियों को ही उचित समझते थे। अब या तो बिखरे हुए भारत को एक कर महान मौर्य साम्राज्‍य की स्‍थापना करने वाले चाणक्‍य गलत थे या फिर पूरे भारत को अपनी आंखों के सामने भारत-पाकिस्‍तान में टुकड़े-टुकडे होते देखने और कहीं न कहीं उसमें भागीदार रहने वाले गांधी सफल थे, ये आपको तय करना है।

खैर, रामबहादुर राय जी ने अपनी पुस्‍तक शाश्‍वत विद्रोही राजनेता आचार्य जे.बी.कृपलानी (पेज- 249) में लिखा है, “द्वितीय विश्‍व युद्ध में ब्रिटेन को सहयोग देने के लिए कांग्रेस बार-बार प्रस्‍ताव दे रही थी और अंग्रेजी सत्‍ता बार-बार उनके प्रस्‍ताव को ठुकरा रही थी। कांग्रेस के सभी निवेदन ठुकरा दिए गए। कांग्रेस अपनी मांगें घटाती गई, पर ब्रिटेन ने कभी उसका विश्‍वास नहीं किया। उसे विश्‍वास था कि वह संगीनों की नोक पर भारत से चाहे जो भी चीज मदद में ले सकता है।”

रामबहादुर राय जी ने अपनी इसी पुस्‍तक के पेज-250 में लिखा है। 7 अगस्‍त, 1942 को कांग्रेस कमेटी के सम्‍मुख भाषण करते हुए गांधी ने कहा था, “कभी भी यह विश्‍वास मत कीजिए कि ब्रिटेन युद्ध में हार जाएगा। मैं जानता हूं ब्रिटेन डरपोकों का राष्‍ट्र नहीं है। हार मानने के बदले वे रक्‍त की अंतिम बूंद तक लड़ेंगे। पर थोड़ी देर के लिए कल्‍पना कीजिए कि युद्ध-नीति की वजह से कहीं मलाया,‍ सिंगापुर और बर्मा की भांति उन्‍हें भारत छोड़ना पड़ा तो हमारी क्‍या दशा होगी। जापानी भारत पर चढ़ दौड़ेंगे और उस समय हम तैयार भी न होंगे। भारत पर जापानियों के अधिकार हो जाने का मतलब है, चीन और शायद रूस का भी अंत। हम चीन और रूस की हार का मुहरा नहीं होना चाहते। इसी पीड़ा के फलस्‍वरूप ‘भारत छोड़ो’ प्रस्‍ताव उपस्थित किया गया है। आज ब्रिटेन को बुरा लग सकता है और वे लोग मुझे अपना दुश्‍मन समझ सकते हैं, पर कभी वे भी कहेंगे कि मैं उनका दोस्‍त था।”

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अब देखिए, एक तरफ सुभाषचंद्र बोस जापान की मदद से भारत से ब्रिटेन को खदेड़ कर भारत को आजाद कराना चाहते थे और दूसरी तरफ गांधी जी ब्रिटेन को भारत में बनाए रख कर उसकी बहादुरी की चर्चा कर रहे थे, उसकी गुलामी में खुद को महफूज मान रहे थे। वह ब्रिटेन बहादुर राष्‍ट्र और खुद को उसका दोस्‍त बता रहे थे। उनके इस भाषण से यह भी साबित होता है कि उनका 9 अगस्‍त 1942 का ‘भारत छोड़ों आंदोलन’ का नारा केवल सुभाषचंद्र बोस की सफलता को रोकने के लिए किया गया प्रयास था। वर्तमान राष्‍ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोबाल ने भी एक विडियो में कहा था कि ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ बुरी तरह से फ़लॉप रहा था। यह पोस्‍ट कुछ समय पूर्व ही मैंने किया था, जिस पर कुछ लोगों ने आपत्ति की थी। प्‍लीज वह गांधी के 1942 में दिए इस भाषण को ठीक से पढ लें कि गांधी किस तरह ब्रिटेन की सत्‍ता को भारत में बनाए रखना चाहते थे।

सुभाष और गांधी दो ध्रुव पर खड़े थे। गांधी भारत में ब्रिटेन की सत्‍ता बनाए रखना चाहते थे, जैसा कि उनके 7 अगस्‍त 1942 के भाषण से स्‍पष्‍ट है, वहीं सुभाषचंद्र बोस धुरी राष्‍ट्र अर्थात जर्मनी, इटली और जापान की मदद से भारत से ब्रिटिश को खदेड़ने के प्रयास में जुटे थे। जापान ज्‍यों ज्‍यों भारत के नजदीक आ रहा था, गांधी को यह डर सता रहा था कि ब्रिटेन हार जाएगा और जापानी भारत पर कब्‍जा कर लेंगे जबकि नेताजी जापान की मदद से भारत की आजादी के लिए लड़ रहे थे। जापान के साथ आजाद हिंद फौज की सेना भी लड़ रही थी।

मेरी #PMOIndia, #मोदीसरकार से मांग है कि प्‍लीज आपने एक जननायक का स्‍थान हासिल किया है, प्‍लीज एक जननायक की तरह सच्‍चाई को सामने लाइए। हम चाणक्‍य की संतान हैं। यदि मार्य सम्राज्‍य के निर्माता चाणक्‍य को हमने सही माना था तो फिर भारत-पाकिस्‍तान में भारत के टुकडे करने वाले गांधी-नेहरू को हम कैसे सही मान सकते हैं। हम चाणक्‍य नीति पर चलने वाले सुभाषचंद्र बोस को गलत कैसे मान सकते हैं। पाकिस्‍तान निर्माण के लिए केवल जिन्‍ना को दोष देना, शुतुर्मुग की तरह व्‍यवहार करने जैसा है। हमें चाणक्‍य और सुभाषचंद्र बोस जैसा वास्‍तविक राष्‍ट्रनायक चाहिए, हमें नोट पर छपने के लिए राष्‍ट्रनायक नहीं चाहिए, हमें ऐसा राष्‍ट्रनायक चाहिए जो हमें प्रेरित कर सकें…. !

ISD News Network March 19, 2018
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TAGGED: Mahatma Gandhi, modern indian history, Subhas Chandra Bose

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