इंडिया स्पीक डेली संपादकीय। भारत का जनमानस जब भी किसी तकनीकी नवाचार को अपनी दैनिक जीवनशैली का हिस्सा बनाकर थोड़ा संभलता है, नीति-नियंताओं का चाबुक उसी पर सबसे पहले चलता है। यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) थोपने का वित्त मंत्रालय और एनपीसीआई का ताज़ा फैसला महज एक आंतरिक वित्तीय पुनर्गठन नहीं है; इसके पीछे अमेरिकी कॉरपोरेट लॉबी के सामने झुकने और वैश्विक बहुराष्ट्रीय वित्तीय एकाधिकार को साधने की स्पष्ट बू आ रही है।
जिस यूपीआई ने भारत के घरेलू बाजार में अमेरिकी पेमेंट जाइंट्स की कमर तोड़ दी थी, क्या उसी यूपीआई पर शुल्क की बेड़ियां लगाकर सरकार ने वाशिंगटन के दबाव के आगे घुटने टेक दिए हैं? सवाल यह उठना लाजिमी है कि जब यूपीआई दुनिया भर में भारत का परचम लहरा रहा था, तब अचानक अपनी ही एक सफल संतान का गला घोंटने की यह तैयारी किसके इशारे पर की जा रही है?
शुल्क का नया तंत्र: तकनीकी शब्दों की आड़ में चौतरफा वसूली का खाका
सरकार और एनपीसीआई ने स्पष्टीकरणों की लंबी फेहरिस्त जारी कर यह भ्रम फैलाने की भरपूर कोशिश की है कि आम ग्राहक सुरक्षित है। लेकिन 15 अक्टूबर 2026 से लागू होने जा रहे नियमों की बारीक पड़ताल इस छल को बेनकाब कर देती है:

*व्यक्तिगत लेन-देन (P2P): इसे कागज़ों पर निःशुल्क रखा गया है और क्यूआर स्कैनिंग पर सीधे उपभोक्ता से कोई फीस न लेने का दावा किया गया है।
*व्यावसायिक लेन-देन (P2M): ₹2,000 से अधिक के किसी भी व्यावसायिक भुगतान पर 0.4% का बेस MDR लागू किया गया है।
*शुल्क की अधिकतम सीमा: ₹75,000 या उससे अधिक के भुगतान पर व्यापारियों से अधिकतम ₹300 प्रति ट्रांजैक्शन वसूला जाएगा।
*पूंजी बाजार और खुदरा निवेशकों पर चोट: म्यूचुअल फंड, शेयर ट्रेडिंग और सिक्योरिटीज में यूपीआई से निवेश करने वालों पर भी 0.02% का MDR (अधिकतम ₹300) थोप दिया गया है। यानी आम आदमी की बचत भी इस वसूली से नहीं बची।
*विशेष रियायतें: रेलवे टिकट, पेट्रोल पंप, बीमा और टेलीकॉम जैसी आवश्यक सेवाओं पर सिर्फ 5 रुपये का फ्लैट MDR तय किया गया है। इसका सीधा मतलब यह है कि अगर आप 2,000 रुपये से अधिक का कोई भी पेमेंट (चाहे 2500 रुपये का पेट्रोल भरवाएं या 50,000 रुपये की बीमा प्रीमियम भरें) UPI से करते हैं, तो मर्चेंट पर केवल 5 रुपये का फिक्स्ड चार्ज लगेगा
*छोटे व्यापारियों के लिए ‘3 महीने का ट्रैप’: यह दावा किया गया कि ₹1 लाख तक के मासिक कारोबार वाले छोटे दुकानदारों (P2PM) को छूट है। लेकिन छिपा हुआ पेंच यह है कि यदि किसी छोटे दुकानदार के क्यूआर पर लगातार 3 महीने ₹1 लाख से अधिक की राशि आई, तो बैंक उसे स्वतः पूर्ण कमर्शियल श्रेणी (P2M) में धकेल कर उससे शुल्क वसूलना शुरू कर देंगे। यह असंगठित क्षेत्र को खींचकर जबरन टैक्स और शुल्क के जाल में फंसाने की सोची-समझी रणनीति है।

यहां यह याद रखना आवश्यक है कि व्यापारी पर पड़ने वाला 0.4% का बोझ कभी व्यापारी अपनी जेब से वहन नहीं करता। बाजार का नियम है कि परिचालन लागत का हर नया पैसा अंततः वस्तु या सेवा के दाम बढ़ाकर ग्राहक की जेब से ही वसूला जाता है।
नोटबंदी का झांसा और वसूली का जाल
8 नवंबर 2016 की रात 8 बजे को याद कीजिए, जब अचानक लिए गए नोटबंदी के ‘तुगलकी फैसले’ के बाद बैंकों और एटीएम की कतारों में खड़ी जनता को सांत्वना देने के लिए ‘कैशलेस इंडिया’ का राग छेड़ा गया था। प्रधानमंत्री और सरकार के प्रवक्ताओं ने बड़े-बड़े मंचों से गरजते हुए कहा था कि तकनीक देश के हर गरीब और मध्यमवर्गीय नागरिक को बिचौलियों, बैंक कमीशनों, दलालों और काला धन के चंगुल से हमेशा के लिए मुक्त कर देगी। जनता से वादा किया गया था कि यूपीआई एक निःशुल्क जन-सुविधा (डिजिटल पब्लिक गुड) है।
नकदी की भयानक तंगी के बीच छोटे व्यापारियों, रेहड़ी-पटरी वालों और करोड़ों आम परिवारों को इस ‘मुफ़्त’ के जाल में फंसाकर डिजिटल नेटवर्क का आदी बनाया गया। जब देश की 90 फीसदी से ज्यादा आबादी इस व्यवस्था के शिकंजे में पूरी तरह आ गई, तब सरकार ने अपना असली कॉरपोरेट चेहरा दिखाना शुरू कर दिया। पहले आदत डालना और फिर हर क्लिक पर वसूली का तंत्र तैयार करना—यह जनहितैषी सरकार का आचरण नहीं, बल्कि एक निर्दयी मोनोपॉली सिंडिकेट की कार्यप्रणाली है।

घाटे का झूठ और ₹2.87 लाख करोड़ के सरप्लस का फरेब
इस नए शुल्क को सही ठहराने के लिए सरकार यह कुतर्क गढ़ रही है कि सर्वर इंफ्रास्ट्रक्चर, साइबर सुरक्षा और बैंक प्रणालियों को संभालने में सालाना लगभग ₹20,000 करोड़ का खर्च आता है और इसे अनिश्चित काल तक बजट सब्सिडी के सहारे नहीं चलाया जा सकता।
यह तर्क पूरी तरह से खोखला और जनता की आंखों में धूल झोंकने जैसा है। यह वही सरकार है जो हर साल भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के संचित कोष और सरप्लस मुनाफे से लाखों करोड़ रुपये का भारी लाभांश अपने राजकोष में खींच लेती है। तथ्य यह है कि सरकार को इस वित्तीय वर्ष में रिज़र्व बैंक (RBI) से ₹2.87 लाख करोड़ (और इससे पिछले वर्ष ₹2.11 लाख करोड़) का ऐतिहासिक रिकॉर्ड लाभांश (सरप्लस ट्रांसफर) मिला है। दस्तावेज़ में एनपीसीआई खुद कहता है कि यूपीआई चलाने का सालाना कुल खर्च मात्र ₹20,000 करोड़ है। यानी केवल इस एक वर्ष के आरबीआई लाभांश का 10वां हिस्सा भी नहीं (मात्र 7%), जिससे पूरे देश का यूपीआई नेटवर्क पूरी तरह मुफ़्त और सुरक्षित चलाया जा सकता था।

यदि सरकार की नीयत वास्तव में जनहित की होती, तो आरबीआई के इसी सरप्लस से एक छोटा-सा हिस्सा आवंटित करके पूरे यूपीआई इंफ्रास्ट्रक्चर को जीवनभर के लिए पूर्णतः निःशुल्क और सुरक्षित बनाए रखा जा सकता था। सच्चाई यह है कि सरकार घाटे का रोना रोकर, एक बार फिर जनता और मझोले व्यापारियों की जेब पर डकैती डालने का रास्ता चुना है ताकि अप्रत्यक्ष रूप से हर वित्तीय गतिविधि से शुल्क निचोड़ा जा सके।
अमेरिकी लॉबी के आगे नतमस्तक नीति और वीज़ा-मास्टरकार्ड का खेल: डिजिटल संप्रभुता का समर्पण
वैश्विक वित्तीय तंत्र में वीज़ा और मास्टरकार्ड केवल दो भुगतान कंपनियां नहीं हैं; वे वाशिंगटन की वित्तीय कूटनीति के वे ‘अदृश्य टोल प्लाज़ा’ हैं, जिन्होंने दशकों तक अंतरराष्ट्रीय व्यापार और खुदरा लेन-देन पर एकछत्र राज किया है। जब भी कोई नागरिक दुनिया के किसी कोने में कार्ड स्वाइप करता है, इन दो अमेरिकी दिग्गजों के खजाने में 1.5% से लेकर 3% तक का ‘मर्चेंट डिस्काउंट रेट’ (MDR) सीधे पहुंचता है। यह बिना किसी उत्पादन या वास्तविक जोखिम के खरबों डॉलर का शुद्ध मुनाफा निचोड़ने वाला एक निजी वैश्विक सिंडिकेट है। भारत में यूटीआई के कारण इस सिंडिकेट को जो चोट लगी, उसकी कल्पना वॉल स्ट्रीट के इन धुरंधरों ने कभी नहीं की थी।
घरेलू क्रांति जिसने वॉल स्ट्रीट के होश उड़ा दिए
भारत में जब यूपीआई और स्वदेशी रूपे (RuPay) नेटवर्क ने आकार लिया, तो उसने पारंपरिक बैंकिंग और कार्ड पेमेंट के पूरे आर्थिक गणित को ही पलट दिया। वीज़ा और मास्टरकार्ड का पूरा मॉडल महंगे पीओएस (POS) टर्मिनलों, प्लास्टिक कार्ड्स और भारी-भरकम ट्रांजैक्शन फीस पर टिका था। यूपीआई ने एक झटके में इसे कागज के एक मुफ़्त क्यूआर कोड में बदल दिया। रेहड़ी-पटरी से लेकर बड़े मॉल तक, लेन-देन सेकंडों में शून्य शुल्क (Zero-MDR) पर होने लगा।
आंकड़े गवाह हैं कि चंद वर्षों के भीतर भारत के रिटेल डिजिटल ट्रांजैक्शन में वीज़ा और मास्टरकार्ड की हिस्सेदारी ताश के पत्तों की तरह ढह गई। करोड़ों डॉलर का वह सालाना कमीशन, जो हर साल भारतीय व्यापारियों की जेब से निकलकर न्यूयॉर्क और कैलिफोर्निया के मुख्यालयों में जाता था, वह अचानक बंद हो गया।
अमेरिकी सरकार का दबाव: वीज़ा-मास्टरकार्ड के लिए हस्तक्षेप
इस घाटे की छटपटाहट जल्द ही अमेरिकी सत्ता के गलियारों में सुनाई देने लगी। मास्टरकार्ड और वीज़ा के शीर्ष नेतृत्व ने इसे केवल व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा नहीं माना, बल्कि भारत सरकार पर “संरक्षणवाद” (Protectionism) का आरोप मढ़ दिया।
अमेरिकी व्यापार वार्ताओं में बार-बार यह संदेश दिया गया कि यदि भारत को वैश्विक व्यापार मंचों पर रियायतें चाहिए, तो उसे अपने डिजिटल पेमेंट स्पेस को “मुक्त बाजार” के नियमों के तहत लाना होगा—अर्थात मुफ़्त की व्यवस्था बंद करके शुल्क प्रणाली लागू करनी होगी।
अमेरिकी सरकार ने औपचारिक और अनौपचारिक दोनों स्तरों पर भारत सरकार के समक्ष यह मुद्दा उठाया था। यह कोई अनुमान नहीं बल्कि सार्वजनिक रिकॉर्ड और अंतरराष्ट्रीय व्यापार वार्ताओं का स्थापित दस्तावेज़ी सच है:-
*मास्टरकार्ड की व्हाइट हाउस और USTR से शिकायत (2018): रॉयटर्स (Reuters) की एक विस्तृत खोजी रिपोर्ट में यह आधिकारिक दस्तावेज़ सामने आया था कि 21 जून 2018 को मास्टरकार्ड के ग्लोबल वाइस प्रेसिडेंट (पब्लिक पॉलिसी) जिम कार्टर ने अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) रॉबर्ट लाइटहाइज़र के कार्यालय के साथ एक उच्चस्तरीय बैठक की थी।
*मास्टरकार्ड का सीधा आरोप था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी घरेलू भुगतान नेटवर्क (RuPay और UPI) को बढ़ावा देने के लिए ‘राष्ट्रवादी भावना’ (Nationalism) का इस्तेमाल कर रहे हैं।
*मास्टरकार्ड ने अमेरिकी सरकार से कहा था कि पीएम मोदी के भाषणों और सरकारी नीतियों से विदेशी पेमेंट कंपनियों को भारतीय बाजार में नुकसान हो रहा है, इसलिए अमेरिकी सरकार भारत पर दबाव बनाए।
*USTR की वार्षिक ‘राष्ट्रीय व्यापार अनुमान’ (NTE) रिपोर्ट: अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) अपनी विदेशी व्यापार बाधाओं (Foreign Trade Barriers) से संबंधित वार्षिक रिपोर्ट में लगातार भारत के डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम को दर्ज करता रहा है:
*अमेरिका ने लिखित रूप में यह आपत्ति दर्ज कराई कि भारत सरकार द्वारा RuPay और UPI को शून्य मर्चेंट डिस्काउंट रेट (Zero-MDR) देना और सरकारी बजट से सब्सिडी प्रदान करना एक निष्पक्ष बाजार (Level Playing Field) के सिद्धांतों के खिलाफ है।
*अमेरिका की दलील थी कि इससे वीज़ा (Visa) और मास्टरकार्ड (Mastercard) जैसी अमेरिकी कंपनियों के लिए भारतीय बाजार में समान अवसर समाप्त हो रहे हैं क्योंकि निजी बहुराष्ट्रीय कंपनियां शून्य-शुल्क पर अपनी सेवाएं नहीं चला सकतीं।
*द्विपक्षीय व्यापार वार्ताओं में अमेरिकी अधिकारियों का दखल: भारत-अमेरिका व्यापार नीति फोरम (Trade Policy Forum – TPF) और वाणिज्यिक संवाद बैठकों के दौरान अमेरिकी प्रतिनिधियों ने लगातार दो प्रमुख बिंदु उठाए:
*डेटा स्थानीयकरण (Data Localization): रिज़र्व बैंक (RBI) का वह नियम, जिसके तहत सभी वित्तीय और भुगतान डेटा को केवल भारत में ही स्टोर करना अनिवार्य किया गया था।
*मार्केट एक्सेस और शुल्क बाधाएं: सरकारी पहलों (UPI/RuPay) को एकाधिकार जैसा संरक्षण देना और अमेरिकी कार्ड कंपनियों पर कड़ी नियामक शर्तें लगाना।
अमेरिकी प्रशासन ने भारत सरकार के समक्ष स्पष्ट रूप से यह रुख रखा था कि भारत को अपने डिजिटल भुगतान क्षेत्र को सब्सिडी-मुक्त और पूरी तरह से वाणिज्यिक बाजार आधारित बनाना चाहिए ताकि अमेरिकी वित्तीय दिग्गजों को भी प्रतिस्पर्धा का रास्ता मिल सके।
आत्मनिर्भरता से व्यावसायिक समझौते की ओर वापसी
अब जब एनपीसीआई और वित्त मंत्रालय ने ₹2,000 से ऊपर के मर्चेंट भुगतानों पर 0.4% का MDR ठोक दिया है, तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि इस नीतिगत यू-टर्न की असली प्रेरणा कहाँ से आई?
आरबीआई के पास लाखों करोड़ का अधिशेष (Surplus) होने के बावजूद ‘सालाना ₹20,000 करोड़ के परिचालन घाटे’ का रोना रोना केवल एक तकनीकी बहाना है। असल खेल अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों और अमेरिकी ट्रेड लॉबी को यह संदेश देना है कि भारत अपने यूपीआई को अब एक ‘मुफ़्त जन- कल्याणकारी सुविधा’ (Public Good) नहीं रहने देगा, बल्कि उसे उसी पारंपरिक वैश्विक व्यावसायिक सांचे में ढालेगा जहाँ अमेरिकी कार्ड कंपनियों के लिए दोबारा प्रतिस्पर्धा के रास्ते खुल सकें।
जब घरेलू यूपीआई पर भी शुल्क लगने लगेगा, तो धीरे-धीरे वीज़ा-मास्टरकार्ड और निजी पेमेंट गेटवे के मुकाबले उसका जो सबसे बड़ा आर्थिक लाभ—शून्य लागत—था, वह समाप्त हो जाएगा। अपनी ही तकनीकी संप्रभुता को विदेशी ताकतों के तुष्टीकरण के लिए गिरवी रख देना नीतिगत समझदारी नहीं, बल्कि जनहित और राष्ट्रीय आत्मनिर्भरता के साथ खुला समझौता है।
आज जब सरकार 0.4% का चार्ज लगाकर यूपीआई को भी कमाई का जरिया बना रही है, तो साफ दिखता है कि अपने ही देश की व्यवस्था को कमजोर करके विदेशी कंपनियों के लिए रास्ता आसान किया जा रहा है।
संपादकीय निष्कर्ष: अपनी ही संतान का गला घोंटती सत्ता
आज जब भारतीय यूपीआई की धमक सिंगापुर, यूएई, फ्रांस और नेपाल सहित वैश्विक पटल पर सुनाई देने लगी थी और यह दुनिया के सामने भारत की तकनीकी संप्रभुता का प्रतीक बन चुका था, ठीक उसी समय अपने ही इस होनहार ‘चाइल्ड’ को अमेरिकी दबाव और कॉरपोरेट हितों की वेदी पर चढ़ाने की तैयारी कर दी गई है।
एक तरफ वैश्विक स्तर पर डंका पीटने का ढोंग और दूसरी तरफ घर के भीतर उसी व्यवस्था पर शुल्क का फंदा डालकर उसे अपंग बना देना—यह इस सरकार के नीतिगत दिवालियापन को दर्शाता है।
जनता के खून-पसीने की कमाई से खड़े हुए इस डिजिटल ढांचे को विदेशी ताकतों के तुष्टीकरण और अंतहीन राजकोषीय लालच की भेंट चढ़ाना न केवल जनविश्वास के साथ क्रूर विश्वासघात है, बल्कि भारत के आर्थिक स्वाभिमान पर भी एक गहरा आघात है।

Sandeep Ji Ram Ram. Sandeep Ji ish tarah se UPI ka tao hisab-kitab karne ke baad ab agla no. RuPay card ka hai, aisa lag raha hai.
बहुत अच्छा लेख है।
बहुत ही तथ्यपरक विश्लेषण।