नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने भारत के 36,000 करोड़ रुपये के टीवी विज्ञापन कारोबार की रीढ़ मानी जाने वाली टेलीविजन रेटिंग्स (टीआरपी) पर पूर्ण नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया है.
रिपोर्ट के मुताबिक, टीवी रेटिंग्स के कामकाज से सरकार ने टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी (ट्राई) का नियंत्रण हटा दिया है.
ट्राई शुरुआत में केवल दूरसंचार नियामक था, वर्ष 2012 में पिछली यूपीए सरकार के कार्यकाल के दौरान नीति में बदलाव के तहत टीवी रेटिंग्स की निगरानी की जिम्मेदारी उसे दी गई थी. ट्राई को तब प्रसारण विनियमन के कुछ पहलुओं की जिम्मेदारी भी सौंप दी गई थी.
बुधवार (2 अप्रैल) को मिंट में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (एमआईबी) को दोबारा रेटिंग्स पर नियंत्रण दे दिया गया है. हालांकि, ट्राई के पास अब भी चैनलों की कीमत निर्धारण, विज्ञापन की सीमा, इंटरकनेक्शन और वितरण नियम, सेवा गुणवत्ता तथा अनुपालन मानकों (प्रसारण विनियमन से जुड़े पहलू) को लेकर अधिकार मौजूद है.
रिपोर्ट के मुताबिक, अब ट्राई के पास यह तय करने का अधिकार नहीं है कि रेटिंग एजेंसियां टीवी देखने की आदतों और रेटिंग्स के अन्य पहलुओं को कैसे ट्रैक करेंगी. टीआरपी रेटिंग यह तय करती हैं कि विज्ञापनदाता किन चैनलों, समय स्लॉट्स और कंटेंट में निवेश करेंगे.
खबर के अनुसार, नीति दस्तावेज में ट्राई का उल्लेख न करके उसकी निगरानी समाप्त कर दी गई है, जिससे यह शक्ति पूरी तरह मंत्रालय के पास चली गई है.
सरकार के एक सूत्र ने अखबार को बताया कि जब ट्राई प्रसारण क्षेत्र को विनियमित कर रहा था, तब भी मंत्रालय उसके फैसलों में बदलाव कर सकता था. वहीं, प्रसार भारती के एक पूर्व सीईओ ने अखबार को बताया कि मंत्रालय दिशानिर्देश जारी कर, लाइसेंस देकर और जवाबदेही तय करके रेटिंग एजेंसियों को लगातार नियंत्रित करता रहा है.
हालांकि, ट्राई की प्रसारण से जुड़े मामलों में एक अहम भूमिका रही है. उसका एक महत्वपूर्ण फैसला प्रति घंटे विज्ञापन का समय 12 मिनट तक सीमित करना था. यह फैसला तब लिया गया था जब चैनलों द्वारा लंबे विज्ञापन ब्रेक देने के खिलाफ दर्शकों में असंतोष बढ़ा था. अब, जब रेटिंग एजेंसियों के नियमन का पूरा अधिकार मंत्रालय के पास है, जो विज्ञापन बजट और विकल्पों को प्रभावित करती हैं, तो इस मुद्दे पर मंत्रालय क्या रुख अपनाएगा, यह देखना होगा.
कुछ के लिए ट्राई एक स्वतंत्र निगरानी का प्रतीक था, भले ही वह एक सरकारी संस्था ही क्यों न हो, लेकिन वह मंत्रालय और निजी टीवी चैनलों से परे जवाबदेही की एक अतिरिक्त परत प्रदान करता था.
ट्राई के पूर्व प्रमुख सलाहकार सत्य एन. गुप्ता ने मिंट से कहा, ‘भले ही सरकार के पास शक्तियां हों, लेकिन नियमन को नीति के साथ मिलाना और एक स्वतंत्र नियामक को हटाना एक प्रतिगामी कदम है.’
हालांकि, ट्राई की निगरानी को हमेशा व्यापक स्वीकार्यता नहीं मिली है. मार्च 2012 में जब उसने टीवी पर विज्ञापनों के विनियमन को लेकर एक ‘कंसल्टेशन पेपर’ जारी किया था, तब इसे एडवरटाइजिंग स्टैंडर्ड्स काउंसिल ऑफ इंडिया (एएससीआई) के विज्ञापन कोड के साथ टकराव के रूप में देखा गया.
इसके बाद, टेलीविजन ऑडियंस मेज़रमेंट और रेटिंग्स के अलावा न्यूज चैनलों के स्वामित्व, ‘पेड न्यूज’ जैसे मुद्दों पर उसकी विस्तृत सिफारिशों ने यह आशंका भी पैदा की थी कि ट्राई नियामक की भूमिका निभाने के बजाय दखलअंदाजी कर रहा है.
यह भी ध्यान देने वाली बात है कि टीवी रेटिंग्स और उन्हें जारी करने वाली एजेंसियां, नियामकीय बदलावों से इतर, हमेशा विवादों में रही हैं. एक समय ऐसा भी आया था जब मंत्रालय ने रेटिंग एजेंसियों से ‘स्पष्टीकरण’ मांगा, क्योंकि रेटिंग्स और एजेंसियों दोनों को लेकर जनता का अविश्वास बढ़ रहा था. यह प्रवृत्ति ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (बार्क) विवाद के बाद और तेज हो गई, जिसमें पहली बार रेटिंग एजेंसी के अधिकारियों पर कथित तौर पर फर्जी रेटिंग्स बनाने के आरोप में मुकदमा चला था.
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