प्रथम-कर्तव्य ये सुप्रीम-कोर्ट का
कितने पाप किये नेता ने ? जो सत्ता जाने से डरता ;
आत्महत्या क्या करेगा नेता ? हिटलर की मौत ये भी मरता ।
अत्याचारी का हश्र – भयानक , सदियों से होता आया ;
हर-पापी के साथ ये होता, फिर क्यों ये इतना घबराया ?
जैसी करनी – वैसी भरनी , कोई भी न बच पायेगा ;
तू भी तो कुछ अलग नहीं है , कर्मों का फल क्यों न पायेगा ?
पापों के दल-दल में कूदा , बुरी तरह से ये डूबा ;
अब बचने का मार्ग नहीं है , जितनी कर ले डाइविंग-स्कूबा ।
बस अब कैसी मौत को चाहे ? इसका फैसला तू कर ले ;
हाराकीरी या घिसट-घिसट कर , एक राह तू खुद चुन ले ।
तेरे सारे संगी – साथी , सभी पाप के हैं भागी ;
नहीं अकेला तू जायेगा , होंगे साथ सभी सहभागी ।
अंधभक्त भी नहीं बचेंगे , सब के सब ही भुगतेंगे ;
निर्णय का दिन पास आ रहा, सब बुरी तरह से निपटेंगे ।
केवल नफरत घोली नेता ने , केवल आग लगायी है ;
उसकी-ज्वाला में देश तपेगा , घड़ी शीघ्र वो आयी है ।
पूरी – दुनिया में सबसे – गंदे , भारत के ही नेता हैं ;
दस-प्रतिशत ही बचे हों शायद , जोकि अच्छे-नेता हैं ।
गृहयुद्ध-भयंकर होने वाला , कौन है उसे बचाने वाला ?
प्रथम-कर्तव्य ये सुप्रीम-कोर्ट का , क्या ये उसे निभाने वाला ?
ऐसे “सीजेआई” के रहते , उम्मीद बहुत ही कम से कम है ;
सेना भी कमजोर हो चुकी , ये भी बहुत-बड़ा गम है ।
अब्बासी-हिंदू भारत का नेता , बहुत-बड़ा शैतान है ;
“फ्री-मेजन” मजहब है इसका , जिससे हिंदू अनजान है ।
होनी अब रोके न रुकेगी , विपत्ति नहीं टलने वाली ;
कर्मों का फल सब पायेंगे, नदी खून की बहने वाली ।
जो भी “सेक्यूलर” धर्म में लौटें, “विष्णु-कृपा” पा सकते हैं ;
“धर्मो रक्षति रक्षित: “, बस “धर्मनिष्ठ” ही बच सकते हैं ।
सच्चा – धर्म निभाना होगा , पाखण्डों से बचना होगा ;
“शंकराचार्यों” की शरण में आओ, देर नहीं करना होगा ।
गौ , गीता , गंगा की रक्षा , पूर्ण-सुनिश्चित करना होगा ;
स्वार्थ , लोभ , भय , लालच छोड़ो, भ्रष्टाचार छोड़ना होगा ।
जैसा करेगा – वैसा भरेगा , कोई नहीं है बचने वाला ;
पापी – नेता के पीछे – पीछे , अंधभक्त मिटने वाला ।
धर्म का योद्धा बनना होगा , कायरता को छोड़ना होगा ;
“धर्म-मार्ग” पर पूरी-तरह से , हिंदू ! तुझको आना होगा ।
“जय सनातन-धर्म”,रचयिता : ब्रजेश सिंह सेंगर
