नई दिल्ली। ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगतगुरु स्वामीश्री शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज ने कहा कि इस देश के नेता कहते हैं कि यह युद्ध का नहीं, बुद्ध का देश है, लेकिन सच तो यह है कि यह बुद्ध का नहीं, युद्ध का देश है। सनातन वर्ण व्यवस्था में तो एक चौथाई आरक्षण युद्ध लड़ने वाले वीरों के लिए था। क्षत्रिय वर्ण में कोई बूढ़ा हो जाता था तो समाज में उसका सम्मान नहीं होता था कि अरे इसने शायद कोई युद्ध नहीं लड़ा है, तभी इतने वर्ष तक जीवित है! यह सदा से वीरों का देश रहा है। बुद्ध का देश कह इसकी असली पहचान को मिटाने का प्रयास किया जा रहा है।


शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज कुरुक्षेत्र गुरुकुलम फाउंडेशन (KGF) द्वारा आयोजित ‘कुरुक्षेत्र धर्मालंकरण समारोह -2025’ में मुख्य अतिथि के रूप में बोल रहे थे। यह समारोह दिल्ली के जनकपुरी स्थित होटल हयात सेन्ट्रिक में शुक्रवार को आयोजित किया गया था।
इस अवसर पर सनातन मूल्यों को ध्यान में रखकर विभिन्न क्षेत्रों में कार्य करने वाले 78 लोगों को शंकराचार्यजी ने सम्मानित किया। सम्मानित होने वालों में लेखक, पत्रकार, चिकित्सक, उद्यमी, फिल्मकार एवं समाज के अन्य क्षेत्रों के लोग शामिल थे। देश की स्वतंत्रता के 78 वर्ष होने पर KGF ने सनातन धर्म के लिए कार्यरत देश-विदेश से 78 लोगों का चयन किया था।



शंकराचार्य जी ने आगे कहा कि यह इतिहास में दर्ज है कि डॉ भीमराव अम्बेडकर ने बौद्ध धर्म को पूरी तरह से स्वीकार नहीं किया था। बौद्ध होने के लिए तीन शपथ लेनी होती है, लेकिन भीक्षु जब शपथ दिला रहे थे तो डॉ आंबेडकर ने एक शपथ नहीं लिया। उन्होंने ‘संघम शरणम गच्छामि’ कहने से मना कर दिया, जिस कारण बौद्ध भीक्षु ने उनको बौद्ध नहीं माना। फिर डॉ अंबेडकर ने बाहर आकर इसे ‘नव-बौद्ध’ धर्म घोषित कर दिया। यह नव-बौद्ध और कुछ नहीं ‘अंबेडकरवाद’ है। आज बुद्ध के नाम पर समाज में ‘अंबेडकरवाद’ को स्थापित करने का प्रयास चल रहा है। कार्यालयों में भगवान श्रीराम-कृष्ण की नहीं बुद्ध और आंबडकर की तस्वीरें लगाई जा रही हैं। इसका क्या मतलब है?



शंकराचार्य जी ने कहा कि अभी हमारे प्रधानमंत्री कार्यालय को ‘सेवा तीर्थ’ नाम दे दिया गया! क्या यह उचित है? मैंने प्रधानमंत्री को पत्र लिखा है कि धर्म के शब्दों का मनमाना उपयोग नहीं होना चाहिए। एक साधारण हिंदू भी जानता है कि ‘तीर्थ’ वह है जहां स्नान करने से पाप से मुक्ति मिलती है! क्या प्रधानमंत्री कार्यालय जाकर पाप से मुक्ति मिलती है? ऐसे मनमाने शब्द का प्रयोग कर यदि हम अपने सचिव को प्रधानमंत्री बुलाने लगें तो राजनेताओं को कैसा लगेगा? जब हम राजनीति के शब्दों का मनमाना प्रयोग नहीं करते तो राजनेता धार्मिक शब्दों का मनमाना प्रयोग कैसे कर रहे हैं?
शंकराचार्य जी ने कहा कि आज इस ‘अलंकरण समारोह’ से एक दीप प्रज्वलित हुआ है कि जो लोग सनातन धर्म और समाज के लिए कार्य कर रहे हैं, उन्हें सम्मानित किया जाएगा। यह कार्य रुकना नहीं चाहिए। उन्होंने कहा कि इस कार्यक्रम के आयोजक संदीप देव ने अपने पिता की मृत्यु के उपरांत भी इसे स्थगित नहीं किया। आंख में आंसू लेकर उन्होंने अपने संकल्प को पूरा किया है इसलिए उन्हें ‘उत्तम सनातनी’ की संज्ञा प्रदान की जाती है।

इस अलंकरण समारोह के विशिष्ट अतिथि और रामजन्म भूमि मामले से सबसे बड़े वकील व सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता श्री.पी.एन.मिश्र ने ‘गुरु व्यास’ सम्मान से सम्मानित 94 वर्षीय डॉ जियालाल कंबोज के बारे में कहा कि आज हमलोग इनको सम्मान कर स्वयं ही सम्मानित हो रहे हैं। इन्होंने 32 वर्षों की सतत साधना के बाद चारों वेदों का 16 खंडों में भाष्य किया। आज वह इस धरती पर जीवंत चतुर्वेद भाष्यकार के रूप में यहां पर उपस्थित हैं। इनका स्वागत करके हम सभी धन्य हैं।



कार्यक्रम के सम्मानित अतिथि और ‘श्रीकृष्ण सम्मान’ से सम्मानित जूना अखाड़ा के महामंडलेश्वर स्वामी यति नरसिंम्हानंद गिरि महाराज ने हिंदू समाज के समक्ष उपस्थित चुनौतियों पर प्रकाश डाला। इस अवसर पर अयोध्या के विवादित ढांचे का ध्वंस करने वाली टीम का नेतृत्व करने वाले संतोष दुबे को शंकराचार्यजी ने ‘श्रीराम सम्मान’ से सम्मानित किया।






KGF के संस्थापक अध्यक्ष संदीप देव के अनुसार, यह स्वतंत्र भारत का पहला अलंकरण समारोह जिसमें पुरस्कार का नाम सनातन धर्म के देवी-देवताओं और महापुरुषों के नाम पर रखा गया है। गुरु व्यास, श्रीराम, श्रीकृष्ण, देवी जानकी, देवी दुर्गा, देवी सरस्वती जैसे सम्मान पहली बार दिए गये हैं। कार्यक्रम का संचालन भारती ओझा जी ने किया। कार्यक्रम के अंत में KGF की उपाध्यक्ष श्रीमती श्वेता देव ने शंकराचार्य जी के चरणों में वंदन करते हुए सभी का धन्यवाद किया।
