Ashutosh Sharma सवर्ण, विशेष रुप से ब्राह्मण और अधिकांश हिंदू आज भी यह कड़वी सच्चाई नहीं देख पा रहे हैं कि वे अपनी अस्तित्व की आखिरी डोर पर लटके हुए हैं। यह कोई अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि एक क्रूर वास्तविकता है।
जिस सभ्यता का हम अभिन्न अंग हैं सनातन हिंदू सभ्यता, जो ऐतिहासिक कालक्रम में विश्व की सबसे प्राचीन, सबसे निरंतर और सबसे दृढ़ सभ्यता रही है, वह अब एक सुनियोजित, सुनियोजित तरीके से समाप्त किए जाने के कगार पर खड़ी है।
यह संकट बहुआयामी है मित्रों..
जनसांख्यिकीय संकट (Demographic Collapse) ब्राह्मण परिवारों में औसत संतान संख्या 1.7 से भी कम है, प्रतिस्थापन स्तर (replacement level 2.1) से काफी नीचे। अधिकांश ब्राह्मण परिवारों में 1-2 बच्चे ही होते हैं, जबकि अन्य समुदायों में यह दर अभी भी ऊँची है। अगले 10-20 वर्षों में ब्राह्मण आबादी राष्ट्रीय स्तर पर 1% से भी नीचे गिर सकती है। यह कोई प्राकृतिक प्रक्रिया नही बल्कि यह शिक्षा, आर्थिक दबाव, देर से विवाह और सामाजिक-मानसिक बोझ का परिणाम है। जब संख्या घटती है, तो सांस्कृतिक स्मृति, वेद-पाठ, परंपरा और गुरु-शिष्य परंपरा भी दुर्बल पड़ती है।
सामाजिक-राजनीतिक बहिष्कार और घृणा ( वर्तमान सरकार द्वारा भी )
ब्राह्मणों को “विपरीत” के रूप में चित्रित किया जा रहा है, आरक्षण विरोधी, जातिवादी, विशेषाधिकार प्राप्त ।



हालाँकि आज अधिकांश ब्राह्मण गरीबी रेखा से नीचे या उसके आसपास जी रहे हैं। 55% से अधिक ब्राह्मण परिवार गरीबी में हैं, फिर भी उन्हें “शोषक” का ठप्पा लगाया जाता है। यह घृणा प्रचारित है , मीडिया, राजनीति और शिक्षा में, जो ब्राह्मणों को अलग-थलग करती है और उन्हें अपनी पहचान पर शर्मिंदा होने को मजबूर करती है।
सांस्कृतिक और धार्मिक हमला
हिंदू सभ्यता का मूल आधार ब्राह्मणों की वेद-रक्षा, संस्कृत, कर्मकांड और आध्यात्मिक नेतृत्व रहा है। जब ब्राह्मण कमजोर पड़ते हैं, तो सभ्यता का हृदय कमजोर पड़ता है। साथ ही, संगठित मिशनरी गतिविधियाँ, जबरन/प्रलोभन से धर्मांतरण, और इस्लामी/ईसाई प्रभाव हिंदू आबादी को खोखला कर रहे हैं।

यह “सुनियोजित संहार” है, जिसमें ब्राह्मणों को पहले निशाना बनाया जाता है, क्योंकि वे सभ्यता के “रक्षक” माने जाते हैं। ब्राह्मण-घृणा हिंदू-विनाश का पूर्व-चरण है।
अनजानापन और निष्क्रियता
सबसे दुखद बात यह है कि ब्राह्मण समुदाय और अधिकांश हिंदू इस खतरे से अनजान हैं। वे रोजमर्रा की जिंदगी, नौकरी, शिक्षा और सामाजिक प्रतिष्ठा में उलझे हैं, लेकिन सभ्यता के अस्तित्व के संकट को नहीं देखते। यह “अंतिम पैर” (last leg) पर होने का अर्थ है ,अब गिरने से पहले सिर्फ कुछ कदम बचे हैं।
यदि अभी ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह सुनियोजित नरसंहार (well-thought-out slaughter) सफल हो जाएगा।
परिवारों में अधिक संतानें अपनानी होंगी।
ब्राह्मण-हिंदू एकता और जागरूकता फैलानी होगी।
सांस्कृतिक-धार्मिक परंपराओं को जीवित रखने के लिए संगठित प्रयास करने होंगे।
घृणा-प्रचार का मुकाबला सत्य और गौरव से करना होगा।
यह सिर्फ ब्राह्मणों का संकट नहीं है , यह संपूर्ण हिंदू सभ्यता का संकट है। यदि ब्राह्मण मिट गए, तो वेद, उपनिषद, पुराण, संस्कृत और अद्वैत की वह चेतना भी मिट जाएगी, जो भारत को भारत बनाती है।
जागिए, भाइयो-बहनों। अभी समय है। अभी लड़ाई लड़ सकते हैं। सरकारें , निकम्मी हैं । सभी सरकारें ।
अन्यथा, इतिहास हमें माफ नहीं करेगा क्योंकि हमने अपनी सभ्यता को अपनी आँखों के सामने मरते देखा, और कुछ नहीं किया।
नारायण
