संदीप देव। वैसे तो सवर्णों के पक्ष में अब मेरा बोलने को मन नहीं करता, क्योंकि वह गुलामी का पट्टा अपने गले में इतना गहरा बांध चुके हैं कि वह अपने बच्चों तक की बली देने को तैयार हैं! जिस पार्टी, नेता और संगठन के लिए वह सभी से लड़ते रहते हैं, उन्होंने उन्हें पूरी तरह से ‘पोलिटिकल अछूत’ बना दिया है, लेकिन यह ‘अछूत’ बनकर भी ‘अजैविक सुल्तान’ की गुलामी से बाज नहीं आते! ब्रेनडेड की स्थिति को प्राप्त हो चुके हैं आज के अधिकांश सवर्ण! परंतु क्या करूं पत्रकार हूं, इसलिए अन्याय के विरुद्ध चुप भी रहा नहीं जाता!
कई संघी-सरकारी सवर्णों को देख रहा हूं कि UGC में अपने बच्चों के विनाश के बिल को भी वह जस्टिफाई करने में जुटे हैं! भाजमुल्ले यूट्यूबरों का तो पता है कि उनका बंधा संघी-भाजमुल्ला दर्शक वर्ग है, यदि वह छिटक गया तो रेवेन्यू का लॉस हो जाएगा, मीडिया को विज्ञापन के जरिए खरीदा ही जा चुका है, लेकिन तुम क्यों अपने बच्चों की कीमत पर श्वान की भांति हर किसी की पोस्ट पर अपने मालिक के पाप को जस्टिफाई करने के लिए भौं@ते फिर रहे हो और Whatsapp University से मिले कुतर्क को चिपकाते घूम रहे हो? और सवर्ण समाज से आने वाले जनप्रतिनिधियों की तो पूछो ही मत? वह तो गद्दारी का ही ईनाम पा रहा है!
अरे ईश्वर ने दिमाग दिया सोचने के लिए या गुलामी के लिए? आश्चर्य है कि जिन ब्राह्मणों का काम ज्ञान अर्जन था, आज ब्राह्मण और उसकी उपजातियां गुलामी की रेस में सबसे आगे निकलने के लिए सर्वाधिक बेचैन है!

१) अब सुनो और नीचे जो UGC बिल लागू हुआ है, केवल उसका एक प्वाट देखो और समझो! यूजीसी बिल में साफ-साफ लिखा है की ‘कास्ट बेस्ड डिस्क्रिमिनेशन ‘(जातिगत भेदभाव) सिर्फ SC/ST/OBC के खिलाफ माना जाएगा! अर्थात् यदि कोई SC/ST/OBC सवर्ण के बच्चों के खिलाफ जातिगत भेदभाव करेगा तो उसे माना ही नहीं जाएगा!
२) दूसरी बात जब कास्ट बेस्ड डिस्क्रिमिनेशन के शिकार में SC/ST/OBC को रखा गया है तो स्वाभाविक उत्पीड़क कौन हुआ? तुम्हारे ही बच्चे न?
३) तुम्हारे बच्चे को जिस सत्ता ने स्वाभाविक उत्पीड़क माना है, तुम उसी की चाकरी में मरे जा रहे हो? बच्चे क्या तुम्हारे वीर्य से पैदा नहीं हुए हैं कि उनके विनाशक के साथ खड़े हो?
४) कभी सोनिया गांधी की ‘मनमोहनी सरकार’ ने इसी तरह सांप्रदायिक लक्षित हिंसा विधेयक में हिंदुओं को स्वाभाविक दंगाई माना था, ठीक उसी तरह भाजपा की मोदी सरकार सवर्णों के बच्चों को स्वाभाविक उत्पीड़क मान रही है, फिर भी तुम्हारी आंख नहीं खुलती धर्मद्रोहियों?
अरे गुलामों! तुम अपने बच्चों की मौत के सौदागर साबित हो रहे हो! सच कहूं तो अपने बच्चों के विनाशक के साथ खड़े लोग वर्णसंकर हैं, अन्यथा ‘स्वधर्म’ के लिए लड़ने वालों का तो निधन भी भगवान श्रीकृष्ण ने श्रेष्ठ माना है! दासों अपने घरों में पता करो कि आखिर किस पीढ़ी में यह वर्णसंकरता तुम्हारे रक्त का हिस्सा बना है!
