भारत और विश्व में जन्मे सभी धर्म अपने अलग-अलग दर्शन तक सीमित रहे। परंतु इन सबको पार करते हुए भगवान रजनीश हमें एक ऐसा उन्नत धर्म-दर्शन तक लेकर आते हैं, जो पूरी तरह समकालीन भाषा और वैज्ञानिक पद्धति पर आधारित है और किसी प्रकार के अंधविश्वास या धार्मिक dogma पर नहीं टिका।
यह धर्म दर्शन केवल विचार तक सीमित नहीं, बल्कि जीवन के अनुभव, निरीक्षण और चेतना की अवस्थाओं की वास्तविक अनुभूति पर आधारित है। यही कारण है कि भगवान श्री की बातें पुराने धार्मिक सोच से मेल नहीं खाती और उनका का विरोध न केवल भारत और विश्व का तथाकथित धार्मिक वर्ग करता है, बल्कि विश्व की सबसे बड़ी सत्ता भी उनके कारण असहज हो जाती है।
अमेरिका में रजनीशपुरम का निर्माण
भगवान श्री भारत से बाहर जाते हैं और वहां केवल एक धर्म के आधार पर नया नगर नहीं बसाते, बल्कि अपना नया धर्म—“रजनीश बाइबल”—के माध्यम से भी समझाते हैं। इस संदर्भ में उनके प्रवचन को मैंने लेख-माला की दूसरी कड़ी में पाठकों के लिए प्रस्तुत किया है।
इसके बाद अमरीका में भगवान श्री “Rajneeshism” नामक धार्मिक पुस्तक का निर्माण करवाते हैं, जो दो बार जुलाई 1983 एवं नवंबर 1983 में प्रकाशित होती है। हालांकि, बाद में वह स्वयं कहते हैं—“मेरा कोई धर्म नहीं और न ही मेरी कोई धार्मिक किताब है।”
फिर भी, हम उनके विरोधाभास को समझते हैं और उनके इस नए धर्म दर्शन को स्वीकारते हैं क्योंकि इसका मूल आधार “धार्मिक मनुष्य” है और उनकी शिक्षाएँ जीवन को समझने का मार्ग दिखाती हैं।
अमेरिका से वापस आने के बाद भी भगवान श्री अपने धर्मचक्र-प्रवर्तन का कार्य, संन्यास दीक्षा और संन्यासियों का नया नगर बसाने का संकल्प जारी रखते हैं। परंतु उनके शरीर में प्रवेश कर चुके ज़हर ने उन्हें धीरे-धीरे बोलने और कार्य करने से रोक दिया और पूरी तरह अशक्त कर दिया। फिर उनकी मृत्यु संदिग्ध परिस्थिति में होती है।
भगवान श्री की प्रिय गुड़िया और उनकी दोबारा मृत्यु
गुड़िया को भगवान दोबारा मृत देखते है!
गुड़िया/शशि जिसने युवा अवस्था में देह त्यागने के बाद दोबारा जन्म लिया और भगवान से दोबारा मिली और फिर Ma Yog Vivek उर्फ Ma Prem Nirvano के नाम से जानी गई; उनकी केयरटेकर और पर्सनल सेक्रेटरी और उनकी प्रेमिका।
“भगवान के देहत्याग के 40 दिन पहले ही मुंबई के होटल में मृत पाई गई थी।”
यह घटना Who Killed Osho? किताब में भी दर्ज है और यह संकेत देती है कि आसपास चल रही साजिशें कितनी जटिल थीं।
भगवान श्री रजनीश की समाधि
दशकों तक भगवान श्री रजनीश की समाधि को समाधि बताने के बाद में उनकी समाधि को भी विवादित बना दिया गया और समाधि कहने से इंकार कर दिया गया आश्रम के संचालकों द्वारा!
भारत में स्थित OIF संस्था ने भगवान की समाधि को “समाधि” कहने से इंकार किया और आश्रम में मौजूद अन्य संन्यासियों की समाधियों को छुपाना शुरू किया।
आज यही संस्था वित्तीय गड़बड़ियों (Financial Fraud) से इंकार कर रही है और सुप्रीम कोर्ट में संस्था को फाइनेंशियल ऑडिट से बचाने के लिए जीतोड़ कोशिश कर रही है।
रजनीशपुरम: प्रेम और सस्पेंस का नगर
अमेरिका का रजनीशपुरम नगर प्रेम, शांति और उत्सव का प्रतीक था। कोई हिंसा या गंभीरता इस नगर में नहीं थी। परंतु आसपास के लोग बढ़ती नवसन्यासीयों की आबादी और उनके ऊर्जावान जीवन के कारण असहज होने लगे थे। उनका उद्देश्य स्पष्ट था—यह नगर बसने न पाए।
इस शहर का विकास जितना तेज़ हुआ, उतनी ही विश्व की बड़ी शक्तियाँ असहज हुईं। अमेरिका जैसे लोकतांत्रिक देश में, ध्यान और प्रेम पर आधारित इस शांति क्रांति को सीधे समाप्त करना आसान नहीं था।
भारत के उस समय के शंकराचार्य ने ब्रिटेन की महारानी, जो स्वयं उनकी शिष्या थीं, उनको नव संन्यास आंदोलन के खिलाफ प्रेरित किया। इसके बाद महारानी के परिवार से जुड़े राजकुमार और भगवान श्री के नवसंन्यासी स्वामी विमल कीर्ति और उनके परिवार को भगवान श्री से अलग करने की बड़ी योजना बनती है। राजपरिवारों में हुई गुप्त बैठकों के भगवान श्री के खिलाफ साजिशें घड़ी गई। यह बात भगवान ने अपने प्रवचन में स्पष्ट की है।
दूसरी ओर अमरीकी कट्टर ईसाई राजनीतिज्ञ भी कम्यून के खिलाफ हो गए और इसके विरुद्ध षड्यंत्र रचा गया। सरकार के पास कोई प्रत्यक्ष प्रमाण न होने के कारण, सरकार को अवसर की प्रतीक्षा थी।
संन्यासियों के बीच एजेंट्स की जासूसी
इस दौरान Ma Anand Sheela और उनकी टीम कम्यून के 400 डिपार्टमेंट्स के तहत व्यवस्था का सख्त और सुचारू प्रबंधन कर रही थीं।
दूसरी और भगवान श्री अब सीधे नए आगंतुकों से संवाद करने लगे थे जैसे कि हॉलीवुड से आई एक हस्ती और उनके साथ आएं कुछ शंकास्पद लोग। इनके बारे में अगली कड़ी में ज्यादा विस्तार से।
मा शीला ने भगवान श्री की सुरक्षा, कड़ी करने के लिए आश्रम की फोन टैपिंग करवाई और पता लगाया कि शंकास्पद जो अब नव-संन्यासियों के भेष में घुसे थे, भगवान की हत्या की साजिश रच चुके थे।
लेकिन आश्चर्य यह था कि भगवान स्वयं इस साजिश से परिचित होते हुए भी उसे रोकना नहीं चाहते थे।
क्या यह उनका गहरा स्वीकारभाव था?
चुनाव और कम्यून की सुरक्षा
भगवान श्री ने Ma Anand Sheela को चुना, Vasco County में आने वाले चुनाव को जीतने के लिए ताकि रजनीशपुरम सुरक्षित रह सके। बिना चुनाव जीते इस कम्यून का अस्तित्व खतरे में था।
अमेरिका स्वयं को लोकतंत्र का प्रहरी मानता है, पर राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन की सरकार और कट्टर ईसाई यह बर्दाश्त नहीं कर सकते थे कि कोई भारत से आए गुरु उनके शिक्षित और समृद्ध ईसाई नागरिकों का धर्म परिवर्तन कर दें, पर वे लाचार थे, सीधे तौर पर एक लोकतांत्रिक देश के संविधान के हिसाब से वह कुछ नहीं कर सकते थे।
ईसाई गरीब और अशिक्षितों का धर्मांतरण पूरे विश्व में करते रहें, लेकिन उनके डिग्रीधारी नागरिक रजनीश के शिष्य बन जाएं—यह उनके लिए असहनीय था।
इसी दौरान शहर में बीमारियों का फैलाव हुआ, जिससे कम्यून पर आरोप लगे। अमेरिका सरकारी एजेंसी को आवश्यक सबूत मिलें और कार्रवाई तेज़ हो गई।
भगवान को पता था कि एजेंट्स प्रवेश कर चुके हैं, पर वे कुछ अलग ही कार्य कर रहें थे।
Ma Anand Sheela की रणनीति और भगवान श्री की बेपरवाही
एक तरफ मा शीला को भगवान ने अपने कम्यून की सुरक्षा और उनके दर्शन को फैलाने और सुरक्षित रखने का कार्य सौंप रखा था और दूसरी और भगवान षड्यंत्रकारियों के चाल में साथ दे रहें थे। यह बात मा शीला के लिए मुश्किलें बढ़ा रही थी। क्या भगवान उनकी झेन या गुर्जीफ जैसी परीक्षा ले रहें थे?
घटनाओं के क्रम ने Ma Anand Sheela को कठोर कदम उठाने पर मजबूर किया। उन्होंने हथियार खरीद कर सुरक्षा व्यवस्था और ज्यादा मजबूत की। हालांकि भगवान इसे अनावश्यक समझते थे, पर मा शीला की दृष्टि में यह आवश्यक था और भगवान ने इस का कोई विरोध भी नहीं किया।
मा शीला की अमरीकी सरकार के खिलाफ लड़ने की कोशिशें असफल हो जाती है, वह परिस्थिति से हार कर, कम्यून छोड़ चली जाती है।
इसके बाद एक दूसरे पर इल्जामों का विवाद सभी जानते है। मा शीला के जाने के बाद, भगवान खुद ही सरकार को मौका देते है कि वह कम्यून में आएं। अब अमरीकी सरकार को मौका मिल जाता है कम्यून को खत्म करने का।
“क्या यह भगवान श्री का तरीका था, अमरीका के लोकतांत्रिक होने के पाखंड को उजागर करने का?”
मा शीला को सजा, भगवान को देश से निकाला जाना और एजेंट्स का झूठ फैलाना
अमरीकी कोर्ट ने मा शीला को भारी 20 वर्षों की सज़ा सुनाई गई, पर आश्चर्यजनक रूप से, वे 39 महीनों में उनकी अच्छी चालचलगत के कारण रिहा हो गईं और अब वह स्विट्ज़रलैंड में असाध्य रोगों से पीड़ित वृद्धजनों की सेवा कर रही हैं और मातृसदन नामक केयर सेंटर चला रही है।
भगवान श्री को केवल अमेरिका में ही नहीं, बल्कि 21 देशों में प्रवेश से रोक दिया गया। भारत लौटने के बाद मुंबई के सुमिला निवास के दौरान The Last Testament (1 अगस्त 1986) को उन्होंने Ma Anand Sheela के पक्ष में एवियन पत्रिका में अंतिम प्रश्नोत्तरी करी और उनको 99% सही ठहराया। यह बात “फिर अमृत की बूंद पड़ी” पुस्तक में हिंदी में भी दर्ज है।
लेकिन नवसंन्यासी के भेष में घुसे शक्मंद एजेंट्सओने अपने पर से ध्यान हटाने के लिए, कम्यून के नष्ट होने का सारा दोष मा आनंद शीला पर डालना जारी रखा और भोले नव-संन्यासी इन एजेंट्स के दुष्प्रचार के शिकार हो गए और आज भी उन का एजेंट्स की बातों को मान लेना जारी है। एजेंट्स की चाल के चलते भोले भक्तों ने सारा दोष Ma Anand Sheela पर मढ़ दिया और आज भी इस बात का गलत प्रचार जारी है।
संदिग्ध मृत्यु और प्रश्न
भारत में भगवान श्री की संदिग्ध मृत्यु के बाद प्रकाशित हुई पुस्तक “Who Killed Osho?” में कई सबूत और घटनाओं का विवरण है। यह सवाल उठता है: आखिरकार हमारे गुरु की हत्या के पीछे कौन था?
जब तक हम केवल बाहरी उत्सव मनाते रहेंगे और हमारे साथ क्या खेल खेला गया है इस की गहरी छानबीन नहीं करेंगे तब तक इस साजिश पर प्रकाश नहीं पड़ेगा।
अगली कड़ी में
- एजेंट्स का खेल रजनीशपूरम में और भारत में।
-स्वामी प्रेम वर्तन

second part