महाकुम्भ की पोल खुल गयी
राजनीति हत्यारी – माफिया , लोकतंत्र की हत्या कर दी ;
नेता – अफसर बेलगाम हैं , अत्याचार की हद ही कर दी ।
संविधान सब भूल चुके हैं , कानून की कोई नहीं है इज्जत ;
काले-धन का राज है काला , लूट-खसोट में मिलती लज्जत ।
वणिक-वृत्ति का पूरा-शासन , टैक्स-डकैती बढ़ती जाती ;
सीधे का मुंह कुत्ता चाटे , गुंडागर्दी बढ़ती जाती ।
झूठ बोलते धोखा देते , एक से बढ़कर एक हैं ;
कानूनों का दुरुपयोग है , लूट रहा हर – एक है ।
महाकुम्भ में कितनी भगदड़ ? कितनों का संहार हुआ ?
हिंदू ! तेरी यही कहानी , जगह – जगह संहार हुआ ।
हिंदू ! की मौत छुपायी जाती , लाशें गायब हो जाती हैं ;
अंतिम – संस्कार से भी वंचित , प्रेत – योनि हो जाती है ।
दुर्घटनायें बढ़ती जाती हैं , शासन पूरा सुस्त है ;
हिंदू ! की जान की नहीं है कीमत , नशे में सारे मस्त हैं ।
सत्ता का नशा इस कदर हावी , पागल-हाथी झूम रहा है ;
निरपराध सब कुचल रहे हैं , हाथी मस्ती में घूम रहा है ।
पूरी – दुनिया में हाथी घूमे , जय – जय कार कराता है ;
अहंकार में इतना पागल , मैं मैं मैं ही करता है ।
बार-बार कपड़ों को बदले , फैंसी-ड्रेस का जोकर बनता ;
सेना तक की वर्दी पहने , युद्ध के पूरे श्रेय को लेता ।
केवल मक्खी मार – मार कर , तीसमार खां बनता है ;
पूरी तरह से जीरो – नेता , देश का हीरो बनता है ।
बहुत बुरी गति हुयी देश की , कितने आरोग्य नेता पाये ?
नीचे ही नीचे गिरता जाता , बहुत बुरे दिन अब आये ।
राजगुरु , सुखदेव , भगत सिंह , हर कुर्बानी व्यर्थ हुयी ;
उद्देश्य व्यर्थ है आजादी का , हर मोर्चे पर फिसल गयी ।
भ्रष्टाचार की फिसलन इतनी , जिसमें पूरा-देश फिसलता ;
सबसे नीचे पहुॅंच चुका है , इसमें विश्व-चैंपियन बनता ।
महाकुम्भ की पोल खुल गयी , कितना भीषण अत्याचार ?
हिंदू ! तेरी मौत छुपा कर , शासन करता भ्रष्टाचार ।
मुॅंह बंद किया नकदी देकर , क्या कोई कानून नहीं है ?
कहाॅं गयी अब तेरी ईडी ? पूरा जंगल – राज यही है ।
सबका विकास क्या यही है इनका?क्या इनका यही सुशासन है?
पूरा-भारत फंस चुका भंवर में , जो कि मौत का आसन है ।
भविष्य-मालिका भविष्य का दर्शन , इसका परिणाम बताती है ;
करनी का फल अवश्य मिलेगा , अंत भयानक बतलाती है ।
