संदीप देव। यह ‘सामाजिक न्याय’ नहीं, ‘सामाजिक प्रतिशोध’ है!
१) दो हजार साल तक छुआछूत और भेदभाव की थ्योरी अंग्रेजों की गढ़ी हुई है, जिस पर अंग्रेजों का विश्वासपात्र संघ आज भी चल रहा है!
२) सनातन धर्म में यदि छुआछूत होता तो डोम राजा इतने अमीर नहीं होते की वह सूर्यवंशी क्षत्रिय राजा हरिश्चंद्र को खरीद पाते!
३) छुआछूत होता तो ‘धर्म व्याध’ (पशु वध और उसका मांस बेचने वाले) से मिथिला के कौशिका नामक विद्वान ब्राह्मण ज्ञान ग्रहण नहीं करते।

४) छुआछूत होता तो भगवान श्रीराम शबरी के बेर नहीं खाते।
५) छुआछूत होता तो एकलव्य के पिता हिरण्यधनु मगध जैसे विशाल साम्राज्य के सेनापति नहीं होते।
६) अपने से पराजित हिंदुओं से मैला उठवा कर छुआछूत पैदा किया तुगलक, मुगल आदि मुस्लिम शासकों ने, इसे चौड़ा किया अंग्रेजों ने और परिणाम भुगत रहा है हिंदू समाज।
७) हिंदू समाज और उसकी सामान्य जाति के साथ जो किया जा रहा है ‘सामाजिक प्रतिशोध’ है, जो अंग्रेजों का पैदा किया हुआ और आजाद भारत में संघियों द्वारा पोषित और बढ़ाया जा रहा है।
८) मंडल कमीशन से लेकर #UGC कानून तक लागू करने वाले संघी-भाजपाई हिंदू समाज की सामान्य जाति से ‘सामाजिक प्रतिशोध’ ले रहे हैं। और अब ‘संघावत’ 200 साल तक आरक्षण की वकालत कर समान्य जातियों से अगले 200 साल तक ‘संघी प्रतिशोध’ की खुलेआम घोषणा कर रहे हैं!
९) यह समाजिक न्याय नहीं, हिंदू समाज और उसकी समान्य जातियों से मुगलों-अंग्रेजों द्वारा, फिर ब्राह्मण शिक्षक और क्षत्रिय राजा द्वारा पोषित डॉ भीमराव अम्बेडकर द्वारा और अब संघियों द्वारा ‘समाजिक प्रतिशोध’ लिया जा रहा है।
१०) मैं इसे ‘सामाजिक प्रतिशोध’ घोषित करता हूं।
