घड़ा पाप का भर चुका है पूरा
चरित्रहीन – अय्याश जो नेता , हरदम पूंछ हिलाता रहता ;
जीवन के अध्याय हैं काले , ब्लैकमेल होता रहता ।
एपस्टीन – फाइल में भी है , जाने कितनी बनी हैं फिल्में ?
भारत का अभिशाप ये नेता, दुश्मन देशों की भरता चिलमें ।
महामूर्ख जितने हिंदू हैं , जो धर्महीन – अज्ञानी भी हैं ;
स्वार्थ, लोभ ,भय ,भ्रष्टाचार से , इनकी जानें तो जानी ही हैं ।
धरती का बोझ बन चुके हैं सब , ज्यादातर हिंदू – नेता ;
राजनीति को गटर बनाया , अब्बासी-हिंदू भारत का नेता ।
ऐसे नेता पक्के भड़वे हैं , राजनीति इनकी वैश्या है ;
अपनी मां का सौदा करते , पूरी तरह बेहया हैं ।
भारत के नेता गिर चुके हैं कितने ? इसमें विश्व-चैंपियन हैं ;
सत्ता-लिप्सा व अय्याशी , कितना गर्हित इनका जीवन है ?
अब तो केवल महायुद्ध ही , इन्हें होश में ला सकता है ;
बमों की वर्षा इनके घर में , नामोनिशां मिटा सकता है ।
ये चींटे हैं गुड़ से चिपके , कभी नहीं ये सुधरेंगे ;
जीते – जी गुड़ न छोड़ेंगे , अपनी जान उसी में देंगे ।
हिंदू-जनता में बुद्धि नहीं है , अच्छे-नेता न चुन पायेगी ?
तिलक-त्रिपुण्ड की नाटक-नौटंकी, हिंदू-जनता डूब जायेगी ।
मूर्खों के साथ वही होता है , जैसा हिंदू के साथ हो रहा ;
सब कुछ है एकदम स्वभाविक, अब क्यों छाती पीट रहा ?
हृदय-सम्राट बनाया तूने , अब उसका साम्राज्य भोग ले ;
पूरा मजा तो चखना होगा,चाहे जितना अब तू रो ले ।
सबको फांस लिया नेता ने, सुप्रीम-कोर्ट तक फंसा हुआ है ;
कौन करेगा तेरी रक्षा ? देश का सब कुछ डंसा हुआ है ।
अब तो “राम” बचाये तुझको , वो ही रक्षा कर सकता है ;
पर धर्म-मार्ग में आना होगा , वही सुरक्षा दे सकता है ।
“धर्मो – रक्षति – रक्षित: “ , ये परम – सत्य – सिद्धांत है ;
धर्महीन जितने हिंदू हैं , निश्चित होना उनका दुखान्त है ।
मरता मानव क्या न करता ? अब तो हिंदू को जागना होगा ;
अभी नहीं तो कभी नहीं ,क्योंकि फिर तो मर जाना होगा ।
अपनी रक्षा करनी है तो , फौरन धर्म – मार्ग पर आओ ;
स्वार्थ ,लोभ ,भय ,लालच छोड़ो, व अच्छी-सरकार बनाओ ।
घड़ा पाप का भर चुका है पूरा, अब समय है इसकी टूट का ;
“अवतार-कल्कि” आ चुके देश में , निकट समय प्राकट्य का ।
“भविष्य-मालिका” में सब अंकित,हिंदू इसका अनुसरण करो ;
कोई पापी नहीं बचेगा , बस “महा-विष्णु” का ध्यान धरो ।
“जय सनातन-धर्म”, रचनाकार : ब्रजेश सिंह सेंगर “विधिज्ञ”
