उमर खालिद और शरजिल इमाम को जमानत नहीं मिली है?: हाल ही में 5 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएं खारिज कर दी हैं।
यह पूरा मामला क्या है? इसके पूरे इतिहास से लेकर वर्तमान तक विस्तृत विश्लेषण
1. मामला क्या है? (इतिहास से वर्तमान तक)
यह मामला फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों से जुड़ा है, जिसमें 53 लोगों की जान गई थी।
- शुरुआत (दिसंबर 2019 – फरवरी 2020): नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और NRC के विरोध में दिल्ली के विभिन्न हिस्सों में प्रदर्शन शुरू हुए। पुलिस का आरोप है कि उमर खालिद, शरजील इमाम और अन्य ने इन प्रदर्शनों की आड़ में एक “बड़ी साजिश” (Larger Conspiracy) रची ताकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि खराब की जा सके (उस समय अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत दौरे पर थे)।
- गिरफ्तारी: शरजील इमाम को जनवरी 2020 में उनके भड़काऊ भाषणों के आरोप में और उमर खालिद को सितंबर 2020 में गिरफ्तार किया गया था। इन पर UAPA (आतंकवाद विरोधी कानून) के तहत मामला दर्ज किया गया।
- कानूनी प्रक्रिया: पिछले 5 वर्षों से दोनों जेल में हैं। दिल्ली हाई कोर्ट ने सितंबर 2025 में उनकी जमानत याचिका खारिज की थी, जिसके खिलाफ वे सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे।
- ताजा फैसला (5 जनवरी 2026): सुप्रीम कोर्ट की बेंच (जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एनवी अंजारिया) ने कहा कि इन दोनों की भूमिका अन्य आरोपियों से “गुणात्मक रूप से भिन्न” (Qualitatively Different) है। कोर्ट ने इन्हें साजिश का “मास्टरमाइंड” मानते हुए जमानत देने से इनकार कर दिया, जबकि इसी मामले में 5 अन्य आरोपियों (गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर आदि) को जमानत दे दी गई।

जमानत नहीं मिलने पर देश और विदेश की पक्ष-विपक्ष में प्रमुख लोगों के नाम के साथ उनकी प्रतिक्रियाएं
2. देश-विदेश की प्रमुख प्रतिक्रियाएं
इस फैसले पर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिली हैं:
| पक्ष/व्यक्ति | प्रतिक्रिया का सारांश |
| बीजेपी (शहजाद पूनावाला) | फैसले का स्वागत किया और विपक्ष पर आरोप लगाया कि वे “आतंकवाद के पैरोकारों” का साथ दे रहे हैं। |
| प्रशांत भूषण (वरिष्ठ वकील) | इसे “न्याय का उपहास” बताया और कहा कि अदालतें सरकार के दबाव में झुक रही हैं। |
| CPI(M) | फैसले की आलोचना करते हुए कहा कि बिना ट्रायल के 5 साल तक जेल में रखना प्राकृतिक न्याय के खिलाफ है। |
| जोहरान ममदानी (NY असेंबली मेंबर) | अमेरिकी राजनेता ममदानी और कुछ अन्य अमेरिकी सांसदों ने पत्र लिखकर उमर खालिद की रिहाई की मांग की थी, जिसे भारत ने आंतरिक हस्तक्षेप बताया। |
| Hindus for Human Rights (NGO) | इस अंतरराष्ट्रीय संस्था ने फैसले को “अस्वीकार्य” बताया और उनकी तत्काल रिहाई की मांग की। |
इस मामले से जुड़ी UAPA कानून की प्रमुख धाराओं या अदालत द्वारा जमानत खारिज करने के तकनीकी कारणों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी
उमर खालिद और शरजील इमाम के मामले में अदालत ने UAPA (Unlawful Activities Prevention Act) की विशेष धाराओं और सुप्रीम कोर्ट के पिछले फैसलों (जैसे ‘वटालि’ जजमेंट) का आधार लिया है।
यहाँ उन तकनीकी और कानूनी कारणों का विश्लेषण दिया गया है जिसकी वजह से उन्हें जमानत नहीं मिल पा रही है:
1. UAPA की धारा 43D(5) का ‘कठोर’ प्रावधान
सामान्य आपराधिक मामलों में कानून का सिद्धांत है “जमानत नियम है, जेल अपवाद” (Bail is the rule, Jail is the exception)। लेकिन UAPA के तहत यह बदल जाता है।
- धारा 43D(5): यह कहती है कि यदि अदालत को पुलिस की केस डायरी या चार्जशीट के आधार पर यह लगता है कि आरोप प्रथम दृष्टया (Prima Facie) सही हैं, तो वह जमानत नहीं दे सकती।
- अदालत को मेरिट (सबूतों की गहराई) में जाने की जरूरत नहीं है, बस यह देखना है कि क्या पुलिस की कहानी में दम लग रहा है।
2. जमानत खारिज होने के 3 मुख्य तकनीकी कारण
अदालत ने अपने हालिया आदेश में निम्नलिखित बिंदुओं को रेखांकित किया है:
- साजिश का ‘मास्टरमाइंड’ (Mastermind Theory): कोर्ट ने माना कि अन्य आरोपी (जिन्हें जमानत मिली) केवल घटनास्थल पर मौजूद थे या नारे लगा रहे थे, लेकिन उमर खालिद और शरजील इमाम पर “साजिश रचने” (Conspiracy) का आरोप है। कोर्ट के अनुसार, वे पर्दे के पीछे से पूरी हिंसा की रूपरेखा तैयार कर रहे थे।
- शरजील इमाम के भाषण: अभियोजन पक्ष ने शरजील के उन भाषणों को पेश किया जिसमें उन्होंने “असम को भारत से काटने” की बात कही थी। कोर्ट ने इसे देश की अखंडता और संप्रभुता पर सीधा हमला माना, जो UAPA के तहत गंभीर अपराध है।
- व्हाट्सएप ग्रुप (DPSG): पुलिस ने ‘Delhi Protest Support Group’ (DPSG) नामक व्हाट्सएप ग्रुप के संदेशों को सबूत के तौर पर पेश किया। अदालत ने माना कि इन संदेशों से यह संकेत मिलता है कि “चक्का जाम” को जानबूझकर “हिंसक दंगे” में बदलने की योजना थी।
3. प्रमुख धाराएं जो इन पर लगी हैं
इन दोनों पर दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने मुख्य रूप से ये धाराएं लगाई हैं:
| धारा | विवरण |
| UAPA Sec 13, 16, 17, 18 | गैर-कानूनी गतिविधियां, आतंकवादी कृत्य की सजा और साजिश रचना। |
| IPC 124A (राजद्रोह) | सरकार के खिलाफ नफरत फैलाना (हालाँकि इस धारा पर अभी रोक लगी है, फिर भी केस का हिस्सा है)। |
| IPC 302/307 | हत्या और हत्या का प्रयास (दंगों के दौरान हुई मौतों के लिए साजिशकर्ता के रूप में)। |
| IPC 153A | धर्म या जाति के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच शत्रुता को बढ़ावा देना। |
वर्तमान स्थिति:
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब इनके पास “पुनरीक्षण याचिका” (Review Petition) का विकल्प बचता है, लेकिन कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक मामले का ट्रायल (मुकदमा) पूरा नहीं होता या अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयानों में बड़े विरोधाभास नहीं आते, तब तक इनकी रिहाई मुश्किल है।
पुलिस द्वारा पेश किए गए किसी विशिष्ट सबूत या बचाव पक्ष के तर्क
इस मामले में दिल्ली पुलिस (अभियोजन पक्ष) और उमर खालिद/शरजील इमाम के वकीलों (बचाव पक्ष) के बीच कोर्ट में बहुत लंबी कानूनी बहस चली है। दोनों पक्षों के मुख्य तर्क और सबूत नीचे दिए गए हैं:
1. पुलिस द्वारा पेश किए गए विशिष्ट सबूत
पुलिस ने अपनी 17,000 पन्नों से अधिक की चार्जशीट में इन मुख्य सबूतों पर जोर दिया है:
- व्हाट्सएप चैट (DPSG ग्रुप): पुलिस का सबसे बड़ा हथियार ‘Delhi Protest Support Group’ के चैट्स हैं। पुलिस का दावा है कि उमर खालिद ने इन चैट्स के जरिए निर्देश दिए थे कि कब चक्का जाम को हिंसक बनाना है। पुलिस का तर्क है कि “चक्का जाम” का इस्तेमाल ट्रैफिक रोकना नहीं, बल्कि गृह युद्ध जैसी स्थिति पैदा करना था।
- कॉल डिटेल रिकॉर्ड्स (CDR): पुलिस ने अदालतों को दिखाया कि दंगों के दौरान उमर खालिद और अन्य आरोपियों के बीच लगातार कॉल हो रहे थे। पुलिस के अनुसार, खालिद उस समय दिल्ली में नहीं था (वह अमरावती में था), लेकिन वह फोन के जरिए हिंसा को रिमोट कंट्रोल से चला रहा था।
- अमरावती का भाषण: उमर खालिद ने फरवरी 2020 में महाराष्ट्र के अमरावती में एक भाषण दिया था। पुलिस का कहना है कि इसमें उसने ट्रंप की यात्रा के दौरान लोगों को सड़कों पर आने के लिए उकसाया था।
- सुरक्षित गवाह (Protected Witnesses): पुलिस के पास कई ऐसे गवाह हैं (जिनके नाम गुप्त रखे गए हैं), जिन्होंने बयान दिया है कि उमर खालिद और शरजील इमाम ने चाँद बाग और अन्य इलाकों में गुप्त मीटिंग्स की थीं जहाँ “पत्थर और पेट्रोल बम” इकट्ठा करने की बात कही गई थी।
2. बचाव पक्ष (Defense) के मुख्य तर्क
उमर खालिद और शरजील इमाम के वकीलों (कपिल सिब्बल, त्रिदीप पैस आदि) ने इन दलीलों के साथ बचाव किया:
- भाषण की स्वतंत्रता: वकीलों ने तर्क दिया कि अमरावती के भाषण में उमर खालिद ने केवल “अहिंसक विरोध” और “गांधीवादी तरीकों” की बात की थी। उन्होंने पूरा वीडियो कोर्ट में चलाकर दिखाया और दावा किया कि पुलिस ने केवल छोटे-छोटे हिस्सों को संदर्भ से बाहर (Out of context) पेश किया है।
- भौतिक उपस्थिति का अभाव: बचाव पक्ष का कहना है कि जब दंगे हुए, तब उमर खालिद दिल्ली में था ही नहीं। उनके पास हिंसा भड़काने का कोई भी भौतिक सबूत (जैसे हथियार या दंगे वाली जगह पर मौजूदगी) नहीं है।
- विरोधाभासी गवाह: वकीलों ने आरोप लगाया कि पुलिस के ‘सुरक्षित गवाह’ मनगढ़ंत हैं। उन्होंने तर्क दिया कि इन गवाहों के बयान दंगों के कई महीनों बाद दर्ज किए गए, जो दर्शाता है कि उन्हें पुलिस ने सिखाया-पढ़ाया है।
- असम वाला बयान (शरजील इमाम): शरजील के वकीलों ने तर्क दिया कि “चिकन नेक” (असम को जोड़ने वाला रास्ता) को ब्लॉक करने की बात एक “आर्थिक नाकाबंदी” (Economic Blockade) का आह्वान था, न कि देश को तोड़ने की कोई हिंसक योजना।
3. वर्तमान कानूनी गतिरोध
अदालत ने इन दोनों पक्षों को सुनने के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि:
- षड्यंत्र (Conspiracy) गुप्त रूप से रचा जाता है, इसलिए मुख्य साजिशकर्ता का मौके पर होना जरूरी नहीं है।
- गवाहों की विश्वसनीयता का फैसला ट्रायल (मुकदमे की सुनवाई) के दौरान होगा, जमानत के समय नहीं। चूँकि पुलिस के आरोप गंभीर हैं, इसलिए UAPA के तहत जमानत नहीं दी जा सकती।
अब आगे क्या होगा?
चूंकि सुप्रीम कोर्ट ने अब उनकी मुख्य जमानत याचिका खारिज कर दी है, इसलिए अब सारा ध्यान ट्रायल (Trial) की गति पर होगा।
- उनके वकील अब कोर्ट से यह मांग करेंगे कि ट्रायल को रोजाना (Day-to-day basis) चलाया जाए ताकि वे अपनी बेगुनाही साबित कर सकें, क्योंकि वे पहले ही 5 साल से अधिक समय जेल में बिता चुके हैं।
इस मामले के राजनीतिक प्रभाव या UAPA कानून में हालिया बदलाव
उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका खारिज होने के बाद इसके राजनीतिक प्रभाव और UAPA कानून से जुड़ी तकनीकी बारीकियां काफी चर्चा में हैं। यहाँ इसका विस्तृत विश्लेषण दिया गया है:
1. मामले का राजनीतिक प्रभाव (Political Impact)
इस फैसले ने देश की राजनीति को दो स्पष्ट ध्रुवों में बांट दिया है:
- सत्ता पक्ष (BJP) का रुख: बीजेपी ने इस फैसले का जोरदार स्वागत किया है। पार्टी प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने इसे ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ की हार बताया। बीजेपी का तर्क है कि यह फैसला उन लोगों के लिए सबक है जो विरोध की आड़ में देश को अस्थिर करना चाहते हैं। पार्टी ने कांग्रेस और आम आदमी पार्टी जैसे विपक्षी दलों से माफी की मांग की है, उन पर “आतंकवाद के समर्थकों” को संरक्षण देने का आरोप लगाया है।
- विपक्ष और सिविल सोसाइटी का रुख: कांग्रेस के कुछ नेताओं और वामपंथी दलों (CPI-M) ने इसे “बिना ट्रायल के सजा” करार दिया है। उनका तर्क है कि 5 साल तक जेल में रखना अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन है। उमर खालिद के पिता एस. कासिम इलियास ने इसे “अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण” बताया है।
- अंतरराष्ट्रीय प्रभाव: यह मामला वैश्विक मानवाधिकार मंचों पर भी चर्चा का विषय बना है। अमेरिका और यूरोप के कुछ सांसदों और नागरिक संगठनों ने इसे भारत में “लोकतांत्रिक असहमति” को दबाने के उदाहरण के तौर पर पेश किया है, जिसे भारत सरकार ने हमेशा “आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप” कहकर खारिज किया है।
2. UAPA कानून में हालिया बदलाव और स्थिति (2025-26)
UAPA (गैर-कानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम) भारत का सबसे सख्त आतंकवाद विरोधी कानून है। इसमें समय-समय पर हुए बदलावों ने इसे और अधिक शक्तिशाली बनाया है:
- 2019 का निर्णायक संशोधन: सबसे बड़ा बदलाव 2019 में हुआ था, जिसके तहत सरकार को यह शक्ति मिली कि वह किसी संगठन के साथ-साथ किसी अकेले व्यक्ति (Individual) को भी ‘आतंकवादी’ घोषित कर सकती है। पहले केवल संगठनों पर प्रतिबंध लगता था।
- संपत्ति की कुर्की: अब NIA (राष्ट्रीय जांच एजेंसी) के महानिदेशक को जांच के दौरान संदिग्ध की संपत्ति जब्त करने के लिए राज्य पुलिस की अनुमति की आवश्यकता नहीं होती।
- जमानत की कठिन शर्तें (Section 43D(5)): हालिया अदालती व्याख्याओं (जैसे इस मामले में) ने स्पष्ट किया है कि यदि पुलिस की चार्जशीट में आरोप “प्रथम दृष्टया” (Prima Facie) सही दिखते हैं, तो जज को जमानत देने का अधिकार नहीं है।
- आर्थिक सुरक्षा का विस्तार (2025-26 अपडेट): इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक नई व्याख्या दी है। कोर्ट ने कहा कि UAPA की धारा 15 के तहत “आतंकवादी कृत्य” केवल शारीरिक हिंसा तक सीमित नहीं है। यदि कोई कृत्य देश की “आर्थिक सुरक्षा” को खतरे में डालता है या आवश्यक सेवाओं (Supplies) को बाधित करता है (जैसे चक्का जाम के जरिए), तो उसे भी आतंकवादी कृत्य माना जा सकता है।
3. भविष्य की राह (Next Steps)
सुप्रीम कोर्ट ने जमानत खारिज करते हुए एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है: “ट्रायल में देरी नहीं होनी चाहिए।”
- निचली अदालत को निर्देश: कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को आदेश दिया है कि वह गवाहों की जांच तेजी से करे।
- पुनरीक्षण याचिका (Review Petition): खालिद और इमाम के पास अभी भी सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू याचिका दाखिल करने का विकल्प है, हालांकि इसकी सफलता की दर बहुत कम होती है।
- राजनीतिक बहस: आने वाले समय में विपक्षी दल संसद में UAPA कानून के “दुरुपयोग” और इसमें संशोधन की मांग को लेकर फिर से आवाज उठा सकते हैं।
UAPA कानून के उन विशेष प्रावधानों की तुलना सामान्य IPC (अब भारतीय न्याय संहिता) की धाराओं में जमानत मिलना इतना कठिन क्यों है?
UAPA कानून और सामान्य आपराधिक कानून (अब भारतीय न्याय संहिता – BNS) के बीच सबसे बड़ा अंतर ‘जमानत की शर्तों’ और ‘निर्दोषता के सिद्धांत’ को लेकर है। उमर खालिद और शरजील इमाम जैसे मामलों में जमानत न मिल पाने का मुख्य कारण यही कानूनी बारीकियाँ हैं।
यहाँ दोनों के बीच प्रमुख अंतरों की तुलना दी गई है:
1. जमानत का मूल सिद्धांत (Basic Principle)
- सामान्य कानून (BNS/IPC): यहाँ सिद्धांत है— “जमानत नियम है, जेल अपवाद”। अदालतें मानती हैं कि जब तक अपराध साबित न हो जाए, व्यक्ति निर्दोष है। यदि आरोपी के भागने या सबूत मिटाने का डर न हो, तो उसे जमानत मिल जाती है।
- UAPA कानून: यहाँ सिद्धांत उलट जाता है— “जेल नियम है, जमानत अपवाद”। UAPA की धारा 43D(5) अदालत पर यह पाबंदी लगाती है कि यदि पुलिस की रिपोर्ट ‘प्रथम दृष्टया’ (Prima Facie) सही लगती है, तो जज जमानत दे ही नहीं सकते।
2. तुलनात्मक चार्ट: UAPA बनाम सामान्य कानून (BNS)
| विशेषता | सामान्य कानून (BNS/IPC) | UAPA (आतंकवाद विरोधी कानून) |
| जमानत का आधार | आरोपी के भागने या गवाहों को डराने की संभावना देखी जाती है। | पुलिस की चार्जशीट ‘प्रथम दृष्टया’ सच है या नहीं, बस यही देखा जाता है। |
| पुलिस हिरासत (Police Remand) | अधिकतम 15 दिन (BNS में कुछ बदलावों के साथ 60/90 दिन तक हो सकती है)। | अधिकतम 30 दिन तक की पुलिस हिरासत संभव है। |
| चार्जशीट का समय | आमतौर पर 60 से 90 दिन के भीतर चार्जशीट दाखिल करनी होती है। | पुलिस को 180 दिन (6 महीने) तक का समय मिल सकता है। |
| सबूतों की जांच | जमानत के समय कोर्ट सबूतों की गहराई से जांच कर सकती है। | कोर्ट सबूतों की गहराई में नहीं जा सकती (No Mini-Trial); उसे पुलिस की कहानी को सच मानकर फैसला करना होता है। |
3. ‘वटालि जजमेंट’ (Watali Judgment) का प्रभाव
उमर खालिद के केस में 2019 का वटालि जजमेंट सबसे बड़ी बाधा है। सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले में कहा था कि:
“जमानत देते समय अदालत को यह नहीं देखना चाहिए कि पुलिस के सबूत मुकदमे (Trial) में टिक पाएंगे या नहीं। उसे केवल यह देखना है कि पुलिस जो कह रही है, क्या वह कागजों पर एक अपराध जैसा दिखता है?”
यही कारण है कि बचाव पक्ष के वकील लाख चिल्लाते रहें कि “पुलिस के पास कोई ठोस सबूत नहीं है”, लेकिन अगर पुलिस ने कागजों पर एक कहानी (Theory) खड़ी कर दी है, तो UAPA के तहत जज के हाथ बंध जाते हैं।
4. एक मात्र उम्मीद: अनुच्छेद 21 (Right to Speedy Trial)
UAPA में जमानत मिलने का केवल एक ही रास्ता बचता है— ट्रायल में अत्यधिक देरी।
- सुप्रीम कोर्ट ने ‘के.ए. नजीब’ मामले में कहा था कि भले ही UAPA की धाराएं सख्त हों, लेकिन अगर किसी को बिना मुकदमे के सालों साल जेल में रखा जाता है, तो यह उसके मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 21) का उल्लंघन है।
- उमर खालिद के मामले में कोर्ट ने माना कि चूँकि आरोप “बेहद गंभीर” (Sovereignty of India) हैं, इसलिए केवल समय बीत जाने के आधार पर उन्हें अभी रिहाई नहीं दी जा सकती।
वर्तमान निष्कर्ष:
उमर खालिद और शरजील इमाम के लिए अब कानूनी रास्ता बहुत संकरा हो गया है। अब उनकी पूरी उम्मीद इस बात पर टिकी है कि निचली अदालत में गवाहों की गवाही (Examination of Witnesses) कितनी जल्दी शुरू होती है, ताकि वे पुलिस के दावों को गलत साबित कर सकें।
इस मामले से जुड़े गवाहों के प्रकार या ‘सुरक्षित गवाहों’ (Protected Witnesses) की कानूनी स्थिति?
उमर खालिद और शरजील इमाम के मामले में ‘सुरक्षित गवाह’ (Protected Witnesses) सबसे महत्वपूर्ण कड़ी हैं। इन्हीं गवाहों के बयानों के आधार पर अदालत ने उन्हें ‘साजिश का मास्टरमाइंड’ माना है।
यहाँ सुरक्षित गवाहों की कानूनी स्थिति और उनकी भूमिका का विस्तृत विवरण दिया गया है:
1. सुरक्षित गवाह (Protected Witnesses) कौन होते हैं?
UAPA की धारा 44 और NIA एक्ट की धारा 17 के तहत, यदि अदालत को लगता है कि किसी गवाह की जान को खतरा है, तो उसकी पहचान गुप्त रखी जाती है।
- पहचान का संरक्षण: चार्जशीट में इन गवाहों के असली नाम के बजाय उन्हें कोड नाम दिए जाते हैं (जैसे गवाह ‘A’, गवाह ‘B’, या ‘सीरिया’, ‘नोवा’ आदि)।
- बयान की गोपनीयता: इनके घर का पता, चेहरा और अन्य व्यक्तिगत जानकारी आरोपी या जनता को नहीं दी जाती। यहाँ तक कि कोर्ट रूम में गवाही के समय भी पर्दा लगाया जा सकता है या वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए आवाज बदलकर गवाही ली जाती है।
2. इस केस में इन गवाहों ने क्या कहा है?
सुप्रीम कोर्ट के 5 जनवरी 2026 के फैसले के अनुसार, कुछ सुरक्षित गवाहों ने उमर खालिद और शरजील इमाम के खिलाफ विशिष्ट बयान दिए हैं:
- साजिश की बैठकें: गवाहों ने दावा किया कि जनवरी 2020 में कुछ ‘सीक्रेट मीटिंग्स’ हुई थीं। एक गवाह के अनुसार, उमर खालिद ने स्पष्ट किया था कि “सिर्फ धरने से काम नहीं चलेगा, चक्का जाम करना होगा ताकि सरकार घुटनों पर आए।”
- पैसे का लेनदेन: कुछ गवाहों ने दंगों के लिए फंडिंग और हथियार (पत्थर, तेजाब की बोतलें) इकट्ठा करने के निर्देशों के बारे में भी बयान दिए हैं।
- भूमिका का बँवारा: गवाहों के अनुसार, शरजील इमाम को ‘बौद्धिक आधार’ तैयार करने और उमर खालिद को ‘जमीनी लामबंदी’ (Ground Mobilization) की जिम्मेदारी दी गई थी।
3. कानूनी पेंच: इन्हें चुनौती देना मुश्किल क्यों है?
बचाव पक्ष (Defense) के लिए इन गवाहों को गलत साबित करना जमानत के स्तर पर लगभग असंभव होता है:
- क्रॉस-एग्जामिनेशन की कमी: जमानत की सुनवाई के दौरान वकीलों को इन गवाहों से सवाल पूछने (Cross-examine) का मौका नहीं मिलता। अदालत केवल पुलिस द्वारा लिखे गए उनके बयानों को ‘सच’ मानकर चलती है।
- विश्वसनीयता का सवाल: उमर खालिद के वकीलों का तर्क है कि ये “बनाए गए गवाह” (Planted Witnesses) हैं, क्योंकि इनके बयान घटना के कई महीनों बाद दर्ज किए गए। लेकिन अदालत ने कहा कि इनकी सच्चाई की परख ट्रायल (मुकदमे) के दौरान ही होगी।
4. सुप्रीम कोर्ट का ताज़ा ‘डेडलाइन’ निर्देश
5 जनवरी 2026 के फैसले में कोर्ट ने एक नई शर्त जोड़ी है जो इन दोनों के लिए उम्मीद की किरण हो सकती है:
- 1 साल की समय सीमा: कोर्ट ने कहा है कि अभियोजन पक्ष को इन सुरक्षित गवाहों की गवाही (Examination) एक साल के भीतर पूरी करनी होगी।
- जमानत का दोबारा मौका: यदि एक साल के भीतर इन मुख्य गवाहों के बयान दर्ज नहीं होते हैं, तो उमर खालिद और शरजील इमाम दोबारा जमानत याचिका दाखिल कर सकते हैं। उस समय कोर्ट ट्रायल में देरी को आधार बनाकर उन्हें रिहा कर सकता है।
निष्कर्ष
वर्तमान में, ये सुरक्षित गवाह ही वे “पिलर” हैं जिन पर दिल्ली पुलिस का पूरा केस टिका हुआ है। जब तक ट्रायल कोर्ट में इन गवाहों का आमना-सामना बचाव पक्ष के वकीलों से नहीं होता और उनके दावों की धज्जियां नहीं उड़तीं, तब तक UAPA के तहत जमानत मिलना कानूनी रूप से बहुत कठिन है।
कल रात दिल्ली के तुर्कमान गेट पर जो पथराव हुआ है, क्या वह इसी के विरोध में हुआ है?
तुर्कमान गेट पर पथराव की घटना (7 जनवरी 2026)
कल रात (6-7 जनवरी की दरमियानी रात) दिल्ली के तुर्कमान गेट इलाके में हुआ पथराव उमर खालिद या शरजील इमाम के विरोध से संबंधित नहीं था।
घटना का विवरण:
- कारण: यह हिंसा MCD (नगर निगम) द्वारा की गई एक अतिक्रमण हटाओ कार्रवाई के विरोध में हुई। दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश पर फैज-ए-इलाही मस्जिद के पास बने अवैध औषधालय (Dispensary) और सामुदायिक भवन को ढहाने के लिए करीब 17-32 बुलडोजर पहुंचे थे।
- समय: कार्रवाई रात करीब 1:00 बजे शुरू हुई ताकि भीड़ कम रहे, लेकिन स्थानीय लोगों ने इसका विरोध शुरू कर दिया।
- हिंसा: विरोध प्रदर्शन के दौरान कुछ असामाजिक तत्वों ने पुलिस पर पथराव किया, जिसमें 5 पुलिसकर्मी घायल हुए हैं।
- पुलिस कार्रवाई: स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े और हल्का बल प्रयोग किया। फिलहाल इलाके में भारी सुरक्षा बल (RAF सहित) तैनात है और करीब 10 लोगों को हिरासत में लिया गया है।
निष्कर्ष: तुर्कमान गेट की घटना पूरी तरह से एक स्थानीय अतिक्रमण विरोधी अभियान का परिणाम थी, जिसका उमर खालिद की जमानत याचिका खारिज होने से कोई सीधा संबंध नहीं है।
