संदीप देव। 5 नवंबर 2025, दिन बुधवार को कार्तिक पूर्णिमा थी। इसी दिन महादेव ने भगवान विष्णु को अपना बाण बनाकर त्रिपुरासुर का वध किया था। इसी कारण महादेव त्रिपुरारी कहलाए। त्रिपुरासुर के मारे जाने की प्रसन्नता में देवताओं ने काशी में दिवाली मनाई थी, इसी लिए कार्तिक पूर्णिमा को देव दीपावली मनाई जाती है। यह दिन इतना पवित्र है कि आदि शंकराचार्य जी ने आज से 2500 वर्ष पूर्व इसी दिन कैलाश पर समाधि लेकर अपने शरीर का त्याग किया था।
हमारे गांव के एक चाचा की मृत्यु के कारण शूतक से हम उबरे थे। इसलिए काफी दिनों बाद 5 नवंबर को मैंने संपूर्ण विष्णु सहस्रनाम का पाठ किया था। बुधवार का दिन भगवान विष्णु से जुड़ा है, क्योंकि बुध के अधिदेवता भगवान विष्णु ही हैं। शूतक उतरने पर उधर गांव में भी मेरे पिताजी ने बहुत दिनों बाद गोसाईं बाबा (कुल देवता) को लीप कर उनकी पूजा की थी और रामरक्षा स्त्रोत्र का पाठ किया था।
5 नवंबर को ही वह मोटरसाइकिल पर बैठकर गांव में अपने प्रियजनों से मिलने गये, उनके साथ गपशप किया। गांव के राम-जानकी मंदिर (ठाकुरबाड़ी ) में डेढ़ घंटे रहे। वहां के महंत जी से वार्ता की। दो दिन पूर्व ही काली माता मंदिर में घंटों मां को निहारते उनके समक्ष खड़े रहे। वह बहुत खुश थे। जब से मैंने उन्हें रामरक्षा स्तोत्र पढ़ने को कहा था, वो अवसर मिलने पर इसका पाठ अवश्य करते थे।
इधर दिल्ली में देव दीपावली की शुभता को देखते हुए मेरा पूरा परिवार आगामी 16 नवंबर को ‘कुरुक्षेत्र धर्मालंकरण’ समारोह से संबंधित खरीददारी करने के लिए बाजार निकला हुआ था।
अचानक मेरी मम्मी का फोन आया। उस समय शाम के 4.54 बज रहे थे। फोन पर मम्मी के साथ पिताजी भी थे। दोनों हम लोगों से इसी तरह बात करते थे। एक साथ ही दोनों बात करते थे। मां ने अपनी वज्जिका भाषा में कहा, जिसका हिंदी अनुवाद यह है कि ‘पिताजी कह रहे हैं कि आज के वीडियो में तुम्हारी आंख में नींद भरी हुई लग रही है। पर्याप्त रूप से सोते क्यों नहीं हो?’ फिर मां ने मोरारी बापू द्वारा मेरे वीडियो के विरुद्ध भेजे नोटिस का जिक्र करते हुए कहा कि ‘बेटा सभी के बारे में खुलासा मत किया करो! सब दुश्मन बन जाएंगे।’ इस पर पीछे से पिताजी ने मेरे लिए कहा, ‘वह पत्रकार है। उसका काम सच बताना है, जो वह कर रहा है।’ इस पर मां ने पिताजी से कहा, ‘आपने पूरी जिंदगी तो किसी से कुछ कहा नहीं, मेरे बेटे को भड़काते हैं? दोनों की यह नोंक-झोंक सुनकर हंसते हुए मैंने कहा, ‘मां पिताजी को कुछ मत कहिए। वो अपने समय नहीं बोले, लेकिन आज जो मैं बोल रहा हूं, वह एक तरह से वही बोल रहे हैं, क्योंकि शास्त्रों में कहा गया है कि पुत्र पिता की ही आत्मा होता है।’ मां-पिताजी के साथ मेरी बातचीत करीब 20 मिनट चली।
इस बातचीत के कुछ मिनट बात ही शाम 5.33 पर मां का दोबारा फोन आया। वह कई बार कुछ भूल जाती है तो दोबारा फोन करती है। मैंने सोचा कि फिर कुछ भूल गई होगी। मैंने फोन उठाया, मां चीखते हुए बोली, ‘बउआ पिताजी खत्म हो गेलखुन ( बेटा पिताजी नहीं रहे)। वो गिरलखुन और खत्म हो गेलखुन। अनील चाचा के फोन कर।’
मुझे लगा कि पिताजी गिर गये हैं शायद। मां बदहवासी में कह रही कि वह खत्म हो गये। मैंने अनिल चाचा (उम्र में वह मेरे पिताजी के बाद दूसरे नं पर हैं) को फोन किया और कहा कि पिताजी को कुछ हो गया है, आप मां के पास पहुंचिए। फिर मैंने अपने गांव के ड्राइवर रणजीत को फोन किया। वह बोला अभी घर जाता हूं। फिर मेरी धर्मपत्नी Shweta Deo ने ग्रामीण अवधेश जी को फोन किया। अवधेश जी ने कहा कि हम सभी यहीं हैं। भाईजी को हार्ट अटैक आया है। लोग भाईजी की छाती को पंप कर रहे हैं, वह उठ नहीं रहे। मेरी पत्नी रोने लगी।
मुझे अभी भी विश्वास नहीं हो रहा था कि कुछ मिनट पहले ही मैंने पिताजी से बात की है। उन्हें कोई बीमारी भी नहीं है। हर साल एक बार मां-पिताजी दिल्ली आते हैं और उन दोनों का सारा टेस्ट हम लोग करवाते हैं। मां तो बीमार भी है, परंतु पिताजी तो हमेशा स्वस्थ रहे। अभी भी ह्दय की जांच में उनका ह्दय एकदम स्वस्थ था, फिर उनको हार्ट अटैक कैसे आ सकता है? ह्दय की सारी धमनियां स्वस्थ थी, बीपी-सुगर सभी नॉर्मल है, फिर यह कैसे हुआ? इतने में ड्राइवर रणजीत का फोन आया। वह रो रहा था। उसने कंफर्म किया कि पिताजी नहीं रहे! मैं जड़वत हो गया। लेकिन बड़ा हूं, इसलिए स्वयं को संयत करते हुए पहले छोटे भाई Amardeep Deo को फोन किया और बताया कि पिताजी नहीं रहे! घर चलना है। वह रोने लगा।
हम दोनों भाई सपरिवार गाड़ी से घर के लिए तत्काल निकले । एक गाड़ी रोते हुए अमरदीप चला रहा था। दूसरी गाड़ी रोते हुए जिज्ञासु चला रहा था। जिज्ञासु अपने आंसू को दबाए हुए सुबकता रहा रास्ते भर। इसका असर यह हुआ कि अपने दादाजी का शव देखने के उपरांत श्मशान में वह बेहोश हो गया। उसे किसी तरह होश में लाया जा सका।
मैं किसी तरह अपने आंसू को रोकने का प्रयास करते हुए गांव में अनिल चाचा, चचेरे भाई मिक्कू, अंशु, मौसी सभी को फोन किया। अब चिंता मां की थी, जो घर में अकेली थी। अभी कुछ दिन पहले दिवाली के दिन उनका सूगर 25 पर आ गया था और मरते-मरते बची थी। वह पिताजी को भी पहचान नहीं रही थी। पिताजी थे, जिन्होंने डाक्टर बुला कर ग्लूकोज आदि चढवा कर मां को बचा लिया था। लेकिन मां तो ऐसे समय में कुछ नहीं कर सकती। उसके पास तो कोई नहीं है। वह तो ठीक से किसी को फोन भी नहीं मिला पाती। इसलिए मैंने सभी को इसकी सूचना दी और सभी को मां के पास पहुंचने के लिए कहा। सभी मां के पास पहुंच गये।
मां को अभी भी विश्वास नहीं हो रहा था कि पिताजी चले गये! वह उनके शव से लिपटी हुई उन्हें उठाने की कोशिश कर रही थी और रोती जा रही थी। वह पूरी रात पिताजी के शव से लिपटी रही। मेरी चचेरी बहन रोमी को मेरी पत्नी ने फोन कर दिया था। वह अपने ससुराल से पहुंच गयी। सारी रात वही मां को संभालती रही। चचेरे भाई-बहन मिलाकर हम सात भाई में एकलौती बहन रोमी ने अपना पूरा फर्ज निभाया।
अगली सुबह हो गई थी। हमारी गाड़ी घर की ओर बिना रुके बेतहाशा भागती जा रही थी। मेरे चचेरे भाई मिक्कू का फोन आया कि चाची चच्चा के शव को छोड़ ही नहीं रही हैं। उन्हें मरे हुए 12 घंटे से अधिक हो चुके हैं। शव को घर से बाहर निकालना जरूरी है। अपने आंसू को दबाए-दबाए मैंने कहा, मैं दोपहर 12 बजे तक पहुंच जाऊंगा। मां को पिताजी के साथ रहने दो। तुम तब तक अंतिम संस्कार की सारी तैयारी कर लो। मेरे आने तक मां को पिताजी से दूर मत करना!
घर हम दोपहर 12 बजे के करीब पहुंच गये। पिताजी को देखकर मुझे लगा ही नहीं कि वह गुजर चुके हैं। उनके चेहरे पर एक अपूर्व शांति थी। जैसे वह सोते थे, वैसे ही सोए हुए थे। आंखें बंद थी। मेरा ह्दय फट पड़ा। अपने पिता-मां दोनों से लिपट कर मेरे दबे हुए आंसू बह निकले। बदहवासी में मैं पिताजी को झकझोरने लगा कि शायद यह उठ जाएं, लेकिन उन्हें नहीं उठना था तो वह नहीं उठे। मेरा बेटा जिज्ञासु अपनी आंसू को दबाए मुझे अपनी बाहों में समेटने का प्रयास कर रहा था।
मुझे महसूस हो रहा था कि मैं अनाथ हो चुका हूं। मेरी मां ने कहा कि बेटा तुम दोनों भाई को यह अनाथ बना कर चले गये। मेरा भाई अमरदीप, बेटा जिज्ञासु, भतीजा लप्पू, श्वेता देव और Minu Deo सहित वहां मौजूद सभी रो रहे थे।
मैंने पिताजी का चेहरा टलोलते-टटोलते उनके आज्ञाचक्र को टटोला। वह कठोर था। फिर उनके कपाल का बीच वाला भाग अर्थात् मूर्द्धा छुआ। मस्तिष्क का वह हिस्सा सामान्यत: कठोर होता है, लेकिन उनका एकदम मुलायम पड़ चुका था। साथ ही मूर्द्धा का वह हिस्सा अन्य हिस्सों से अलग रक्त सदृश्य लाल था। शायद उनकी आत्मा ने वहीं से उनका शरीर छोड़ा था! मस्तिष्क का वह हिस्सा जिसे सहस्रार कहा जाता है, वहां से उनकी आत्मा ने प्रस्थान किया था, यह तो मोक्ष का अर्थात् जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति का संकेत है!
गरुड़ पुराण में लिखा है, “भक्तजनों एवं भोगों में अनासक्त जनों की उदान वायु ऊर्ध्वगतिवाला हो जाता है।.. उन्हें सुखपूर्वक मृत्यु की प्राप्ति होती है।” यह पिताजी के लिए सुखद मृत्यु ही तो थी, बिना तकलीफ, बिना किसी पर आश्रित हंसते हुए, चलते हुए सेकेंड से भी कम समय में मृत्यु! और प्राण की गति भी ऊर्ध्व था! समझते देर नहीं लगी कि सदा सत्य बोलने और सरल जीवन जीने वाले मेरे पिता जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो चुके हैं।
मेरे पिता बेहद सरल, धार्मिक और ईश्वर के प्रति आस्थावान थे। मुझे याद नहीं पड़ता कि उन्होंने कभी झूठ बोला हो। उन्होंने अनेकों पर उपकार किया था। अनेक लोग उनका धन दबाकर बैठ गये, लेकिन उन्होंने कभी किसी का बुरा नहीं चाहा। गांव-बाहर के जो लोग भी उनकी मृत्यु पर आए, रोते हुए यही कहते थे कि वह एक पवित्र आत्मा थे। लोग मेरे पिता द्वारा उन पर किए उपकार को याद कर रहे थे और कह रहे थे, “ऐसी पवित्र आत्मा को ही ऐसी क्षणिक मृत्यु आ सकती है। काश हम सभी की भी ऐसी मृत्यु हो!” जिन लोगों ने मेरे पिता से आकारण द्वेष पाल रखा था, वह भी आकर कह रहे थे कि हमने भले इनका बहुत कुछ बिगाड़ा हो, इन्होंने कभी हमारा कुछ अहित नहीं किया।
बाद में मैंने अपने पिता की मृत्यु की एक मात्र गवाह मेरी मां से पूछा कि अचानक मुझसे बात करने के उपरांत यह कैसे हुआ? उन्होंने बताया, ‘तुमसे बात करके वह थोड़ी देर लेटे रहे। फिर पेशाब करने गये। लिक्विड से हाथ धोया। फिर हंसते हुए कहने लगे तुम्हारे बारे में कि ‘वह बेटा मेरा है या तुम्हारा?’ मैंने कहा, ‘दोनों का है।’ ‘परंतु वह बात तो मुझसे अधिक तुमसे करता है!’ मां को यह कहकर चिढ़ाते हुए वह खूब हंसे! बहुत दिनों बाद वह खूब खिलखलिकर हंसे थे!
सन्ध्या का समय था, इसलिए कहने लगे कि ‘आज देव दीपावली है। बाहर जाकर लाईट जला देता हूं।’ हंसते हुए लाईट जलाने के लिए उन्होंने दरवाजे का गेट खोला कि धड़ाम से आवाज आई। मां ने उनसे ही कहा कि क्या गिरा? आवाज सुनकर बाहर दरवाजे पर मां आई तो देखा पिताजी गिरे पड़े हैं। गेट के अंदर ही उनका सिर उत्तर की तरफ और पैर दक्षिण की ओर था। उनकी आंखें और मुंह बंद था। गिरने के बाद भी सिर आदि पर कहीं कोई चोट का निशान नहीं था। जब उनकी आत्मा ने शरीर छोड़ा तो गोधुलि बेला थी। गोधुलि बेला में आत्मा का प्रस्थान शास्त्रों में शुभ माना गया है।
मां रोने लगी। उनके शरीर को हिला डुला कर कहने लगी, ‘ हे उठु न! की भेल?’ (आप उठिए न! क्या हुआ) मां छटपटा कर चीत्कार करने लगी। उस समय उनके पास कोई नहीं था। गांव के कुछ लोग मां के रोने की आवाज सुनकर दौड़े आए। जमीन पर गिरे मेरे पिता की छाती को पंप करने लगे, मुंह से आक्सीजन देने लगे, परन्तु प्राण तो उनके गिरने से पहले ही शरीर को छोड़ चुका था, इसलिए उनके शरीर में कोई स्पंदन नहीं हुआ। गांव का डाक्टर आया, उसने मां से अलग हटकर सभी को बताया कि अशोक भाई नहीं रहे!
यह कैसे हुआ यह किसी को समझ नहीं आया तो सभी ने कहा कि हृदयाघात हुआ है। मेडिकल भाषा में यही कहा जाता है। परन्तु हृदयाघात का कोई निशान नहीं था। कोई दर्द, कोई छटपटाहट कुछ नहीं थी। प्राण निकला, वह गिरे, बस इतना ही हुआ! दरवाजा खोलते ही जैसे सेकेंड के 100 वें हिस्से में उनका प्राण सहस्रार से निकल चुका था।
मृत्यु के बाद जैसे उत्तर सिर और दक्षिण पैर कर शव को रखा जाता है, वह स्वयं ही गिर कर उस स्थिति में आ चुके थे। इसके लिए भी किसी की सहायता नहीं ली। आखिरी समय में एक बूंद पानी तक किसी से नहीं मांगा और दुनिया को अलविदा कह दिया! न उनकी आंखों में कहीं आंसू था, न मुंह में कोई झाग। वह सुकून से लेटे हुए अभी भी शांतचित्त मुस्कुरा रहे थे!
उन्हें देखने के लिए आने वाले सभी यही कह रहे थे कि ऐसी आसान मृत्यु उन्होंने आज तक नहीं देखी! काश ऐसी मृत्यु हम सभी को आए। महान्यायविद पी.एन.मिश्र जी को जब पता चला तो उन्होंने कहा कि ‘संदीप जी, वह विशुद्ध आत्मा थे। ऐसी मृत्यु तो बड़े-बड़े योगियों को नहीं मिलती। मूर्द्धा से प्राण निकले, इसलिए हिमालय में बड़े-बड़े योगी हठ योग तक करते हैं, तो भी इतनी सहज मृत्यु नहीं घटती। बिना अस्पताल गये, बिना किसी से कोई सेवा-सुश्रुषा करवाए एक गृहस्थ की इतनी सहज मृत्यु हुई है, यह साधारण बात नहीं है। यह सीधा मोक्ष है।
ज्योतिष्पीठाधीश्वर स्वामीश्री शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज को जब पता चला तो उन्होंने मुझे ढ़ाढस बंधाया, धैर्य धारण करने की शिक्षा दी, अध्यात्म का ज्ञान दिया और अंत में कहा, “देवता आये देव दीपावली को और उन्हें अपने साथ ले गये।” शंकराचार्य जी ने कहा, ” देवता उनकी आगवानी के लिये दरवाजे पर खड़े थे और दरवाजा खोलते ही विमान पर विराजमान कर ले गये।”
पिताजी को तो देवता ले गये, वह हंसते हुए चले गये, परंतु मेरी मां के लिए लंबा दुख छोड़ गये। वह एक दिन भी कभी उनसे दूर नहीं रही। वो लगातार रो रही है। कर्मकांड में मुझे प्रेत वस्त्र (कफन) में देखकर वह चीत्कार उठती है कि ‘इतनी कम उम्र में मेरे बेटे पर यह विपदा आ गई।’ उनके दुख को देखकर लगता है कि पता नहीं वह भी कब तक जीवित रहेंगी? हम दोनों भाई और हमारा पूरा परिवार अनाथ हो गया! पता नहीं पिताजी क्यों इतनी जल्दी हमें छोड़कर चले गये। अभी तो उनकी आयु सिर्फ 70 वर्ष ही हुई थी।
हमारा गांव छूट गया। वह थे तो गांव जाने की बात से खुशी मिलती थी, अब किसके लिए गांव जाएंगे? अकेली मां को गांव में कैसे रहने दें? अब वह हमारे साथ रहेगी। अब गांव का घर सूना हो गया, हमारा जीवन सूना हो गया! पिता की मौत ने हम सभी का सहज जीवन एक झटके में समाप्त कर दिया। हम में से किसी का जीवन अब कभी सहज नहीं रहेगा। उन्हें याद करने और तिल-तिल मरने के अलावा हम सभी के वश में अब कुछ नहीं है।
पिताजी समझ नहीं आ रहा है कि आपके बिना हम सभी कैसे जीएं? भगवान श्रीहरि विष्णु ही अब हमारे पूरे परिवार को संभाले तो संभाले, अन्यथा हम बिखर चुके हैं!
