#संदीपदेव। परसों रात बिहार में जबरदस्त आंधी आई थी। मेरे गांव बरहेता में शिवालय के पास स्थित पीपल देवता (पीपल का पेड़) जड़ सहित उखड़ कर धाराशाई हो गये। यह पेड़ नहीं भी तो कम से कम 100-150 साल पुराना होगा। लोग इसकी तब से ही पूजा-अर्चना करते आ रहे हैं!
इतना पुराना पीपल का पेड़ आंधी को बर्दाश्त क्यों नहीं कर पाया? जानकारी जुटाने पर पता चला कि पिछले कुछ सालों में मेरे गांव सहित आसपास के करीब पांच गांवों के पीपल के बहुत पुराने पेड़ भी आंधी का शिकार होकर गिर चुके हैं।

मेरे एक बाबा हैं सुशील बाबा।
उन्होंने बताया कि पिछले कुछ सालों में सौंदर्यीकरण के नाम पर पीपल के पेड़ के आसपास कांक्रीट से घेर दिया गया, गेट लगा दिया गया, इससे वह सुंदर तो लगने लगा लेकिन पीपल की जड़ का फैलाव रुक गया। उसकी जड़ों का फैलाव रोकने के लिए उस पर सीमेंट, केमिकल आदि भी डाल दिया गया, जिसके कारण जड़ें मिट्टी छोड़ने लगी, वो कमजोर पड़ने लगी और फिर आंधी का शिकार हो गई। उन्होंने आसपास के पांच गांव के नाम बताए जहां ब्रह्मबाबा (ग्रामीण देवता) की मान्यता वाले पीपल के पेड़ भी उखड़ गये हैं।
बचपन से हम इस पेड़ को देखते आ रहे हैं, इसलिए इसे गिरा देखकर बड़ा दुख हो रहा है। गांव की हर जाति की महिलाएं धागा बांधकर यहां पूजा-अर्चना करती थी। हम लोग गांव से बाहर जाने के पहले यहां प्रणाम करने आते थे।

पीपल के पेड़ के पास स्थित हमारे गांव का शिवालय सन् 1843 ईस्वी में स्वर्गीय श्री बाबू रामदी हल देव जी के प्रयास से निर्मित हुआ था। इसका नाम श्री ‘108 रामेश्वरनाथ शिवालय’ है। इस शिवालय की बड़ी मान्यता है। अतः दूर-दूर से और हर जाति के लोग यहां दर्शन-पूजने करने और विवाह-उपनयन आदि में भोलेबाबा का आशीर्वाद लेने आते हैं। किसी की मृत्यु के उपरांत भी कुछ समय तक शव यहीं मंदिर के प्रांगण में शिव-शंकर के समक्ष रखा जाता है। मेरे पिताजी की जब मृत्यु हुई तो उनके शव को भी यहीं रखा गया था। इस मंदिर के पीछे ही एक पोखर है, जहां सभी धार्मिक क्रियाकलाप होते हैं। पास ही संकीर्तन भवन और नवनिर्मित दुर्गापूजा स्थान भी है। शिवालय के एकदम सामने मां पार्वती का मंदिर है।
भोलेनाथ और मां पार्वती की पूजा के बाद इस पीपल के पेड़ को भगवान विष्णु का प्रतीक मानते हुए लोग पूजते थे। मेरे गांव की सदियों पुरानी धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान से अभिन्न रूप से जुड़ा था यह पीपल का पेड़।

भगवद्गीता के दसवें अध्याय (विभूति योग) के 26वें श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा है: “अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां” अर्थात “मैं वृक्षों में पीपल (अश्वत्थ) का वृक्ष हूँ।”
गीता के 15वें अध्याय में संसार की तुलना भगवान एक उल्टे पीपल के वृक्ष से करते हैं, जिसकी जड़ें ऊपर (ईश्वर) और शाखाएं नीचे (संसार) हैं।
सनातन धर्म में पीपल को ब्रह्मा, विष्णु और महेश का निवास स्थान माना जाता है। वैज्ञानिक भी पीपल की महत्ता को स्वीकारते हैं। पीपल सबसे दीर्घजीवी वृक्ष है और यह रात-दिन ऑक्सीजन प्रदान करता है।
प्रकृति पूजा के जरिए सनातन हिन्दू समाज पीपल, बरगद आदि की पूजा करता रहा है। अफसोस है कि ‘विकास’ नामक महामारी सनातन प्रकृति पूजा को भी नष्ट करने लगी है। यह जो ‘विकास’ नामक कांक्रीट के जंगलों को बढ़ाने की महामारी गांव-गांव तेजी से फैल रही है, वह गांव के पारिस्थितिक तंत्र और देवता तक को निगल रही है। बिना जाने-समझे प्रकृति को कांक्रीट में बांधने का परिणाम चहुंओर साफ दिखने लगा है!
