सुमंत विद्वांस। पहले मंदिर निर्माण समिति का अध्यक्ष उस व्यक्ति को बनाया गया जो 1990 में कारसेवकों पर गोलीबारी के समय उप्र का मुख्य सचिव था।फिर मंदिर निर्माण और यहाँ तक कि गर्भगृह के निर्माण का अधिकांश ठेका भी अहिन्दुओं को दिया गया।
फिर मंदिर निर्माण पूरा होने से भी पहले केवल चुनावी फायदा पाने की नीयत से अधूरे मंदिर का ही उदघाटन कर लिया गया। उसमें भी कारसेवकों और उनके परिवार को पूरी तरह उपेक्षित करके हिन्दू धर्म का मजाक उड़ाने वाले और स्वयं को गर्व से गौमांस भक्षक बताने वाले फिल्मी सितारों को विशेष सम्मान से बिठाया गया।
मंदिर निर्माण के लिए सरकार की ओर से कुछ देना तो दूर, उल्टा समाज के द्वारा दिए जाने वाले दान में से भी चार सौ करोड़ का वार्षिक टैक्स सरकार वसूल रही है, जो हिन्दू धर्म को और श्रीराम को अपमानित करने वालों को ही मुफ्तखोरी की योजनाओं के द्वारा बांटा जाएगा।
इतना सब कम था कि जिस मंदिर के लिए समाज ने 550 वर्षों तक संघर्ष किया, जिसके लिए 150 वर्षों तक कानूनी लड़ाई लड़ी, जिसके निर्माण के लिए आम लोगों ने हजारों करोड़ का चंदा इकट्ठा करके दे दिया, जिस मंदिर को आज भी लगभग 700 करोड़ वार्षिक और 15 करोड़ मासिक चढ़ावा मिल रहा है, उस मंदिर के संचालकों ने अखंड ज्योति के नाम पर यह विचित्र वस्तु लगाई है।
समझ नहीं आता कि ये श्रीराम का अपमान किया जा रहा है या श्रद्धालुओं का मजाक उड़ाया जा रहा है। आप सरकार की और राजनेताओं की चापलूसी कीजिए। मेरे लिए श्रीराम और श्रीकृष्ण से बढ़कर कुछ नहीं है।
ये बताने की मूर्खता भी मत करना कि कांग्रेस या मुलायम के राज में क्या हो रहा था। कांग्रेस की गलत नीतियों का हम इससे भी ज्यादा विरोध करते थे, तभी आपके नेता 2014 में जीत पाए हैं, वरना 2003 में ही राजनीति से बाहर हो गए होते।
जिस मुलायम की आप बात करने वाले हैं, उसे पद्म विभूषण कांग्रेस ने नहीं दिया था और न ही कारसेवकों पर गोलीबारी के समय मुख्य सचिव रहे नौकरशाह को रिटायरमेंट से वापस बुलाकर प्रधानमंत्री कार्यालय का सचिव कांग्रेस ने बनाया था और न ही उसे राम मंदिर की निर्माण समिति का अध्यक्ष कांग्रेस ने बनाया था।
कांग्रेस के पाप अपनी जगह हैं, लेकिन उसके पापों को गिनाने से आपके पाप नहीं धुलेंगे। उसके पापों का घड़ा 2014 में ही फूट गया, इसीलिए आज तक सत्ता से बाहर है। एक दिन सबका हिसाब होगा। अमर कोई नहीं है और अपने कर्मों का फल भी सबको भुगतना ही पड़ता है। आप मेरी आलोचना करते रहिए, उससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। सादर!
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