इंडिया स्पीक डेली ब्यूरो। गाड़ियों के ईंधन में ‘हरित क्रांति’ लाने का प्रशासनिक जुनून आखिरकार आम नागरिक की रसोई पर भारी पड़ गया। जिस मुल्क में कुछ साल पहले तक करोड़ों टन चीनी निर्यात करने की डींगें हांकी जाती थीं, आज वह घरेलू बाजार में चीनी के दाम नियंत्रित करने के लिए 10 लाख टन कच्ची चीनी (रॉ-शुगर) आयात करने और स्टॉक लिमिट लगाने जैसी आपातकालीन जुगत भिड़ा रहा है। महज तीन महीनों में चीनी की कीमतों में आया 40% का उछाल (48 रुपये से बढ़कर 67 रुपये प्रति किलो) किसी प्राकृतिक आपदा का नतीजा नहीं, बल्कि अनियोजित प्राथमिकताओं और नीतिगत अदूरदर्शिता से पैदा किया गया कृत्रिम संकट है।
खंड-1
किसकी कीमत पर ‘बायोफ्यूल’ का जश्न?
आंकड़े साफ गवाही दे रहे हैं कि कैसे प्राथमिकताओं का तराजू गड़बड़ाया है:
*भोजन बनाम ईंधन का द्वंद्व: पिछले वर्ष 720 करोड़ लीटर एथेनॉल बनाने की होड़ में 25 लाख टन चीनी के बराबर गन्ना-शीरा और 1.33 करोड़ टन अनाज झोंक दिया गया।
*अनाज की छीना-झपटी और महंगाई की मार: मक्के और चावल की टुकड़ी को बायोफ्यूल की भट्ठी में झोंके जाने का असर केवल मीठे तक सीमित नहीं रहा। मक्के का आटा 11%, चावल 16% और गुड़ 24% तक महंगा हो गया। पशु और पोल्ट्री आहार पर संकट गहराने से दूध और अंडे के दाम 5-10% बढ़ गए। यानी आम परिवार के पोषण पर चारों तरफ से प्रहार हुआ।

*बफर स्टॉक की अनदेखी: घरेलू खपत के लिए जहां 50 लाख टन का ओपनिंग स्टॉक सुरक्षित माना जाता है, वहीं मिलों में यह घटकर महज 32 लाख टन रह गया।
*निर्यातक से आयातक बनने का पतन: 2022-23 में भारत 1.33 करोड़ टन चीनी व संबंधित उत्पादों का निर्यात करता था; आज हालात यह हैं कि वर्ष 2026-27 में निर्यात शून्य पर सिमट चुका है और विदेशी बाजारों से चीनी मंगाने की नौबत आ गई है।
आपातकालीन पैबंद और जमीनी हकीकत
बाजार में मचे हाहाकार के बाद सरकार ने 31 अक्टूबर तक शुल्क-मुक्त 10 लाख टन रॉ-शुगर आयात और थोक उपभोक्ताओं पर 15 दिन के स्टॉक की सीमा (स्टॉक लिमिट) थोप दी है। लेकिन कड़वा सच यह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में नवंबर से पहले ऐसी कच्ची चीनी की उपलब्धता न के बराबर है। जब विशेषज्ञ बीते तीन वर्षों से आगाह कर रहे थे कि अंधाधुंध एथेनॉल डायवर्जन खाद्य सुरक्षा के ताने-बाने को उलझा देगा, तब नीति-निर्माता आंकड़ों की बाजीगरी में व्यस्त रहे।
हरित ऊर्जा की आकांक्षा जरूरी हो सकती है, लेकिन जब विकास की रूपरेखा में एक गरीब परिवार की सुबह की चाय और बुनियादी निवाला छिनने लगे, तो सवाल उठना लाजिमी है—क्या ऊर्जा आत्मनिर्भरता की बुनियाद आम आदमी की भुखमरी और महंगाई पर रखी जाएगी? आपातकालीन आयात और थोक बंदिशें सिर्फ आग लगने के बाद कुआं खोदने की प्रशासनिक औपचारिकता हैं, उस बुनियादी भूल का इलाज नहीं जिसने पूरे देश के मुंह का स्वाद कड़वा कर दिया है।
नीतिगत विरोधाभास के कारण खाद्य सुरक्षा और पर्यावरण पर संकट
एथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम (EBP) को कच्चे तेल के आयात बिल में कटौती और कार्बन उत्सर्जन घटाने के अचूक हथियार के तौर पर प्रचारित किया गया। लेकिन व्यवहार में यह नीति एक ऐसे आर्थिक और पारिस्थितिकीय भंवर में फंस चुकी है, जहां प्राथमिकताओं का संतुलन पूरी तरह डगमगा गया है। चीनी की कीमतों में आग और आयात की नौबत सिर्फ इस गलत योजना का पहला लक्षण है; इसके पीछे कई गहरी नीतिगत विसंगतियां काम कर रही हैं।
एथेनॉल नीति की प्रमुख नीतिगत खामियां और विसंगतियां
*1G बायोफ्यूल पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता (Food vs. Fuel): दुनिया भर में बायोफ्यूल का टिकाऊ मॉडल ‘2G’ (पराली, कृषि अपशिष्ट और बगास) पर आधारित है। भारत में नीतिगत अक्षमता के चलते 2G संयंत्र सिर्फ कागजों और पायलट प्रोजेक्ट्स तक सिमटे रहे। सरकार ने आसान रास्ता चुनते हुए 1G यानी खाद्य फसलों—गन्ना, मक्का, टूटा चावल और खराब अनाज—को पूरी तरह ईंधन की भट्टी में झोंक दिया।
*पारिस्थितिकी और भूजल का भारी दोहन: गन्ना और धान दोनों ही ‘वॉटर-गजलिंग’ (अत्यधिक पानी की खपत वाली) फसलें हैं। एक लीटर एथेनॉल बनाने के लिए हजारों लीटर भूजल खर्च होता है। जिस देश के कई राज्य भूजल संकट से जूझ रहे हों, वहां गाड़ियों के लिए गन्ना उगाने की सरकारी सब्सिडी देना पर्यावरण के साथ सीधा खिलवाड़ है।
*कॉर्पोरेट मुनाफा बनाम आम उपभोक्ता का शोषण: एथेनॉल का यह ढांचा चीनी मिल मालिकों और बड़े डिस्टिलरी सिंडिकेट को ध्यान में रखकर तैयार किया गया। सरकार डिस्टिलरीज को निश्चित खरीद मूल्य और वित्तीय प्रोत्साहन देती है, जिससे मिलें घरेलू चीनी बाजार को संकट में डालकर शीरा और गन्ना एथेनॉल में झोंक देती हैं। मुनाफा कुछ चुनिंदा औद्योगिक घरानों की जेब में जाता है, जबकि महंगाई का बोझ आम नागरिक उठाता है।
*वाहन निर्माताओं और ग्राहकों पर अदृश्य बोझ: E20 (20% एथेनॉल मिश्रण) के लक्ष्य को साधने की हड़बड़ी में मौजूदा वाहनों की सेहत को नजरअंदाज किया गया। पुराने वाहनों के इंजन, रबर पार्ट्स और ईंधन लाइनों पर एथेनॉल का संक्षारक (corrosive) असर पड़ता है, जिससे माइलेज गिरता है और मरम्मत का खर्च आम वाहन चालक की जेब से निकलता है।
*आयात-निर्यात का विरोधाभासी चक्रव्यूह: एक तरफ विदेशी मुद्रा बचाने के नाम पर एथेनॉल बनाया जा रहा है, और दूसरी तरफ उसी की कमी की भरपाई के लिए खाद्य तेल, दालें और अब 10 लाख टन कच्ची चीनी आयात करने पर विदेशी मुद्रा उड़ाई जा रही है।
नीतिगत पुनर्मूल्यांकन की दरकार
बिना ठोस डेटा, दीर्घकालिक बफर स्टॉक की योजना और 2G बायोफ्यूल तकनीक के बुनियादी ढांचे के बिना थोपी गई यह नीति तात्कालिक प्रचार का जरिया तो बन सकती है, लेकिन दीर्घकालिक रूप से देश की खाद्य संप्रभुता को खोखला कर रही है। जब तक खाद्य फसलों को वाहनों के ईंधन से अलग नहीं किया जाएगा, तब तक यह नीति आम आदमी के चूल्हे पर डाका डालती रहेगी।
खंड-2
‘हरित उपनिवेशवाद’ की आहट: अमेरिकी सरप्लस मक्के और एथेनॉल के लिए भारत का दरवाजा खोलने की अंतरराष्ट्रीय बिसात
भारत की एथेनॉल नीति में आई गड़बड़ी केवल घरेलू स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके तार एक बड़े भू-राजनीतिक और व्यापारिक खेल से भी जुड़े हैं। भारत ने जब बिना ठोस योजना के E20 (20% एथेनॉल ब्लेंडिंग) का महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया, तो घरेलू स्तर पर मक्के और अनाज का भारी घाटा पैदा हो गया। घरेलू नीति की इसी कमजोरी का फायदा उठाकर अमेरिकी कृषि और कॉर्पोरेट लॉबी अपने सरप्लस (अधिशेष) मक्के और एथेनॉल को भारतीय बाजार में खपाने के लिए लगातार दबाव बना रही है।
अमेरिकी लॉबी का खेल और भारत का बाजार
*अमेरिकी ‘कॉर्न बेल्ट’ का संकट और नए बाजार की तलाश: अमेरिका हर साल करीब 35 करोड़ टन मक्का पैदा करता है और भारी मात्रा में कॉर्न-बेस्ड एथेनॉल बनाता है। घरेलू स्तर पर खपत सीमित होने और चीन जैसे बड़े खरीदारों के साथ व्यापारिक तनाव के चलते अमेरिकी कृषि सिंडिकेट को अपने बंपर सरप्लस स्टॉक को बेचने के लिए एक बड़े उपभोक्ता बाजार की तलाश है।
*दबाव और कूटनीतिक पैंतरेबाजी: ‘यू.एस. ग्रेन्स काउंसिल’ (USGC) और अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि लगातार भारत पर टैरिफ कम करने और अमेरिकी मक्के व फ्यूल-ग्रेड एथेनॉल के आयात पर लगी पाबंदियां हटाने का दबाव बनाते रहे हैं। भारत के एथेनॉल उत्पादन घाटे को वे अपने लिए एक सुनहरे अवसर के रूप में भुनाना चाहते हैं।
*जीएमओ (GMO) मक्के का पिछला दरवाजा: भारत में आनुवंशिक रूप से संशोधित (GM) फसलों के सीधे आयात पर सख्त नीति रही है। लेकिन अब एथेनॉल की कमी का बहाना बनाकर टैरिफ-रेट कोटा (TRQ) के तहत “केवल औद्योगिक/ईंधन उपयोग” के नाम पर अमेरिकी जीएम मक्के को देश में उतारने की जमीन तैयार की जा रही है।
*डीडीजीएस (DDGS) का चारा बाजार पर कब्जा: अमेरिकी मक्के से एथेनॉल बनने के बाद बचने वाले सह-उत्पाद यानी डीडीजीएस (डिस्टिलर्स ड्राइड ग्रेन्स विद सॉल्यूबल्स) को भारतीय पोल्ट्री और डेयरी उद्योग में सस्ते पशु आहार के तौर पर खपाने की लॉबिंग की जा रही है। इससे भारत का घरेलू पशु-आहार तंत्र सीधे तौर पर अमेरिकी सप्लाई चेन पर निर्भर हो जाएगा।
भारतीय अर्थव्यवस्था और किसानों पर गहराता खतरा
- घरेलू मक्का किसानों की बर्बादी: बिहार, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के मक्का उत्पादक किसानों को जब लागत के मुकाबले बेहतर मूल्य मिलने की उम्मीद बंधी थी, तब अमेरिकी सरकार द्वारा भारी सब्सिडी वाले सस्ते मक्के के आयात से स्थानीय मंडियों में दाम औंधे मुंह गिर सकते हैं। (ठीक वैसा ही संकट, जैसा ‘नाफ्टा’ समझौते के बाद मैक्सिको के छोटे मक्का किसानों ने झेला था)।
- ऊर्जा संप्रभुता का खोखला दावा: जिस नीति को “कच्चे तेल पर विदेशी निर्भरता घटाने” के नाम पर लाया गया था, वह कच्चे तेल की जगह विदेशी मक्के और विदेशी एथेनॉल की निर्भरता में बदलती दिख रही है। अगर गाड़ियों की टंकी भरने के लिए भी अमेरिका से मक्का मंगाना पड़े, तो यह ‘आत्मनिर्भरता’ नहीं बल्कि एक नए किस्म का ‘हरित आयात जाल’ है।
नीतिगत चेतावनी
बिना दीर्घकालिक घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाए और बुनियादी 2G तकनीकों को विकसित किए बिना विदेशी मॉडलों की नकल करने का नतीजा यही होता है—देश की खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ती है, महंगाई आम आदमी की थाली छीनती है और अंततः बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सरप्लस माल को खपाने के लिए देश के दरवाजे जबरन खोलने पड़ते हैं।
खंड- 3
‘कॉपी–पेस्ट’ नीति का कड़वा नतीजा: जब अमेरिकी मॉडल की अंधाधुंध नकल ने बिगाड़ा भारत का खाद्य संतुलन
केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी का एक बयान सार्वजनिक मंचों पर खासा चर्चित रहा है, जिसमें उन्होंने देश की एथेनॉल नीति को लागू करने की जल्दबाजी का खुलासा करते हुए कहा था:
“अधिकारियों ने मुझे बताया कि एथेनॉल नीति का ड्राफ्ट तैयार करने में 4 से 5 साल लग जाएंगे। मैंने उनसे सीधे कहा कि अमेरिका की एथेनॉल पॉलिसी की कॉपी निकालो, ऊपर का टाइटल बदलो, नीचे भारत सरकार लिखो और उसे लागू कर दो।“
राजनीतिक गलियारों में भले ही इसे प्रशासनिक गति और ‘रेड टेप’ को दरकिनार करने वाली त्वरित कार्यशैली के रूप में पेश किया गया हो, लेकिन आर्थिक और सामाजिक धरातल पर यह स्वीकारोक्ति देश की नीति-निर्माण प्रक्रिया की एक गंभीर विफलता को उजागर करती है।
कॉपी–पेस्ट नीति की बुनियादी योजनागत खामियां
*भौगोलिक और कृषि वास्तविकताओं की अनदेखी: अमेरिका में प्रति व्यक्ति कृषि भूमि, विशाल कॉर्न-बेल्ट और विशाल कॉर्पोरेट फार्मिंग मॉडल भारत से पूरी तरह भिन्न है। वहां खाद्यान्न सरप्लस में रहता है, जबकि भारत 140 करोड़ की विशाल आबादी वाला देश है, जहां 80% से अधिक किसान छोटे और सीमांत हैं। अमेरिकी मॉडल की आंख मूंदकर नकल ने भारतीय कृषि और खाद्य सुरक्षा के ताने-बाने को नजरअंदाज कर दिया।
*‘सरप्लस अनाज’ का भ्रम और भुखमरी का जोखिम: अमेरिका मक्के को औद्योगिक स्तर पर ईंधन में बदलने का जोखिम इसलिए उठा सकता है क्योंकि उसकी घरेलू खाद्य सुरक्षा कभी दांव पर नहीं लगती। भारत जैसे देश में—जहां कुपोषण और खाद्य महंगाई रोजमर्रा का संघर्ष है—खाद्य फसलों (गन्ना, मक्का, चावल) को गाड़ियों के ईंधन में झोंकना एक गंभीर योजनागत भूल साबित हुआ।
*अध्ययन और प्रभाव आकलन (Impact Assessment) का अभाव: नौकरशाही की धीमी गति को दुरुस्त करना एक बात है, लेकिन नीतिगत शोध, ग्राउंड-लेवल सिमुलेशन और स्थानीय आपूर्ति-मांग के संतुलन को पूरी तरह दरकिनार कर देना दूसरी बात है। अगर नीति लागू करने से पहले यह आंका जाता कि 25 लाख टन चीनी या करोड़ों टन अनाज के डायवर्जन से खुदरा बाजार में क्या असर पड़ेगा, तो आज 10 लाख टन कच्ची चीनी आयात करने की नौबत न आती।
*विदेशी लॉबी के लिए आसान रास्ता: जब नीतियां विदेशी मॉडलों की सीधी नकल पर आधारित होती हैं, तो वे विदेशी व्यापारिक हितों के लिए स्वाभाविक रूप से अनुकूल हो जाती हैं। आज जब अमेरिका अपने सरप्लस मक्के और एथेनॉल को भारत में निर्यात करने का दबाव बना रहा है, तो इसकी बुनियाद उसी बिना सोची-समझी ‘कॉपी-पेस्ट’ नीति में छिपी है।
नीतिगत सबक
किसी भी विकासशील देश के लिए टिकाऊ नीति का निर्माण स्थानीय संसाधनों, मौसम, भूजल और जनता की प्राथमिकताओं के आधार पर होना चाहिए, न कि पश्चिमी देशों के ड्राफ्ट पर सिर्फ शीर्षक बदलकर। जब नीतियों का निर्माण जमीनी हकीकत से कटकर ‘शॉर्टकट’ के रास्ते होता है, तो उसका हर्जाना अंततः आम उपभोक्ता को महंगाई और देश को खाद्य असुरक्षा के रूप में चुकाना पड़ता है।
निष्कर्ष: ‘कॉपी–पेस्ट’ नीति का बहुआयामी संकट और आत्मचिंतन की दरकार
कुल मिलाकर, देश का मौजूदा एथेनॉल संकट बिना जमीनी शोध के अमेरिकी मॉडल की ‘कॉपी-पेस्ट’ नीति, अनियोजित प्राथमिकताओं और अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक दबावों का एक त्रासद गठजोड़ बनकर उभरा है। जिस नीति को विदेशी मुद्रा बचाने और ऊर्जा आत्मनिर्भरता के नाम पर जल्दबाजी में लागू किया गया, उसने न केवल 1G फसलों के अंधाधुंध इस्तेमाल से देश को चीनी निर्यातक से आयातक बना दिया और आम आदमी की थाली को 40% तक महंगा किया, बल्कि घरेलू मक्का और पशु आहार तंत्र को भी चरमरा दिया। इसका सबसे खतरनाक पहलू यह है कि इस घरेलू कमी की आड़ में अमेरिकी कृषि लॉबी अपने सरप्लस मक्के, एथेनॉल और जीएम-उपपादों को भारतीय बाजार में खपाने की जमीन तैयार कर रही है—यानी कच्चे तेल की निर्भरता घटाने के दावे के बदले देश को
विदेशी अनाज और ईंधन के एक नए ‘हरित आयात जाल’ में धकेला जा रहा है। जब तक नीति-निर्माता पश्चिमी मॉडलों की अंधी नकल छोड़कर भारत की स्थानीय कृषि, भूजल संतुलन, खाद्य सुरक्षा और 2G बायोफ्यूल तकनीक को केंद्र में रखकर इस पूरी नीति का समग्र पुनर्मूल्यांकन नहीं करेंगे, तब तक गाड़ियों की टंकी भरने का यह ‘हरित जुनून’ आम नागरिक की बुनियादी रसोई और देश की खाद्य संप्रभुता को खोखला करता रहेगा।

very good analysis