संदीप देव। अभिनेत्री स्वरा भास्कर द्वारा फिल्म ‘पद्मावत’ के जौहर दृश्य पर की गई टिप्पणियों के बाद सोशल मीडिया और वैचारिक जगत में एक बार फिर ‘जौहर’ और ऐतिहासिक आत्मबलिदान पर बहस छिड़ गई है। सोशल मीडिया पर प्रसारित दावों में जहाँ उन्हें यह कहते उद्धृत किया गया कि ‘जौहर करने वाली महिलाएं कायर थीं’, वहीं उन्होंने स्पष्टीकरण जारी करते हुए कहा कि उनके बयान को गलत संदर्भ में प्रस्तुत किया गया। उनका तर्क था कि आधुनिक संदर्भ में बलात्कार या यौन उत्पीड़न की शिकार महिलाओं को जीवित रहने का पूरा अधिकार है और मृत्यु को ‘सम्मान’ की एकमात्र शर्त बना देना आज के दौर में समस्याग्रस्त है। परंतु, इस पूरे विमर्श का सबसे कमजोर पहलू यह है कि इसमें ‘ऐतिहासिक संदर्भ’ (Historical Context) को पूरी तरह विस्मृत कर दिया जाता है।

आधुनिक 21वीं सदी के संप्रभु, विधिक और मानवाधिकारों से युक्त समाज के चश्मे से 13वीं-16वीं शताब्दी के बर्बर युद्ध-अपराधों और दासता के यथार्थ का मूल्यांकन करना न केवल इतिहास की विकृति है, बल्कि उन वीरांगनाओं के उस चरम प्रतिरोध (Ultimate Resistance) की चेतना का भी अनादर है।
हाल के वर्षों में ‘जौहर’ को कायरता या स्त्री-विरोधी रूढ़ि बताने की एक नई बौद्धिक प्रवृत्ति उभरी है, जिसका नेतृत्व अक्सर ऐतिहासिक वास्तविकताओं से अनभिज्ञ आधुनिक हस्तियों द्वारा किया जाता है। आधुनिक नारीवादी दृष्टिकोण जहाँ विधिक सुरक्षा, मानवाधिकार और पुनर्वास की बात करता है, वहीं वह उस ऐतिहासिक यथार्थ को नजरअंदाज कर देता है जिसमें पराजित समाज की स्त्री के पास कोई “विधिक विकल्प” शेष नहीं था।
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ISD Radio: बौद्धिक दिवालियापन के शिकार अभिनेत्री स्वरा भास्कर का जौहर पर की गई टिप्पणी
मध्यकालीन मुस्लिम सैन्य अभियानों का एक मूलभूत नियम था—दारुल हर्ब (युद्ध का क्षेत्र), माल–ए–गनीमत (लूट का माल), और जबरन दासता। जौहर इसी बर्बर व्यवस्था के विरुद्ध भारतीय स्त्रियों का संप्रभु, चरम और अंतिम प्रतिरोध था।
आधुनिक विमर्श की विडंबना: ‘कालदोष‘ (Anachronism) का शिकार
किसी भी ऐतिहासिक परिघटना को समझने के लिए सबसे पहली शर्त होती है कि हम उस कालखंड की राजनीतिक, सामाजिक और सैन्य परिस्थितियों के भीतर उतरें। इतिहास लेखन में इसे Presentism या कालदोष (Anachronism) कहा जाता है—अर्थात आज के संवैधानिक मूल्यों (जैसे कानून, पुलिस, मानवाधिकार, पुनर्वास) को उस मध्ययुगीन बर्बरता पर थोपना, जहाँ पराजित राज्य की जनता के लिए कोई कानून नहीं, बल्कि केवल आक्रांता की तलवार और दास बाजार ही अंतिम सत्य थे।
स्वरा भास्कर जैसे आधुनिक महिलाओं का यह तर्क कि “बलात्कार के बाद भी महिला को जीने का अधिकार है” आधुनिक समाज और कानून व्यवस्था के लिए तो पूरी तरह प्रासंगिक है, लेकिन क्या यह विकल्प 1303 ईस्वी में अलाउद्दीन खिलजी की सेना के सामने उपस्थित था?
मध्यकाल में जौहर कोई “आत्महत्या” या “कायरता” नहीं थी; यह आजीवन दासता, सामूहिक बलात्कार, धार्मिक अपमान और देह के वस्तुकरण (Commodification) के विरुद्ध एक सशक्त संप्रभु निर्णय (Sovereign Choice) था।
प्राथमिक मुस्लिम ऐतिहासिक स्रोतों में जौहर और दासता के अकाट्य प्रमाण
जो लोग यह मानते हैं कि जौहर न करने पर रानियों या महिलाओं को केवल “सामान्य जीवन” या “हरम में सुरक्षित स्थान” मिलता, उन्हें तत्कालीन इस्लामी दरबारी इतिहासकारों के मूल विवरण पढ़ने चाहिए। सल्तनत काल, मुगल काल और आरंभिक अरब आक्रमण के प्राथमिक इस्लामी स्रोतों में दर्ज विवरण इन दावों की सच्चाई सामने लाते हैं:
1. पहला ऐतिहासिक प्रमाण: ‘चचनामा‘ (712 ई. – मोहम्मद बिन क़ासिम का सिंध आक्रमण) अरब इतिहासकार अली बिन हामिद कूफी द्वारा अनूदित मूल अरबी ग्रंथ ‘चचनामा’ (अनुवाद: इलियट और डाउसन, वॉल्यूम I) में भारत के पहले दर्ज जौहर का प्रत्यक्ष विवरण मिलता है।
*जब राजा दाहिर युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए, तो उनकी बहन रानी बाई ने राओर के किले में सभी महिलाओं को एकत्र किया।
*’चचनामा’ में रानी का स्पष्ट उद्घोष दर्ज है:“आक्रांताओं के हाथों अपमानित होने, उनकी दासता स्वीकार करने और अपनी मर्यादा खोने से बेहतर है कि हम अग्नि की शरण लें। जो जीवित रहना चाहे वह जा सकती है, किंतु स्वाभिमानी स्त्रियां अग्नि में समाएंगी।”
*इसके बाद महिलाओं ने स्वयं को अग्नि को समर्पित कर दिया। जो स्त्रियां बचीं, उनके संबंध में ‘चचनामा’ स्वयं स्वीकार करता है कि राजा दाहिर की पुत्रियों (सूर्य देवी और परमल देवी) सहित हजारों कन्याओं को खलीफा वालिद के हरम में बगदाद भेजा गया।
2. अमीर खुसरो: रणथंभौर का जौहर (1301 ई.) अलाउद्दीन खिलजी के दरबारी कवि और सूफी संत निजामुद्दीन औलिया के शिष्य अमीर खुसरो ने अपनी पुस्तक ‘खज़ाइन–उल–फ़ुतूह’ (Khazain-ul-Futuh) में रणथंभौर किले (हम्मीर देव चौहान) के पतन का आँखों देखा हाल लिखा है:
“अनाज की एक दाने के लिए दो सोने के सिक्के दिए जा रहे थे फिर भी अनाज नहीं मिल रहा था… जब हार निश्चित हो गई, तो जौहर की आग जलाई गई। एक ही रात में वह आग जल उठी जिसमें सैकड़ों आहुतियां दी गईं, क्योंकि वे काफ़िर (हिंदू स्त्रियां) हमारे सुल्तान के सिपाहियों की चेरी (दासी) नहीं बनना चाहती थीं।”
अमीर खुसरो ने ‘खज़ाइन-उल-फ़ुतूह’ में चित्तौड़ के पतन का वर्णन करते हुए यह भी दर्ज किया है कि अलाउद्दीन ने एक ही दिन में 30,000 हिंदू नागरिकों के कत्लेआम का हुक्म दिया था। ऐसे अमानवीय, वीभत्स और अंतहीन नरक की कल्पना चित्तौड़ की महिलाओं के सामने साक्षात खड़ी थी।
3. तैमूरलंग: ‘मलफुज़ात–ए–तैमूरी‘ (1398 ई. – भटनेर का जौहर) क्रूर आक्रांता तैमूर की आत्मकथा ‘मलफुज़ात–ए–तैमूरी’ (इलियट और डाउसन, वॉल्यूम III, पृ. 445-446) में राजस्थान के भटनेर (वर्तमान हनुमानगढ़) के जौहर का भयावह विवरण है। तैमूर स्वयं लिखता है:
“जब राजपूतों ने देखा कि वे दुर्ग की रक्षा नहीं कर सकते, तो उन्होंने अपनी पत्नियों और बच्चों को एक मकान में बंद कर उसमें आग लगा दी और स्वयं तलवारें लेकर हमारे सैनिकों पर टूट पड़े। अगले दिन मैंने आदेश दिया कि बचे हुए काफ़िरों को तलवार से कत्ल कर दिया जाए और उनकी शेष बची स्त्रियों व बच्चों को बंदी (गुलाम) बना लिया जाए।“
4. बाबर: ‘बाबरनामा‘ (1528 ई. – चंदेरी का जौहर) मुगल साम्राज्य के संस्थापक बाबर ने अपनी आत्मकथा ‘तुजुक–ए–बाबरी’ (बाबरनामा) में चंदेरी विजय और मेदिनी राय के विरुद्ध युद्ध का विवरण दर्ज किया है:
*बाबर लिखता है कि चंदेरी के ऊपरी दुर्ग पर आक्रमण के समय राजपूत महिलाओं ने सामूहिक आत्मदाह (जौहर) किया ताकि वे मुगलों के हाथ न आएं।
*इसके तुरंत बाद बाबर ने कटे हुए राजपूत सैनिकों के सिरों की मीनार बनवाई और खुद को ‘गाज़ी’ घोषित किया।
5. अबुल फज़ल: ‘अकबरनामा‘ (1568 ई. – चित्तौड़ का तीसरा जौहर) जिसे सेकुलर इतिहास में “उदार” बताया जाता है, उस अकबर के दरबारी इतिहासकार अबुल फज़ल ने ‘अकबरनामा’ (खंड II, अनुवाद: एच. बेवरिज) में चित्तौड़ के तीसरे जौहर का वर्णन किया है:
*जयमल और पत्ता के बलिदान के बाद किले के तीन अलग-अलग स्थानों (पत्ता का महल, राठौड़ों और चौहानों की हवेलियां) से आग की विशाल लपटें उठीं। अबुल फज़ल लिखता है कि धुआं देखकर अकबर समझ गया कि राजपूत स्त्रियों ने जौहर की रस्म पूरी कर ली है।
*महत्वपूर्ण तथ्य: जौहर के बाद जब अकबर किले में घुसा, तो उसने चित्तौड़ के 30,000 से अधिक गैर-सैनिक (नागरिक, किसान, वृद्ध और बच्चे) हिंदुओं के कत्लेआम का फरमान जारी किया और इसके उपलक्ष्य में ‘फतहनामा-ए-चित्तौड़’ जारी किया गया। यदि स्त्रियां जीवित बचतीं, तो उस क्रूर नरसंहार और मुगल सैनिकों की वासना से वे कैसे बच सकती थीं?
6. ज़ियाउद्दीन बरनी: गुलाम मंडियों का अर्थशास्त्र और देह का वस्तुकरण
सर एच. एम. इलियट और प्रोफेसर जॉन डाउसन द्वारा संपादित प्रसिद्ध ऐतिहासिक ग्रंथ ‘द हिस्ट्री ऑफ इंडिया, ऐज़ टोल्ड बाय इट्स ओन हिस्टोरियंस’ (The History of India, as Told by Its Own Historians – Vol. III) में समकालीन इतिहासकार ज़ियाउद्दीन बरनी की कृति ‘तारीख–ए–फ़िरोज़शाही’ का अनुवाद दर्ज है। पुस्तक के पृष्ठ 196-197 पर अलाउद्दीन खिलजी के बाजार नियंत्रण नियमों (Market Regulations) का विवरण देते हुए बरनी स्पष्ट लिखता है:
“बाजार में दासों, घोड़ों और पशुओं की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए नियम बनाए गए। विनियमन IV के तहत—एक सामान्य दासी (serving girl) का मूल्य 5 से 12 टंका तय किया गया; रखैल या उपपत्नी (concubine) का मूल्य 20, 30 या 40 टंका तय किया गया। पुरुष दासों का मूल्य 100 से 200 टंका या उससे भी कम तय हुआ…”

बरनी आगे लिखता है कि युद्धों के बाद हिंदू दासों और दासियों की संख्या दिल्ली के बाजारों में इतनी बढ़ गई थी कि आपूर्ति अधिक होने के कारण इंसान सब्ज़ियों और साधारण वस्तुओं की तरह कौड़ियों के भाव बेचे जा रहे थे।
युद्ध का नियम: ‘माल–ए–गनीमत‘ और महिलाओं की स्थिति
*शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न: पकड़ी गई महिलाओं को खुले बाजारों में नीलाम किया जाता था।

*धर्मांतरण और पहचान का विनाश: उनकी आस्था, संस्कृति और मानवीय गरिमा को पूरी तरह छीनकर उन्हें रखैल (कनक्यूबाइन) या दासी बना दिया जाता था।
*मूल्य नियंत्रण: जिस तरह गेहूं, चावल और घी का भाव तय होता था, उसी प्रकार स्त्रियों की श्रेणियों (कनक्यूबाइन/रखैल, सेवादार दासी, सुंदर युवती) के भाव टंकों में तय होते थे।
*बाजार में बहुतायत: बरनी लिखता है कि लगातार युद्ध अभियानों के कारण इतने युद्धबंदी लाए गए कि दासों के दाम अप्रत्याशित रूप से गिर गए।
प्रश्न यह है: क्या किसी स्वाभिमानी वीरांगना के लिए 20 या 30 टके में बिकने वाली ‘रखैल’ बनना, या रोजाना आक्रांताओं के सैनिकों द्वारा सामूहिक रूप से नोचे जाना और अंततः किसी हरम के कोने में तिल-तिल कर मरना “जीवन का अधिकार” कहलाता?
दार्शनिक और ऐतिहासिक विश्लेषण: ‘शाका‘ और ‘जौहर‘ की संप्रभुता
जौहर को ‘कायरता’ अथवा ‘शारीरिक शुचिता का अंधविश्वास’ मान लेना स्त्री की उस अदम्य इच्छाशक्ति (Agency) को नकारना है, जिसने आक्रांता को यह संदेश दिया: “तुम हमारी धरती, हमारे महल और हमारे पुरुषों के शरीर जीत सकते हो, लेकिन हमारी आत्मा, हमारी चेतना और हमारे आत्मसम्मान को अपनी वासना और मंडियों की वस्तु नहीं बना सकते।“
राजपूत परंपरा में युद्ध कभी एकतरफा नहीं होता था; यह ‘साका’ और ‘जौहर’ का संयुक्त अनुष्ठान था:
*शाका (पुरुषों का अंतिम युद्ध): जब विजय असंभव हो जाती, तो पुरुष केसरिया वस्त्र पहनकर दुर्ग के कपाट खोल देते थे। उनका एकमात्र उद्देश्य अधिक से अधिक शत्रुओं को मारकर वीरगति पाना होता था।
*जौहर (स्त्रियों का आत्मोत्सर्ग): पुरुष तभी निश्चिंत होकर प्राणोत्सर्ग कर पाते थे जब उन्हें यह ज्ञात होता था कि उनकी पीठ पीछे उनकी माताओं, पत्नियों और पुत्रियों के शरीर को कोई आक्रांता स्पर्श भी नहीं कर सकता।
*शत्रु की अंतिम पराजय: चित्तौड़ की घेराबंदी में खिलजी जिस रानी पद्मिनी के सौंदर्य और मानमर्दन के अहंकार के वशीभूत होकर आया था, किले के द्वार टूटने पर उसे विजय के नाम पर केवल राख और धधकते अंगारे मिले। यह आक्रांता के अहंकार पर एक ऐसा तमाचा था, जिसे सदियों का इतिहास भी मिटा नहीं सका।
अग्नि भारतीय संस्कृति में सबसे पवित्र तत्व मानी जाती है जो अपवित्रता को भस्म कर देती है। जौहर उस दौर में देह के ऊपर आत्मा और स्वाभिमान की अंतिम विजय (Ultimate Triumph of Dignity) थी।
वैचारिक पृष्ठभूमि और इतिहास के प्रति बौद्धिक ईमानदारी
इतिहास की घटनाओं की आधुनिक व्याख्या करते समय बौद्धिक सतहीपन और वैचारिक पूर्वाग्रह से बचना आवश्यक है। स्वरा भास्कर की पारिवारिक पृष्ठभूमि को देखें तो उनकी माँ इरा भास्कर जेएनयू में सिनेमा स्टडीज की प्रोफेसर रही हैं, जबकि उनके पिता सी. उदय भास्कर पूर्व सैन्य अधिकारी व रक्षा विश्लेषक रहे हैं। स्वरा भास्कर की शादी समाजवादी पार्टी के नेता और राजनीतिक कार्यकर्ता फ़हद अहमद (Fahad Ahmad) से हुई है। मार्क्सवादी, मोहम्मदवादी व उत्तर-आधुनिकतावादी विमर्श से प्रभावित शैक्षणिक परिवेश और आगे चलकर हुए निजी जीवन के कारण उनका बौद्धिक दायरा मुख्य रूप से पश्चिमी व आयातित सिद्धांतों तक सीमित दिखता है।
यह वामपंथी, इस्लामपरस्त और आधुनिकतावादी दृष्टि भारत के उस गहन आध्यात्मिक व सामाजिक यथार्थ को समझने में असमर्थ रहती है जहाँ जौहर को देह के विनाश के रूप में नहीं, बल्कि आक्रांताओं के सम्मुख अपनी आत्मा, शुचिता और गरिमा की रक्षा के एक चरम व संप्रभु संकल्प के रूप में देखा गया; परिणामस्वरूप, यह विचारधारा इतिहास के उस महान आत्मगौरव और वीरांगनाओं के उस अदम्य त्याग को केवल एक संकीर्ण भौतिकवादी चश्मे से ही आंकने की भूल करती है।
जौहर किसी रूढ़िवादी उत्सव का नाम नहीं था; वह मध्यकालीन बर्बरता के सम्मुख एक विवश, किंतु गरिमापूर्ण और अदम्य आत्मबलिदान था—जहाँ देह को भस्म करना, जीवनपर्यंत की अमानवीय दासता और बलात्-उपभोग से कहीं अधिक स्वाभिमानी माना गया। मुस्लिम दरबारी इतिहासकारों—बरनी, अमीर खुसरो, बाबर और अबुल फज़ल—के अपने शब्द यह गवाही देते हैं कि जौहर कोई अंधविश्वास या कायरता नहीं थी, बल्कि मध्यकालीन आक्रांताओं की लूट-व्यवस्था के मुंह पर धधकता हुआ एक ऐतिहासिक तमाचा था। इतिहास की उन वीरांगनाओं का मूल्यांकन आज के वातानुकूलित कमरों में बैठकर नहीं, बल्कि उस कालखंड के धधकते यथार्थ और तत्कालीन ऐतिहासिक दस्तावेजों के आलोक में ही किया जा सकता है।
