ऋषि नारायण कहते हैं – हे नारद !मूल प्रकृति की सर्वोच्च अभिव्यक्तियाँ देवी राधा और दुर्गा हैं,।
राधा (महा लक्ष्मी) ‘प्राण’ या जीवन का प्रतिनिधित्व करती हैं जबकि दुर्गा ‘बुद्धि’ या जागरूकता (ज्ञान) प्रदान करती हैं। संपूर्ण ब्रह्मांड इन दो शक्तियों द्वारा उत्पन्न और निर्देशित है।(देवीभागवत पुराण)
श्रीमहादेवजी ने कहा- हे नारद ! भगवान् श्रीकृष्ण के वाम भाग में विराजमाना जो राधा उनके वक्षःस्थल पर निवास करती हैं, वही वैकुण्ठ में महालक्ष्मी होकर नारायण के वक्षःस्थल पर निवास कर रही हैं। वही पुनः विद्वानों की माता सरस्वती हैं। वह मायाद्वारा क्षीर-समुद्र की कन्या होकर विष्णु के वक्षःस्थल पर निवास कर रही हैं। प्राचीन काल में उन्हींने भगवान् श्रीहरि की दया से समस्त देवताओं के तेजों से स्वयं मूर्तिमती होकर दैत्यों का संहारकर इन्द्र को निष्कंटक राज्य “इन्द्रपद” प्रदान किया। बहुत समय बीतने पर उसी सनातनी भगवती विष्णुमाया ने भगवान् कृष्ण के आदेश से दक्ष की कन्या के रूप में जन्म लिया, पीछे मेरी निन्दा सुनकर पिता के यज्ञ में शरीर छोड़कर पितृगण की मानसीकन्या और हिमालय की पत्नी मेना की कन्या होकर जन्म लिया था। वही राधा पर्वत से प्रकट हुई थी, इसलिए उन्हें पार्वती नाम से कहा जाता है। वही राधा दुर्गति का विनाश करनेवाली सर्वशक्तिस्वरूपा माँ दुर्गा हैं। मैत्रेय जी कहते हैं-हे विदुरजी ! सुना है कि दक्ष-कन्या सतीजी ने इस प्रकार अपना पूर्वशरीर त्यागकर हिमालय की पत्नी मैना के गर्भ से जन्म लिया था । उपर्युक्त शास्त्र- वचनों से यह सिद्ध हो गया कि सप्तशती चण्डी की प्रतिपाद्य देवी भगवती राधाजी हैं।
श्री राधा माहात्म्य 2, 6 अध्याय, नारद पञ्चरात्र
कृष्णाराध्या भक्तिसाध्या भक्तवृन्दनिषेविता । विश्वाधारा कृपाधारा जीवधारातिनायिका ॥
श्रीराधारानी स्वयं श्रीकृष्ण की इष्टदेवी व स्वामिनी हैं। भक्ति द्वारा ही साध्य, भक्तों के द्वारा सदा वंदित, विश्व की पालिनी महालक्ष्मी हैं। कृपा की स्त्रोत, जीवों के प्राणों की स्त्रोत और सबकी ईश्वरी हैं।
नारदपुराणम्- पूर्वार्धः/अध्यायः ८२
साभार: अज्ञात।
